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यजुर्वेद अध्याय - 13

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  • यजुर्वेद - अध्याय 13/ मन्त्र 51
    ऋषिः - विरूप ऋषिः देवता - अग्निर्देवता छन्दः - भुरिक्कृतिः स्वरः - निषादः
    107

    अ॒जो ह्य॒ग्नेरज॑निष्ट॒ शोका॒त् सोऽ अ॑पश्यज्जनि॒तार॒मग्रे॑। तेन॑ दे॒वा दे॒वता॒मग्र॑मायँ॒स्तेन॒ रोह॑माय॒न्नुप॒ मेध्या॑सः। श॒र॒भमा॑र॒ण्यमनु॑ ते दिशामि॒ तेन॑ चिन्वा॒नस्त॒न्वो निषी॑द। श॒र॒भं ते॒ शुगृ॑च्छतु॒ यं द्वि॒ष्मस्तं ते॒ शुगृ॑च्छतु॥५१॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒जः। हि। अ॒ग्नेः। अज॑निष्ट। शोका॑त्। सः। अ॒प॒श्य॒त्। ज॒नि॒तार॑म्। अग्रे॑। तेन॑। दे॒वाः। दे॒वता॑म्। अग्र॑म्। आ॒य॒न्। तेन॑। रोह॑म्। आ॒य॒न्। उप॑। मेध्या॑सः। श॒र॒भम्। आ॒र॒ण्यम्। अनु॑। ते॒। दि॒शा॒मि॒। तेन॑। चि॒न्वा॒नः। त॒न्वः᳖। नि। सी॒द॒। श॒र॒भम्। ते॒। शुक्। ऋ॒च्छ॒तु॒। यम्। द्वि॒ष्मः। तम्। ते॒। शुक्। ऋ॒च्छ॒तु॒ ॥५१ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अजो ह्यग्नेरजनिष्ट शोकात्सोऽअपश्यज्जनितारमग्रे । तेन देवा देवतामग्रमायँस्तेन रोहमायन्नुप मेध्यासः । शरभमारण्यमनु ते दिशामि तेन चिन्वानस्तन्वो नि षीद । शरभन्ते शुगृच्छतु यन्द्विष्मस्तन्ते शुगृच्छतु ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    अजः। हि। अग्नेः। अजनिष्ट। शोकात्। सः। अपश्यत्। जनितारम्। अग्रे। तेन। देवाः। देवताम्। अग्रम्। आयन्। तेन। रोहम्। आयन्। उप। मेध्यासः। शरभम्। आरण्यम्। अनु। ते। दिशामि। तेन। चिन्वानः। तन्वः। नि। सीद। शरभम्। ते। शुक्। ऋच्छतु। यम्। द्विष्मः। तम्। ते। शुक्। ऋच्छतु॥५१॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 13; मन्त्र » 51
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    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनर्मनुष्यैः के पशवो न हन्तव्याः के च हन्तव्या इत्याह॥

    अन्वयः

    हे राजंस्त्वं यो ह्यजोऽजनिष्ट सोऽग्रे जनितारमपश्यत्, येन मेध्यासो देवा अग्रं देवतां सुखमुपायन्, येन रोहमुपायन्, तेनोत्तमगुणतामग्रं सुखं तेन वृद्धिं च प्राप्नुहि। यमारण्यं शरभं तेऽनुदिशामि तेन चिन्वानः संस्तन्वो निषीद। तं शरभं ते शुगृच्छतु, यं ते तवारिं वयं द्विष्मस्तं शोकादग्नेः शुगृच्छतु॥५१॥

    पदार्थः

    (अजः) छागः (हि) खलु (अग्नेः) पावकात् (अजनिष्ट) जायते (शोकात्) (सः) (अपश्यत्) पश्यति (जनितारम्) उत्पादकम् (अग्रे) (तेन) (देवाः) विद्वासः (देवताम्) दिव्यगुणताम् (अग्रम्) उत्तमं सुखम् (आयन्) यन्ति प्राप्नुवन्ति (तेन) (रोहम्) प्रादुर्भावम् (आयन्) प्राप्नुवन्तु (उप) (मेध्यासः) पवित्राः सन्तः (शरभम्) शल्यकम् (आरण्यम्) जंगलोत्पन्नम् (अनु) (ते) (दिशामि) (तेन) (चिन्वानः) अग्रे पूर्ववत्। [अयं मन्त्रः शत॰७.५.२.३६ व्याख्यातः]॥५१॥

