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यजुर्वेद अध्याय - 13

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  • यजुर्वेद - अध्याय 13/ मन्त्र 6
    ऋषिः - हिरण्यगर्भ ऋषिः देवता - ईश्वरो देवता छन्दः - भुरिगुष्णिक् स्वरः - ऋषभः
    213

    नमो॑ऽस्तु स॒र्पेभ्यो॒ ये के च॑ पृथि॒वीमनु॑। येऽ अ॒न्तरि॑क्षे॒ ये दि॒वि तेभ्यः॑ स॒र्पेभ्यो॒ नमः॑॥६॥

    स्वर सहित पद पाठ

    नमः॑। अ॒स्तु॒। स॒र्पेभ्यः॑। ये। के। च॒। पृ॒थि॒वीम्। अनु॑। ये। अ॒न्तरि॑क्षे। ये। दि॒वि। तेभ्यः॑। स॒र्पेभ्यः॑। नमः॑ ॥६ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    नमो स्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथिवीमनु । येऽअन्तरिक्षे ये दिवि तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    नमः। अस्तु। सर्पेभ्यः। ये। के। च। पृथिवीम्। अनु। ये। अन्तरिक्षे। ये। दिवि। तेभ्यः। सर्पेभ्यः। नमः॥६॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 13; मन्त्र » 6
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    संस्कृत (1)

    विषयः

    मनुष्यैरत्र कथं वर्त्तितव्यमित्याह॥

    अन्वयः

    ये के चात्र सर्पाः सन्ति तेभ्यः सर्पेभ्यो नमोऽस्तु। येऽन्तरिक्षे ये दिवि ये च पृथिवीमनुसर्पन्ति तेभ्यः सर्पेभ्यो नमोऽस्तु॥६॥तेभ्यः सर्पेभ्यो नमोऽस्तु॥६॥

    पदार्थः

    (नमः) अन्नम्। नम इत्यन्ननामसु पठितम्॥ निघं॰२। ७॥ (अस्तु) (सर्पेभ्यः) ये सर्पन्ति गच्छन्ति ते लोकास्तेभ्यः। इमे वै लोकाः सर्पास्ते हानेन सर्वेण सर्पन्ति॥ शत॰७।३।१।२५॥ (ये) (के) (च) (पृथिवीम्) भूमिम् (अनु) (ये) (अन्तरिक्षे) आकाशे (ये) (दिवि) सूर्यादिलोके (तेभ्यः) (सर्पेभ्यः) प्राणिभ्यः (नमः) अन्नम्। [अयं मन्त्रः शत॰७.४.१.२८ व्याख्यातः]॥६॥

    भावार्थः

    यावन्त इमे लोका दृश्यन्ते ये च न दृश्यन्ते, ते सर्वे स्वस्वकक्षायामीश्वरेण नियताः सन्त आकाशे भ्रमन्ति। तेषु सर्वेषु लोकेषु ये प्राणिनश्चलन्ति तदर्थमन्नमपीश्वरेण रचितम्, यत एतेषां जीवनं भवतीति यूयं विजानीत॥६॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    मनुष्यों को संसार में कैसे वर्त्तना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

    पदार्थ

    जो (के) कोई इस जगत् में लोक-लोकान्तर और प्राणी हैं (तेभ्यः) उन (सर्पेभ्यः) लोकों के जीवों के लिये (नमः) अन्न (अस्तु) हो। (ये) जो (अन्तरिक्षे) आकाश में (ये) जो (दिवि) प्रकाशमान सूर्य्य आदि लोकों में (च) और (ये) जो (पृथिवीम्) भूमि के (अनु) ऊपर चलते हैं, उन (सर्पेभ्यः) प्राणियों के लिये (नमः) अन्न प्राप्त होवे॥६॥

    भावार्थ

    हे मनुष्यो! जितने लोक दीख पड़ते हैं, और जो नहीं दीख पड़ते हैं, वे सब अपनी-अपनी कक्षा में नियम से स्थिर हुए आकाश मार्ग में घूमते हैं, उन सबों में जो प्राणी चलते हैं, उन के लिये अन्न भी ईश्वर ने रचा है कि जिससे इन सब का जीवन होता है, इस बात को तुम लोग जानो॥६॥

