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यजुर्वेद अध्याय - 7

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  • यजुर्वेद - अध्याय 7/ मन्त्र 1
    ऋषिः - गोतम ऋषिः देवता - प्राणो देवता छन्दः - निचृत् आर्षी अनुष्टुप्, स्वरः - पञ्चमः
    496

    वा॒चस्पत॑ये पवस्व॒ वृष्णो॑ऽअ॒ꣳशुभ्यां॒ गभ॑स्तिपूतः। दे॒वो दे॒वेभ्यः॑ पवस्व॒ येषां॑ भा॒गोऽसि॑॥१॥

    स्वर सहित पद पाठ

    वा॒चः। पत॑ये। प॒व॒स्व॒। वृष्णः॑। अ॒ꣳशुभ्या॒मित्य॒ꣳशुऽभ्या॑म्। गभ॑स्तिपूत॒ इति॒ गभ॑स्तिऽपूतः॒। दे॒वः। दे॒वेभ्यः॑। प॒व॒स्व॒। येषा॑म्। भा॒गः। असि॑ ॥१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    वाचस्पतये पवव वृष्णो अँशुभ्याङ्गभस्तिपूतः । देवो देवेभ्यः पवस्व येषां भागो सि ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    वाचः। पतये। पवस्व। वृष्णः। अꣳशुभ्यामित्यꣳशुऽभ्याम्। गभस्तिपूत इति गभस्तिऽपूतः। देवः। देवेभ्यः। पवस्व। येषाम्। भागः। असि॥१॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 7; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    संस्कृत (2)

    विषयः

    तस्य प्रथममन्त्रे सृष्टिनिमित्तो बाह्याभ्यन्तरव्यवहार उपदिश्यते॥

    अन्वयः

    हे मनुष्य! त्वं वाचस्पतये पवस्व, वृष्णोंशुभ्यामिव बाह्यभ्यन्तरव्यवहाराय गभस्तिपूत इव देवो भूत्वा येषां विदुषां भागोऽसि, तेभ्यो देवेभ्यः पवस्व॥१॥

    पदार्थः

    (वाचः) वाण्याः (पतये) पालकेश्वराय (पवस्व) पवित्रो भव (वृष्णः) वीर्य्यवतः (अंशुभ्याम्) बाहुभ्यामिव (गभस्तिपूतः) गभस्तिभिः किरणैः पूत इव। गभस्तय इति रश्मिनामसु पठितम्। (निघं॰१।५) (देवः) विद्वान् (देवेभ्यः) विद्वद्भ्यः (पवस्व) शुद्धो भव (येषाम्) विदुषाम् (भागः) भजनीयः (असि)॥ अयं मन्त्रः (शत॰४। १। १। ८-११) व्याख्यातः॥१॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। सर्वेषां जीवानां योग्यतास्ति वेदपतिं सततं पूतं परमेश्वरं विज्ञाय विदुषां सङ्गमेन विद्यादिगुणेषु सुस्नाताः सत्यवागनुष्ठातारः स्युरिति॥१॥

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    विषयः

    तस्य प्रथमन्त्रे सृष्टिनिमित्तो बाह्याभ्यन्तरव्यवहार उपदिश्यते॥

    सपदार्थान्वयः

    हे मनुष्य ! त्वं वाचस्पतये वाण्याः पालकेश्वराय पवस्व पवित्रो भव, वृष्णो वीर्यवतः अंशुभ्यां बाहुभ्याम् इव बाह्याभ्यन्तरव्यवहाराय गभस्तिपूतः गभस्तिभिः=किरणैः पूतः इव देवः विद्वान् भूत्वा येषां=विदुषां भागः भजनीयः असि, तेभ्यो देवेभ्यः विद्वद्यःःा पवस्व शुद्धो भव ।। ७ । १ ।। [हे मनुष्य! त्वं वाचस्पतये पवस्व,.....देवो भूत्वा येषां विदुषां भागोऽसि तेभ्यो देवेभ्यः पवस्व]