    भावार्थः

    राजजनैरजादीनहत्वा संरक्ष्यैते उपकाराय संयोजनीयाः। ये शुभपशुपक्षिहिंसका भवेयुस्ते भृशं ताडनीयाः। यदि शल्यकी हानिकारिका स्यात्, तर्हि सा प्रजापालनाय हन्तव्या॥५१॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर मनुष्यों को कौन से पशु न मारने और कौन से मारने चाहियें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

    पदार्थ

    हे राजन्! तू जो (हि) निश्चित (अजः) बकरा (अजनिष्ट) उत्पन्न होता है, (सः) वह (अग्रे) प्रथम (जनितारम्) उत्पादक को (अपश्यत्) देखता है, जिससे (मेध्यासः) पवित्र हुए (देवाः) विद्वान् (अग्रम्) उत्तम सुख और (देवताम्) दिव्यगुणों के (उपायन्) उपाय को प्राप्त होते हैं और जिससे (रोहम्) वृद्धियुक्त प्रसिद्धि को (आयन्) प्राप्त होवें, (तेन) उससे उत्तम गुणों, उत्तम सुख तथा (तेन) उससे वृद्धि को प्राप्त हो। जो (आरण्यम्) बनैली (शरभम्) शेही (ते) तेरी प्रजा को हानि देने वाली है, उसको (अनुदिशामि) बतलाता हूं, (तेन) उससे बचाए हुए पदार्थ से (चिन्वानः) बढ़ता हुआ (तन्वः) शरीर में (निषीद) निवास कर और (तम्) उस (शरभम्) शल्यकी को (ते) तेरा (शुक्) शोक (ऋच्छतु) प्राप्त हो और (ते) तेरे (यम्) जिस शत्रु से हम लोग (द्विष्मः) द्वेष करें, उसको (शोकात्) शोकरूप (अग्नेः) अग्नि से (शुक्) शोक अर्थात् शोक से बढ़कर शोक अत्यन्त शोक (ऋच्छतु) प्राप्त होवे॥५१॥

    भावार्थ

    मनुष्यों को उचित है कि बकरे और मोर आदि श्रेष्ठ पशु पक्षियों को न मारें और इनकी रक्षा कर के उपकार के लिये संयुक्त करें और जो अच्छे पशुओं और पक्षियों के मारने वाले हों, उनको शीघ्र ताड़ना देवें। हां, जो खेती को उजाड़ने हारे श्याही आदि पशु हैं, उन को प्रजा की रक्षा के लिये मारें॥५१॥

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    विषय

    पशुगण की रक्षा, मनुष्य, अश्व आदि एक शक, गौ आदि दुधार पशु, भेड, बकरी, इनकी रक्षा और हिंसकों के नाश का आदेश ।

    भावार्थ

    ( अज: ) अज, अजन्मा, ज्ञानी आत्मा, जीव ( अग्ने: ) अग्नि ज्ञानमय तेजोमय परमेश्वर के ( शोकात ) तेज से ( अज- निष्ट ) ज्ञानवान् और तेजस्वी हो जाता है। तभी वह ( अग्रे ) अपने से भी पूर्व विद्यमान ( जनितारम् ) समस्त जगत् का और अपने भी उत्पादक परमेश्वर का ( अपश्यत् ) साक्षात् करता है । ( तेन ) उसी अजन्मा आत्मा के द्वारा (देवाः) विद्वान् जन अथवा इन्द्रिय-क्रीढी पुरुष भी (अग्रम्) उत्तम ( देवताम् ) देव भाव को ( आयन ) प्राप्त होते हैं । और ( तेन ) उसी के बल पर ( मेध्यासः ) पवित्रात्मा जन या ज्ञानवान् पुरुष ( रोहम् )उन्नत पद को या पुनः जन्म भाव को ( आयन् ) प्राप्त करते हैं ( ते ) तुमको मैं ( आरण्यं शरभम् ) जंगली शरभ अर्थात् हिंस्क व्याघ्र पशु का ( अनु दिशामि ) स्वरूप दर्शाता हूं | ( तेन ) उसके समान चिन्वानि: ) अपने रक्षा साधनों का संग्रह करता हुआ बलवान् होकर तु ( तन्वः ) अपने शरीर की रक्षा के लिये ( निषीद ) स्थिर होकर रह । ( ते शुक्) तेरा शोक संताप और पीड़ा जनक कार्य ( शरभं ऋच्छतु ) 'शरभ' नाम पशु या हिंसक पुरुष को प्राप्त हो । और (यं द्विष्मः ) जिससे हम द्वेष करते हैं ( तं ते शुक्र ऋच्छतु ) उसका तुम्हारा, पीड़ा-सतांप जनक क्रोध प्राप्त हो । शत० ७ । ५ । २ । ३६ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अग्निर्देवता । भुरिक् कृतिः । निषादः ॥