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    विषय

    सर्पण स्वभाव दुष्टों का दमन । पक्षान्तर में गुप्तचरों को नियोजन ।

    भावार्थ

    ( ये के च ) जो कोई भी ( पृथिवीम् अनु ) इस पृथिवी पर और (ये) जो अन्तरिक्ष में और ( ये दिवि ) जो दूर आकाश में विद्यमान लोक हैं ( तेभ्य: ) उन ( सर्पेभ्यः ) सर्पण स्वभाव लोकों को ( नमः ) अन्न प्राप्त हो और (तेभ्यः सर्पेभ्यः नमः) उन सर्प के स्वभाव वाले दुष्ट पुरुषों का उत्तम रीति से दमन हो । इमे वै लोकाः सर्पाः या एव एषु लोकेषु नाष्टा, व्यद्वरो या शिमिदा तदेवैतत्सर्वं शमयति ॥ शत० ७ । ४ । १ । २८ ॥ अथवा राष्ट्र में राजाओं के प्रति जानेवाले, प्रजाओं में फैले हुए और अन्तरिक्ष अर्थात् शासकजनों में फैले हुए ( सर्पेभ्यः ) गुप्त रूप से गतिशील चरों की ( नमः हम नियम व्यवस्था करें ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    सर्पाः देवता: । भूरिगुष्णिक् । ऋषभः ॥

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    विषय

    स्वरः सर्पेभ्यो नमः

    पदार्थ

    १. प्रस्तुत मन्त्र में सर्प शब्द का अर्थ 'सर्पतिर्गतिकर्मा' २।१४- नि०, 'इमे लोकाः वै सर्पा यद्धि किञ्च सर्पस्येष्वेव वै लोकेषु सर्पति' - श० ७।४ । १ । १७ इन वाक्यों के अनुसार ये सब लोक-लोकान्तर हिरण्यगर्भ से ही बनाये गये हैं। ये गतिमय हैं, अतः सर्प कहलाते हैं। सब प्राणी भी इन्हीं में रहकर गति कर रहे हैं। २. (ये के च) = जो कोई भी लोक (पृथिवीम् अनु) = पृथिवी के अनुगत हैं, इस पृथिवी के समान ही प्राणियों की उत्पत्ति-स्थिति का स्थान बने हुए हैं, ३. (ये अन्तरिक्षे) = जो लोक इस विशाल अन्तरिक्ष में विद्यमान हैं, ४. (ये दिवि) = जो लोक देदीप्यमान द्युलोक में अवस्थित हैं, ५. (तेभ्यः सर्पेभ्यः) = उन सब लोक-लोकान्तरों से हमें (नमः) = अन्न की प्राप्ति हो । (नमः सर्पेभ्यः अस्तु) = हम उन लोकों के प्रति नतमस्तक होते हैं। उन लोकों में विद्यमान प्रभु की महिमा को देखकर हमारा मस्तक झुक जाता है। ६. पृथिवी पर तो अन्न उत्पन्न होता ही है, अन्तरिक्षस्थ मेघ वृष्टि के द्वारा उस अन्न की उत्पत्ति का कारण बनता है और द्युलोकस्थ सूर्य अन्तरिक्ष में मेघों के निर्माण का कारण बनता है। इस प्रकार ये सब लोक हमें अन्न प्राप्त कराते हैं, अतः मन्त्र में कहा है कि 'इन लोकों' से हमें अन्न प्राप्त हो। इस सारी व्यवस्था को देखकर हमें उस प्रभु की महिमा का दर्शन व स्मरण होता है। हम नतमस्तक हो जाते हैं और 'नमोऽस्तु ते' कह उठते हैं।

    भावार्थ

    भावार्थ-लोकत्रयी में निर्मित सभी पिण्ड प्रभु की महिमा को प्रकट कर रहे हैं और उन लोकों के द्वारा हमारी अन्न- प्राप्ति की सुन्दर व्यवस्था हो रही है।

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    हे माणसांनो ! जितके दृश्य व अदृश्य गोल आकाश मार्गात आपापल्या कक्षेत नियमाने फिरत असतात त्या सर्व गोलांतील प्राण्यांसाठी ईश्वराने अन्न निर्माण केलेले आहे व त्यावर सर्वांचे जीवन अवलंबून आहे. हे तुम्ही जाणा.

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    विषय

    मनुष्यांनी जगात कसे वागावे (आचरण कसे असावे) याविषयी पुढील मंत्रात प्रतिपादन केले आहे-

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ : या जगात जे जेवढे (के) लोक लोकांतर आणि प्राणी आहेत, (तेभ्य:) (सर्पेभ्य:) त्या लोकांतील प्राण्यांसाठी (नम:) अन्न, (भोजनादी) (अस्तु) असो (आम्ही ईश्‍वरोपासक सर्वांसाठी परमेश्‍वराकडे ही प्रार्थना करीत आहोत) तसेच या (अंतरिक्षे) आकाशात (ये) जे प्राणी आहेत, (दिवि) प्रकाशमान सूर्य आदी लोकांमध्ये (ये) जे प्राणी आहेत (च) आणि (पृथिवीम्‌) (अनु) भूमीवर जे चालतात, त्या सर्व (सर्पेभ्य:) प्राण्यांसाठी (नम:) अन्न प्राप्त होवो (आम्ही अशी कामना व्यक्त करीत आहोत) ॥6॥