    पदार्थः

    (वाचः) वाण्याः (पतये) पालकेश्वराय (पवस्व) पवित्रो भव (वृष्णः) वीर्य्यवतः (अंशुभ्याम्) बाहुभ्यामिव (गभस्तिपूतः) गभस्तिभिः=किरणैः पूत इव। गभस्तय इति रश्मिनामसु पठितम् ॥ निघं १ । ५ ॥ (देव:) विद्वान् (देवेभ्यः) विद्वद्भ्यः (पवस्व ) शुद्धो भव (येषाम्) विदुषाम् (भागः) भजनीय: (असि)॥ अयं मंत्रः शत० ४ । १ । १ । ८-११ व्याख्यातः ॥ १ ॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः ॥ सर्वेषां जीवानां योग्यताऽस्तिवेदपतिं सततं पूतं परमेश्वरं विज्ञाय विदुषां सङ्गमेन विद्यादिगुणेषु सुस्नाताः सत्यवागनुष्ठातारः स्युरिति ॥ ७ । १ ।।

    विशेषः

    गोतमः। प्राणः=बाह्याभ्यन्तरव्यवहारः॥ निचृदार्ष्यनुष्टुप्। गान्धारः।।

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    हिन्दी (3)

    विषय

    इस सप्तम अध्याय के प्रथम मन्त्र में सृष्टि के निमित्त बाहर और भीतर के व्यवहार का उपदेश है॥

    पदार्थ

    हे मनुष्य तू (वाचः) वाणी के (पतये) पालन हारे ईश्वर के लिये (पवस्व) पवित्र हो, (वृष्णः) बलवान् पुरुष के (अंशुभ्याम्) भुजाओं के समान बाहर-भीतर वा व्यवहार होने के लिये जैसे (गभस्तिपूतः) सूर्य्य की किरणों से पदार्थ पवित्र जैसे होते हैं, वैसे शास्त्रों से (देवः) दिव्य-गुण युक्त विद्वान् होकर (येषाम्) जिन विद्वानों की (भागः) सेवन करने के योग्य है, उन (देवेभ्यः) देवों के लिये (पवस्व) पवित्र हो॥१॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। सब जीवों को योग्य है कि वेदों की रक्षा करने वाले नित्य पवित्र परमात्मा को जान और विद्वानों के संग से विद्यादि उत्तम गुणों में निष्णात होकर सत्यवाणी को बोलने वाले हों॥१॥

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    विषय

    पवित्रता

    पदार्थ

    १. पिछले अध्याय की समाप्ति इन शब्दों पर हुई थी कि ‘वे प्रभु जीव को उत्कृष्ट ज्ञान देते हैं—उत्कृष्ट शंसन करते हैं’, अतः प्रस्तुत अध्याय का प्रारम्भ इस प्रकार करते हैं कि ( वाचस्पतये ) = वाणी के पति प्रभु के लिए, उसको हृदयासीन करने के लिए ( पवस्व ) = तू अपने जीवन को पवित्र बना। प्रभु को अपने हृदय में आसीन करने का प्रकार यही है कि हम अपने हृदय को निर्मल और निर्मलतर बनाते चलें। 

    २. ‘हृदय को निर्मल कैसे बनाएँ?’ इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं कि ( वृष्णः ) = सब सुखों की वर्षा करनेवाले सोम की ( अंशुभ्याम् ) = [ अंश to divide ] भेदक शक्तियों से। शरीर में उत्पन्न होनेवाली वीर्यशक्ति ‘सोम’ है। इस सोम के अन्दर शरीर के रोगों व बुद्धि की मन्दता को दूर करने की क्षमता है। वही इसकी भेदक शक्ति है। इस सोम की भेदक शक्तियों से हमारा जीवन पवित्र हो जाता है और हम प्रभु के निवास के योग्य बनते हैं। 