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    विषय

    अज-शरभ

    पदार्थ

    १. (अज:) = [अज गतिक्षेपणयोः] क्रियाशीलता के द्वारा सब बुराइयों को दूर निराकृत करनेवाला जीव (हि) = निश्चय से (अग्नेः शोकात्) = प्रभु की ज्ञान दीप्ति से (अजनिष्ट) = विकास को प्राप्त होता है, अर्थात् जब जीव निरन्तर कर्मों में लगा रहकर अपने से मलों को दूर रखता है तब उसके हृदय में प्रभु के ज्ञान का प्रकाश होता है, इस ज्ञान-प्रकाश से इसकी शक्तियों का प्रादुर्भाव होता है। २. (सः) = यह विकसित शक्तियोंवाला जीव (अग्रे) = अपने सामने (जनितारम्) = अपने पिता प्रभु को (अपश्यत्) = देखता है। इसे प्रभु का साक्षात्कार होता है । ३. (तेन) = उस प्रभु से ही (देवा:) = सब देव (अग्रे) = सृष्टि के प्रारम्भ में (देवताम्) = देवत्व को (आयन्) = प्राप्त होते हैं। सूर्यादि को वे प्रभु ही दीप्ति देते हैं। अग्नि आदि ऋषियों को भी प्रभु ही हैं । ४. (तेन) = उस प्रभु से ही (रोहम्) = वृद्धि को (आयन्) = प्राप्त होते हैं और उप उस प्रभु के समीप रहते हुए (मेध्यासः) = पवित्र बने रहते हैं। दूध प्रस्तुत प्रकरण में इस मन्त्र के पूर्वार्ध का अर्थ इस प्रकार है- १. (अज:) = यह उछलने-कूदनेवाली बकरी (अग्नेः शोकात्) = अग्नि की दीप्ति से प्रकट होती है इसके शरीर व दूध आदि में उष्णता होती है। इसका (सहवास) = इनके बीच में उठना-बैठना - क्षयरोगी को भी फिर से शक्ति प्रदान करा देता है। २. (सः) = यह (अजः) = बकरी का दूध (अग्रे जनितारम्) = उस सृष्टि के उत्पादक प्रभु को (अपश्यत्) = दिखाता है [अन्तर्भावितण्यर्थोऽत्र दृशि : ] । अत्यन्त सात्त्विक होने से यह दूध मानव-मन को बड़ा निर्मल कर देता है, उस निर्मल मन में प्रभुदर्शन सम्भव होता है। २. (तेन) इसी अजा पय से-बकरी के से (देवा:) = सब देव - विद्वान् (देवताम्) = ज्ञान-दीप्ति को (अग्रे आयन्) = सर्वप्रथम प्राप्त करते हैं। इससे बुद्धि तीव्र होती है। ४. (तेन) = इस दूध से (रोहम्) = शक्ति की वृद्धि को अथवा सर्वाङ्गीण उन्नति को (आयन्) = प्राप्त होते हैं और (मेध्यासः) = पवित्र बनकर उप उस प्रभु के समीप पहुँचते हैं। एवं अत्यन्त उपयोगी होने से यह बकरी तो अहन्तव्य है ही। प्रभु कहते हैं कि ५. (आरण्यं शरभम्) = इस वन्य शरभ को (ते) = तुझे (अनुदिशामि) = देता हूँ। (तेन) = उससे (तन्वः) = शरीर की शक्तियों का (चिन्वानः) = चयन करता हुआ (निषीद) = तू इस शरीर में स्थित हो। ६. (ते शुक्) = तेरा क्रोध (शरभम्) = कृषि-विनाशक शरभ को (ऋच्छतु) = प्राप्त हो, (तम्) = उसी शरभ को (ते शुक् ऋच्छतु) = तेरा क्रोध प्राप्त हो यं (द्विष्मः) = जिसे कृष्यादि विनाश के कारण हम अप्रिय समझते हैं।

    भावार्थ

    भावार्थ - हम 'अज' की रक्षा करें। अप्रीतिकर हानिकर शरभ को दूर करें।

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    शेळी, मोर इत्यादी चांगल्या पशूंना, पक्ष्यांना माणसांनी मारू नये. त्यांचे रक्षण करून त्यांचा लाभ करून घ्यावा. जे चांगल्या पशू पक्ष्यांना मारतात त्यांना ताबडतोब शिक्षा करावी. शेतीची नासाडी करणाऱ्या पशूंना मारावे. कारण त्यामुळे प्रजेचे रक्षण होते.

