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अथर्ववेद के काण्ड - 13 के सूक्त 2 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 13/ सूक्त 2/ मन्त्र 40
    ऋषि: - ब्रह्मा देवता - रोहितः, आदित्यः, अध्यात्मम् छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - अध्यात्म सूक्त
    28

    रोहि॑तो लो॒को अ॑भव॒द्रोहि॒तोऽत्य॑तप॒द्दिव॑म्। रोहि॑तो र॒श्मिभि॒र्भूमिं॑ समु॒द्रमनु॒ सं च॑रत् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    रोहि॑त: । लो॒क: । अ॒भ॒व॒त् । रोहि॑त: । अति॑ । अ॒त॒प॒त् । दिव॑म् । रोहि॑त: । र॒श्मिऽभि॑: । भूमि॑म् । स॒मु॒द्रम् । अनु॑ । सम् । च॒र॒त् ॥२.४०॥


    स्वर रहित मन्त्र

    रोहितो लोको अभवद्रोहितोऽत्यतपद्दिवम्। रोहितो रश्मिभिर्भूमिं समुद्रमनु सं चरत् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    रोहित: । लोक: । अभवत् । रोहित: । अति । अतपत् । दिवम् । रोहित: । रश्मिऽभि: । भूमिम् । समुद्रम् । अनु । सम् । चरत् ॥२.४०॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 13; सूक्त » 2; मन्त्र » 40
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    पदार्थ -
    (रोहितः) सर्वजनक [परमेश्वर] (लोकः) लोकोंवाला [सब लोकों का स्वामी] (अभवत्) हुआ, (रोहितः) सर्वोत्पादक [ईश्वर] ने (दिवम्) सूर्य को (अति) अत्यन्त करके (अतपत्) तापवाला किया। (रोहितः) सर्वस्रष्टा [ईश्वर] ने (रश्मिभिः) [सूर्य की] किरणों से (भूमिम्) भूमि और (समुद्रम्) अन्तरिक्ष [आकाशस्थ चन्द्र तारागण आदि लोकसमूह] को (अनु) अनुकूलता से (सं चरत्) संचारवाला किया ॥४०॥

    भावार्थ - परमेश्वर ने सब लोकों का स्वामी होकर सूर्य द्वारा उन में ताप पहुँचाकर उनमें घूमने और चलने की शक्ति दी है ॥४०॥


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    Meaning -
    Rohita is the world in existence as the sun is itself the earthly world, Rohita gives the light and fire to the solar region, and Rohita radiates over earth and the seas with its rays.


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