    ३. ( गभस्तिपूतः ) = ज्ञान की रश्मियों से पवित्र हुआ-हुआ ( देवः ) = प्रभु का स्तोता बनकर [ दिव्+स्तुति ] ( देवेभ्यः ) = देवों के लिए तू ( पवस्व ) = अपने को पवित्र कर ले, अर्थात् ज्ञान+भक्ति से पवित्र हुआ तू देवों का निवासस्थान बन, ( येषाम् ) = जिन देवों का तू ( भागः ) = सेवनीय ( असि ) = है। सारे देव तुझमें आकर निवास करते हैं। तू ज्ञान व भक्ति से अपने कर्मों को पवित्र कर डाल, जिससे तू देवों का सेवनीय स्थान बना रहे। 

    ४. मन्त्र का ऋषि गोतम है। यह अपने जीवन को पवित्र करके देवों को अपनाता है। देवों का निवास-स्थान बनकर यह प्रभु को प्राप्त करनेवाला बनता है। ‘वाचस्पति’ प्रभु की प्राप्ति से इसे भी ज्ञान की वाणियाँ प्राप्त होती हैं और यह मन्त्र का ऋषि ‘गोतम’ = अत्यन्त प्रशस्त ज्ञान की वाणियोंवाला बनता है।

    भावार्थ

    भावार्थ — अपने जीवन को पवित्र करके तू प्रभु को प्राप्त कर और ज्ञानवाणियों को ग्रहण करके ‘गोतम’ बन। इस स्थिति में पहुँचने के लिए तू सोम की रक्षा कर। नीरोग व तीव्र बुद्धि बनकर तू देव बन।

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    विषय

    आज्ञापक और आज्ञाप्य और गुरु शिष्य का परस्पर पवित्र सम्बन्ध ।

    भावार्थ

    हे पुरुष ! तु ( वाचः पतये ) आज्ञा करने वाली वाणी के पालक अर्थात् स्वामी के लिये ( पवस्व ) पवित्र हो, उसकी आज्ञा पालन करने के निमित्त दत्तचित्त होकर चित्त से वैर आदि के भावों को त्याग कर । ( कृष्णः ) सूर्य के ( गभस्तिपूनः ) किरणों से जिस प्रकार वायु पवित्र होकर वाचःपति प्राण के लिये शरीर में जाता है इसी प्रकार ( वृष्णाः ) समस्त सुखों के वर्षक, राजा के ( गभस्तिपूतः ) ग्रहण करने के सामर्थ्य, तेज या प्रताप से पवित्र होकर और उसके ( अंशुभ्याम् ) दोनों प्रकार की बाह्य और आभ्यन्तर शक्तियों से पवित्र होकर तू स्वयं ( देवः ) देव, दान- शील, एवं विजिगीषु होकर ( येषाम् ) जिनका तू ( भागः असि ) स्वयं सेवनीय अंश है । ( देवेभ्यः ) उन, देव, विद्वानों के उपकार के लिये ( पव- स्व ) शुद्ध पवित्र होकर काम कर। जिस पुरुष को प्रथम राज कार्य में नियुक्त करे उसको अपने वाचस्पति अर्थात् अपने ऊपर के आज्ञादाता के प्रति स्वच्छ रहना चाहिये वह उसकी आज्ञा का कभी उल्लंघन न करे। वह स्वयं विद्वान्, उनके ही निमित्त उसको बद्ध करे। राजा से लेकर अन्तिम कर्म करने तक यहीं मन्त्र लागू हो पदाधिकारी स्वयं भी 'देव' अर्थात् राजा के स्वभाव का हो | 
    अध्यात्म में - अंशु प्रजापति आत्मा के दो भाग प्राण और उदान हैं । वायु उन द्वारा गृहीत होकर वाचस्पति आत्मा मुख्य प्रायण के लिये शरीर में गति करता है। वह स्वयं एक मुखगत 'देव' या कर्मेन्द्रिय होकर अन्य अंगों के या इन्दियों के लिये शरीर में गति करता है। इसी प्रकार राजा और मुख्य नियुक्त पुरुष भी अपने अधीन पदाधिकारियों के लिए पवित्र निष्कपट होकर काम करे । शतपथ में यह ग्रहों के प्रकरण में लिखा गया है । 'ग्रह' का अर्थ है राज्य को वश करने के निमित्त विशेष विभाग का अधिकारी। वे सब सोम राजा के ही अधिकार को बांट कर रहते हैं । शत० ४।१।१।८-१२ ॥ 
     यद् गृह्णाति तस्माद् ग्रहः । श० १० । १ । १ । ५ ॥ तं सोमम् अघ्नन् । तस्य यशो व्यगृह्णात ते ग्रहा अभवन् । यद्वित्तं ( यज्ञं ) गृहैर्व्यगृह्णात तद् ग्रहाणां ग्रहत्वम् । ए० ३ । ९ ॥ अध्यात्मम् ---अष्टौ महाः । प्रायः जिह्वा, वाक् चक्षुः, श्रोत्रम् मनो, हस्ती त्वक् च । श० १० । ६ । २ । १ । प्राणाः वै ग्रहाः । श० ४ । २ । ४ । १३ ।। अङ्गानि वै ग्रहाः । श० ४ । ५ । ९ । ११ । अर्थात् - जो ग्रहण करे सबको वश करे वह 'ग्रह' है । सोम को प्राप्त करके उसके विस्तार के टुकड़े २ कर दिये, राजा के अधिकार को विभक्त कर दिया, वे राजा के अधीन विभागों के अध्यक्ष 'ग्रह' होगये । यज्ञ अर्थात् प्रजापति राष्ट्र को विभक्त कर दिया वे 'ग्रह' हैं। शरीर में प्राण 'ग्रह' है अङ्ग 'ग्रह' है । 
    गभस्ति - गां भसति अदन्ति दीप्यन्ते वा गभस्तयः इति देवराजः । गृहेर्गभस्तिरिति माधवः । 
     