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    विषय

    कोणत्या प्रकारच्या पशूंचा नाश योग्य आहे आणि कोणत्या प्रकारचे पशू अवधान आहे, पुढील मंत्रात याविषयी प्रतिपादन केले आहे -

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - हे राजा, (हि) निश्‍चित आहे की (अज:) बकरा (अजनिष्ट जेव्हां उत्पन्न होतो, तेव्हां (स:) पो (अग्रे) पाहिले आपल्या (जनितारम्‌) उत्पादकता, (आईला) (अपश्‍यत्य) पाहतो. (त्याप्रमाणे विद्वान लोक उत्पादकाचा (परमेश्‍वराला सर्वप्रथम ध्यान करतात. त्या ध्यानाने) (मेध्यास:) पवित्र झालेले (देवा:) विद्वज्जन (अग्रम्‌) उत्कृष्ट सुख आणि (देवताम्‌) दिव्य गुण (उपायम्‌) प्राप्त करतात आणि त्या दिव्यगुणांनी (रोहम्‌) त्यांना उन्नती आणि यश (आयन्‌) प्राप्त व्हावे (वा होते) (तेन) त्या सद्गुणांनी विद्वानांना उत्तम सुख प्राप्त होते आणि (तेन) त्यामुळे त्यांची सतत प्रगती होत जाते. (हे राजन्‌, तुझ्या राज्यात) हे (आरण्यम्‌) वन्य जीव (शरभम्‌) सावाळ (उंदीर, घुस आदी विनाशक प्राणी) की जे (ते) तुझ्या प्रजेला त्रास देतात, त्या प्राण्यांविषयी तुला माहिती आणि त्यांच्या नाशाविषयी (अनुदिशामि) आदेश देत आहे. (तेन) त्या प्राण्यापासून वाचवून जे धान्यादी पदार्थ शेष राहतात, त्यांनी तू (चिन्वीन:) वृद्धी वा प्रगती करीत रहा. आणि (तन्व:) आपल्या स्वस्थ नीरोग शरीरासह (निषीद) निवांत रहा. तसेच (तम्‌) त्या (शरभम्‌) सायकाला (उंदीर, घूस, कीटक आदी पीकनाशक प्राणी) (ते) तुझा (शुक्‌) शोक (ऋच्छतु) प्राप्त होवो. (ते प्राणी दुखी वा नष्ट व्हावेत) याशिवाय (ते) तुझ्या (यम्‌) ज्या शत्रूचा आम्ही (प्रजाजन) (द्विष्म:) द्वेष करतो, त्याला तून आपल्या (शोकात्‌) (अग्ने:) शोक (वा क्रोध) रुप अग्नीने (जाळून टाक) म्हणजे तो शत्रू शोकग्रस्त अथवा अति शोकग्रस्त (ऋच्छतु) होवो (अशी आमची इच्छा आहे) ॥51॥

    भावार्थ

    भावार्थ - मनुष्यांसाठी हे उचित आहे की, बकरा, मोर आदी पुश-पक्ष्यांची हत्या करू नये-उलट त्यांचे रक्षण-पालन करून सर्वांच्या उपकारांकरिता उपयोगात आणावेत. जे दुष्टजन चांगल्या हितकर पशु-पक्ष्यांची हत्या करीत असतील, त्यांची शीघ्र दंडित करावे. मात्र शेतीचा नाश करणारे जे सपाळ आदी प्राणी आहेत, प्रजेच्या हितासाठी त्या प्राण्यांना मारायला हरकत नाही. ॥51॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    The unborn soul is educated through the power of God. He then sees God, existing before the creation of the universe, and the Generator of all. The learned, through that soul, attain to pre-eminent godly life ; and the virtuous to an exalted position. I point out to thee, O king, the forest porcupine. Utilising her add to thy prosperity and physical strength. Let the untamed porcupine be put to grief by thee. Let thy foe, whom we dislike be put to grief by thee.

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    Meaning

    The unborn individual soul was born in this world from the flame of the Supreme Lord’s cosmic yajna of creation. It grew conscious and had a vision of the creator right there. By virtue of the vision and grace of the Lord, the pious souls, purified by the vision, realise the divine powers and rise to the heights of existence. Agni, noble ruler/noble man, I point out to the wild sharabha (fabulous antelope of the snowy forest, mightier than the lion and the elephant). Like that, defend yourself and grow, and growing thereby, be happy and feel satisfied and settled by yourself. Let your concern address the sharabha. Let your concern be directed to those who hurt us.