    भावार्थ

    भावार्थ - हे मनुष्यांनो, (तुम्ही हे जाणून घ्या की जेवढे लोक (गृह, नक्षत्रादी) डोळ्यांना दिसतात, आणि जे ग्रह नक्षत्रादी अतिदूरत्वामुळे दिसत नाहीत, ते सर्व लोकलोकांतर आपापल्या भ्रमणकक्षेत (नियमबद्धरीतीने आकाशमार्गात भ्रमण करतात. त्या सर्व लोकलोकांतरात जे प्राणी आहेत, परमेश्‍वराने त्यांच्याकरिता देखील अन्न-भोजनादीची व्यवस्था केलेली आहे. यामुळेच त्या प्राण्यांचे जीवन व अस्तित्व आहे. ही गोष्ट तुम्ही सर्वांनी नीट जाणून घ्यावी. ॥6॥

    टिप्पणी

    (टीप : नम- या शब्दाचा एक अर्थ अन्नदेखील आहे. त्यासाठी प्रमाण निघंटुशण तसेच सर्प या शब्दाचा अर्थ-ये सर्पन्ति गच्छन्ति ते लोका: म्हणजे लोक अर्थात्‌ ‘भ्रमण करणारे ते ग्रह नक्षत्रादी’ असाही अर्थ आहे. त्यात प्रमाण शतपथ ब्राह्मण 7/3/1/25॥- वरील दोन प्रमाण महर्षिदयानंदाचा संस्कृत वेदभाष्यावरून मंत्रार्थाच्या स्पष्टतेकरिता विशेषत्वाने दिले आहेत) ॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    May the denizens of all planets of the universe obtain food. May all the living creatures residing in the atmosphere, the sun and roaming on the earth obtain food.

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    Meaning

    For all those that move in space, and those which move on the earth, which move in the regions of heaven and those which move about in the sky between earth and heaven, for all these moving forms of existence Nature has provided food, the means of sustenance.

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    Translation

    Our homage be to all the crawling creatures, that are on the earth. To those crawling ones, that are in the mid-space, and that are in the heaven, we pay our homage too. (1)

    Notes

    Sarpebhyah to the crawling creatures; to the serpents. Or, इमे वै लोका: सर्पा: these worlds (stars and planets) аге sarpas (Satapatha, VII. 4. 1. 25) as they crawl (in the sky). Namah, homage, obeisance. नम: इति अन्न नामसु पकठितम् (Nighantu, II. 7), food.

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    बंगाली (1)

    विषय

    মনুষ্যৈরত্র কথং বর্ত্তিতব্যমিত্যাহ ॥
    মনুষ্যদিগকে সংসারে কেমন ব্যবহার করা উচিত এই বিষয় পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ- যে (কে) কেউ এই জগতে লোক-লোকান্তর ও প্রাণী, (তেভ্যঃ) সেই সব (সর্পেভ্যঃ) লোকদের জীব হেতু (নমঃ) অন্ন (অস্তু) হউক, (য়ে) যাহা (অন্তরিক্ষে) আকাশে (য়ে) যাহা (দিবি) প্রকাশমান সূর্য্যাদি লোকে (চ) এবং (য়ে) যাহা (পৃথিবীম্) ভূমির (অনু) উপর চলে সেই সব (সর্পেভ্যঃ) প্রাণিদিগের জন্য (নমঃ) অন্ন প্রাপ্ত হউক ॥ ৬ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ- হে মনুষ্যগণ ! যত লোক লোকান্তর দৃশ্যমান এবং যাহা দৃশ্যমান নহে উহারা সকলে নিজ নিজ কক্ষে নিয়মপূর্বক স্থির হইয়া আকাশমার্গে পরিভ্রমণ করে সেই সকলের মধ্যে যে প্রাণী চলমান তাহাদের জন্য অন্নও ঈশ্বর রচনা করিয়াছেন, যদ্দ্বারা এই সবের জীবন রচিত হয় এই কথাকে তোমরা জানো ॥ ৬ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    নমো॑ऽস্তু স॒র্পেভ্যো॒ য়ে কে চ॑ পৃথি॒বীমনু॑ ।
    য়েऽ অ॒ন্তরি॑ক্ষে॒ য়ে দি॒বি তেভ্যঃ॑ স॒র্পেভ্যো॒ নমঃ॑ ॥ ৬ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    নমোऽস্ত্বিত্যস্য হিরণ্যগর্ভ ঋষির্দেবতা চ । ভুরিগুষ্ণিক্ ছন্দঃ ।
    ঋষভঃ স্বরঃ ॥

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