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    प्राणो देवता । भुरिगार्यनुष्टुप् । गांधारः ॥ 

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. सर्व माणसांनी वेदाचे रक्षण करणाऱ्या नित्य, पवित्र परमेश्वराला जाणावे आणि विद्वानांच्या संगतीत राहून उत्तम विद्या प्राप्त करावी, सत्यवचनी बनावे.

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    विषय

    आता सातव्या अध्यायाचा आरंभ होत आहे॥7॥^सातव्या अध्यायाच्या पहिल्या मंत्रात संसारामध्ये बाहेर व आंत (घरात व घराबाहेर समाजात) कसे वागावे, याविषयी उपदेश केला आहे.

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - हे मनुष्या, तू (वाच:) वाणीचा (पतये) स्वामी जो परमेश्वर, त्याच्यासाठी (पवस्व) पवित्र हो. (वाचस्पति) परमेश्वराच्या संसारात पवित्र वाणी व पवित्र आचरण ठेव (वृष्ण:) बलवान पुरुषाच्या (अंशुभ्य:) दोन्ही भुजा ज्याप्रमाणे शरीरातील व बाहेरील कर्म करण्यासाठी पवित्र असतात आणि (गभस्तिपूत:) सूर्याच्या किरणांनी ज्याप्रमाणे सर्व पदार्थ पवित्र व निर्मळ होतात, त्याप्रमाणे हे मनुष्या (अर्थात हे सर्व मनुष्यांनो, तुम्ही सर्वजण) (देव:) दिव्यगुणयुक्त न विद्वान व्हा. (येणां) ज्या विद्वानांचा जो (भाग:) सेवन करण्यास योग्य असा संग आहे, त्या (देवेभ्य:) विद्वज्जनांसाठी (पवस्व) तू पवित्र हो तुम्हा व्हा. (विद्वानांच्या संगतीत राहून जीवन पवित्र करू घे)

    भावार्थ

    भावार्थ - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमा अलंकार आहे सर्व मनुष्यांसाठी उचित कर्म आहे की त्यांनी वेदांचे रक्षण करणार्‍या ईश्वरास जाणावे आणि विद्वज्जनांच्या संगतीत राहून विद्या आदी उत्तम गुण धारणा करावीत. तसेच गुणवंत होऊन सत्यभाषी व्हावे. ॥1॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    O man, for realising God, the Lord of Speech purify thy mind. Just as objects are purified by the rays of the sun, so purify thyself with the outward and inward powers of a strong king. Be a learned man, work pure-heartedly for the sages, who are adorable by thee.