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    Translation

    The he-goat was born from the heat of the fire. He saw first of all his procreator. Thereby the enlightened ones attained the godhead and thereby the sacrificers ascended to heaven. I offer to you the wild Sarabha (the precursor of goat); consuming him and flourishing thereon may you be seated here. May your burning heat go to the Sarabha; may your burning heat go to him whom we hate. (1)

    Notes

    Agneh Sokat, from the heat of the fire. Or, from the heat of the Prajüpati, the creatot. Janitaram, जनयितारं, creator; procreator. Devatam, देवभावं, godliness; godhead. Roham, रोहणीयं स्वर्गं, heaven worth ascending to. Medhyasah, मेध्या यज्ञयोग्या यजमाना:, sacrificers worthy of performing sacrifices.

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    बंगाली (1)

    विषय

    পুনর্মনুষ্যৈঃ কে পশবো ন হন্তব্যাঃ কে চ হন্তব্যা ইত্যাহ ॥
    পুনঃ মনুষ্যদিগকে কোন্ পশু না মারিবার এবং কোন্ পশু মারিবার যোগ্য বলা হইয়াছে – এই বিষয় পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ- হে রাজন্ ! যে (হি) নিশ্চিত (অজঃ) ছাগল (অজনিষ্ঠ) উৎপন্ন হয় (সঃ) সে (অগ্রে) প্রথম (জনিতারম্) উৎপাদককে (অপশ্যৎ) দেখে যার ফলে (মেধ্যাসঃ) পবিত্র হওয়া (দেবাঃ) বিদ্বান্ (অগ্রম্) উত্তম সুখ এবং (দেবতাম্) দিব্যগুণের (উপায়ন্) উপায়কে প্রাপ্ত হয় এবং যদ্দ্বারা (রোহম্) বুদ্ধিযুক্ত প্রসিদ্ধিকে তুমি (আয়ন্) প্রাপ্ত হইবে । (তেন) তাঁহার দ্বারা উত্তম গুণ উত্তম সুখ তথা (তেন) তাহার দ্বারা বৃদ্ধিকে প্রাপ্ত হইবে । যে (আরণ্যম্) বন্য (শরভম্) সজারু (তে) তোমার প্রজার ক্ষতি প্রদান করে তাহাকে (অনুদিশামি) বলিতেছি (তেন) তাহার দ্বারা রক্ষিত পদার্থ দ্বারা (চিন্বানঃ) বর্দ্ধমান (তন্বঃ) শরীরে (নিষীদ) নিবাস কর এবং (তম্) সেই (শরভম্) শরভকে (তে) তোমার (শুক্) শোক (ঋচ্ছতু) প্রাপ্ত হউক এবং (তে) তোমার (য়ম্) যে শত্রুকে আমরা দ্বেষ করি তাহাকে (শোকাৎ) শোকরূপ (অগ্নেঃ) অগ্নি দ্বারা (শুক্) শোক অর্থাৎ শোক হইতে বেশী শোক অত্যন্ত শোক (ঋচ্ছতু) প্রাপ্ত হউক ॥ ৫১ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ- মনুষ্যদিগের উচিত যে, ছাগ ও ময়ুরাদি শ্রেষ্ঠ পশুদিগকে মারিবে না এবং ইহাদের রক্ষা করিয়া উপকারের জন্য সংযুক্ত করিবে এবং যে ভাল পশু ও পক্ষীর হত্যাকারী হইবে তাহাদিগকে শীঘ্র তাড়না দিবে । তবে যে ক্ষেতকে ধ্বংসকারী পঙ্গপালাদি আছে তাহাদিগকে প্রজার রক্ষার নিমিত্ত মারিবে ॥ ৫১ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    অ॒জো হ্য॒গ্নেরজ॑নিষ্ট॒ শোকা॒ৎ সোऽ অ॑পশ্যজ্জনি॒তার॒মগ্রে॑ ।
    তেন॑ দে॒বা দে॒বতা॒মগ্র॑মায়ঁ॒স্তেন॒ রোহ॑মায়॒ন্নুপ॒ মেধ্যা॑সঃ ।
    শ॒র॒ভমা॑র॒ণ্যমনু॑ তে দিশামি॒ তেন॑ চিন্বা॒নস্ত॒ন্বো᳕ নি ষী॑দ ।
    শ॒র॒ভং তে॒ শুগৃ॑চ্ছতু॒ য়ং দ্বি॒ষ্মস্তং তে॒ শুগৃ॑চ্ছতু ॥ ৫১ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    অজ ইত্যস্য বিরূপ ঋষিঃ । অগ্নির্দেবতা । ভুরিক্ কৃতিশ্ছন্দঃ ।
    নিষাদঃ স্বরঃ ॥

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