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अथर्ववेद के काण्ड - 13 के सूक्त 2 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 2/ मन्त्र 16
    ऋषिः - ब्रह्मा देवता - रोहितः, आदित्यः, अध्यात्मम् छन्दः - आर्षी गायत्री सूक्तम् - अध्यात्म सूक्त
    75

    उदु॒ त्यं जा॒तवे॑दसं दे॒वं व॑हन्ति के॒तवः॑। दृशे विश्वा॑य॒ सूर्य॑म् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    उत् । ऊं॒ इति॑ । त्यम् । जा॒तऽवे॑दसम् । दे॒वम् । व॒ह॒न्त‍ि॒ । के॒तव॑: । दृ॒शे । विश्वा॑य । सूर्य॑म् ॥२.१६॥


    स्वर रहित मन्त्र

    उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः। दृशे विश्वाय सूर्यम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    उत् । ऊं इति । त्यम् । जातऽवेदसम् । देवम् । वहन्त‍ि । केतव: । दृशे । विश्वाय । सूर्यम् ॥२.१६॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 13; सूक्त » 2; मन्त्र » 16
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।

    पदार्थ

    (केतवः) किरणें (त्यम्) उस (जातवेदसम्) उत्पन्न पदार्थों को प्राप्त करनेवाले, (देवम्) चलते हुए (सूर्यम्) रविमण्डल को (विश्वाय दृशे) सबके देखने के लिये (उ) अवश्य (उत् वहन्ति) ऊपर ले चलती हैं ॥१६॥

    भावार्थ

    जिस प्रकार सूर्य किरणों के आकर्षण से ऊँचा होकर सब पदार्थों को प्रकट करता है, वैसे ही मनुष्य विद्या और धर्म से उन्नति करके सबका उपकार करें ॥१६॥यह मन्त्र ऋग्वेद में है−१।५०।१, यजु–० ७।४१, ३३।३१ तथा सामवेद पू० १।३।५। तथा निरु० १२।१५। में व्याख्यात है ॥

    टिप्पणी

    १६−(उत्) ऊर्ध्वम् (उ) निश्चये (त्यम्) तम् (जातवेदसम्) यो जातान् पदार्थान् विन्दति तम् (देवम्) गच्छन्तम् (वहन्ति) गमयन्ति (केतवः) किरणाः (दृशे) द्रष्टुम् (विश्वाय) सर्वस्मै जगते (सूर्यम्) रविमण्डलम् ॥

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    विषय

    जातवेदा देवः सूर्य' का धारण

    पदार्थ

    १. (केतवः) = ज्ञानीपुरुष (त्यम्) = उस (जातवेदसम्) = [जातेजाते विद्यते] सर्वत्र व्याप्त [जातं जातं वेत्ति] सर्वज्ञ प्रभु को (उ) = निश्चय से (उद् वहन्ति) = हृदय में धारण करते हैं। प्रभु (देवम्) = प्रकाशमय हैं, (सूर्यम्) = सूर्यसम ज्योति हैं, अथवा सबको हृदयस्थरूपेण प्रेरणा देनेवाले हैं [सुवति]। २. ये ज्ञानी पुरुष इसलिए प्रभु को हदयों में धारण करते हैं, जिससे (दृशे विश्वाय) = सम्पूर्ण संसार का दर्शन कर सकें। प्रभु के हृदय में होने पर यह सब-कुछ ज्ञात हो ही जाता है।

    भावार्थ

    ज्ञानी लोग हृदयों में प्रभु का स्मरण करते हैं, जिससे सम्पूर्ण संसार का ज्ञान प्राप्त कर सकें।

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    भाषार्थ

    (केतवः) रश्मियां (त्यम्) उस (जातवेदसम्) ऐश्वर्योत्पादक, (देवम्) द्योतमान (सूर्यम्) सूर्य को, (विश्वाय दृशे) सब को दर्शाने के लिये, (उद् उ वहन्ति) ऊपर आकाश या द्युलोक में चला रही हैं।

    टिप्पणी

    [(यजू० ७।४१; ८।४१; ३३।३१; अथर्व० २०।४७।१३)। इन स्थानों में कहीं-कहीं मन्त्र के आध्यात्मिक अर्थ भी हैं, प्रकरण की दृष्टि से]।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Rohita, the Sun

    Meaning

    That watchful sun, divine illuminant of all things in existence, that infinite giver, the radiations of cosmic energy bear and carry on, and that, the rays of light irradiate for all the world to see (for their own benefit).

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    Translation

    The banners of glory speak high of God, who knows all that lives, that all may look on Him. (See also Rg. 1.50.1)

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    Translation

    The rays for the looking of people glow this sun which is luminous and is present in all the produced objects by medium of heat.

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    Translation

    The learned exalt the Omniscient God, and exert to visualize Him, the Urger of the whole universe.

    Footnote

    See Rig, 1-50-1, Yajur, 7-4-1, Atharva, 20-47-13.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १६−(उत्) ऊर्ध्वम् (उ) निश्चये (त्यम्) तम् (जातवेदसम्) यो जातान् पदार्थान् विन्दति तम् (देवम्) गच्छन्तम् (वहन्ति) गमयन्ति (केतवः) किरणाः (दृशे) द्रष्टुम् (विश्वाय) सर्वस्मै जगते (सूर्यम्) रविमण्डलम् ॥

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