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    Meaning

    Be pure for the Lord of Divine speech, purged as you are by the rays of the sun and the moon, two arms of the Creator whereby He showers life with vitality and purity. You are a part of the brilliant and the generous, a darling of the gods. Be pure for them.

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    Translation

    O bliss divine, being purified by the rays of the sun, may you move for the sake of vital breath. (1) Being yourself a bounty of Nature, go to other bounties part of whom you are. (2)

    Notes

    Vacaspataye, प्रणो वै वाचस्पति: इति श्रुते:. the vital breath is called ' vacaspati; also, master of the speech. Pavasva, go; move. पव to move.

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    बंगाली (1)

    विषय

    ॥ ও৩ম্ ॥
    অথ সপ্তমাধ্যায়ারম্ভঃ
    এখন সপ্তম অধ্যায়ের প্রারম্ভ করা হইতেছে ॥
    ও৩ম্ বিশ্বা॑নি দেব সবিতর্দুরি॒তানি॒ পরা॑ সুব । য়দ্ভ॒দ্রং তন্ন॒ऽআ সু॑ব ॥ য়জুঃ৩০.৩ ॥তস্য প্রথমমন্ত্রে সৃষ্টিনিমিত্তো বাহ্যাভ্যন্তরব্যবহার উপদিশ্যতে ॥
    এই সপ্তম অধ্যায়ের প্রথম মন্ত্রে সৃষ্টির নিমিত্ত বাহির ও ভিতরের ব্যবহারের উপদেশ আছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ- হে মনুষ্য! তুমি (বাচঃ) বাণীর (পতয়ে) পালক ঈশ্বরের জন্য (পবস্ব) পবিত্র হও । (বৃষ্ণঃ) বলবান্ পুরুষের (অংশুভ্যাম্) ভুজ-সমান বাহির - ভিতরের ব্যবহার হইবার জন্য যেমন (গভস্তিপূতঃ) সূর্য্যের কিরণ দ্বারা পদার্থ পবিত্র হয় সেইরূপ শাস্ত্র দ্বারা (দেবঃ) দিব্য গুণযুক্ত বিদ্বান্ হইয়া (য়েষাম্) যে সব বিদ্বান্দিগকে (ভাগঃ) সেবন করিবার যোগ্য সে সব (দেবেভ্যঃ) দেবতাদিগের জন্য (পবস্ব) পবিত্র হও ॥ ১ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ- এই মন্ত্রে বাচকলুপ্তোপমালংকার আছে । সকল জীবদিগের উচিত যে, বেদ-রক্ষক নিত্য পবিত্র পরমাত্মা কে জানিয়া এবং বিদ্বান্দিগের সঙ্গ দ্বারা বিদ্যাদি উত্তম গুণে নিষ্ণাত হইয়া সত্যবাণী বলে ॥ ১ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    বা॒চস্পত॑য়ে পবস্ব॒ বৃষ্ণো॑ऽঅ॒ꣳশুভ্যাং॒ গভ॑স্তিপূতঃ ।
    দে॒বো দে॒বেভ্যঃ॑ পবস্ব॒ য়েষাং॑ ভা॒গোऽসি॑ ॥ ১ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    বাচস্পতয় ইত্যস্য গোতম ঋষিঃ । প্রাণো দেবতা । নিচৃদার্ষ্যনুষ্টুপ্ ছন্দঃ । গান্ধারঃ স্বরঃ ॥

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