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अथर्ववेद के काण्ड - 13 के सूक्त 2 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 2/ मन्त्र 21
    ऋषिः - ब्रह्मा देवता - रोहितः, आदित्यः, अध्यात्मम् छन्दः - आर्षी गायत्री सूक्तम् - अध्यात्म सूक्त
    86

    येना॑ पावक॒ चक्ष॑सा भुर॒ण्यन्तं॒ जनाँ॒ अनु॑। त्वं व॑रुण॒ पश्य॑सि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    येन॑ । पा॒व॒क॒ । चक्ष॑सा । भु॒र॒ण्यन्त॑म् । जना॑न् । अनु॑ । त्वम् । व॒रु॒ण॒ । पश्य॑सि ॥२.२१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    येना पावक चक्षसा भुरण्यन्तं जनाँ अनु। त्वं वरुण पश्यसि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    येन । पावक । चक्षसा । भुरण्यन्तम् । जनान् । अनु । त्वम् । वरुण । पश्यसि ॥२.२१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 13; सूक्त » 2; मन्त्र » 21
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।

    पदार्थ

    (पावक) हे पवित्र करनेवाले ! (वरुण) हे उत्तम गुणवाले ! [सूर्य, रविमण्डल] (येन) जिस (चक्षसा) प्रकाश से (भुरण्यन्तम्) धारण और पोषण करते हुए [पराक्रम] को (जनान् अनु) उत्पन्न प्राणियों में (त्वम्) तू (पश्यसि) दिखाता है ॥२१॥यह मन्त्र ऋग्वेद में है−१।५०।६, यजु० ३३।३२, और साम पू० ६।१४।१—१ ॥

    भावार्थ

    जैसे सूर्य अपने प्रकाश से वृष्टि आदि द्वारा अपने घेरे के सब प्राणियों और लोकों को धारण-पोषण करता है, वैसे ही मनुष्य सर्वोपरि विराजमान परमात्मा के ज्ञान से परस्पर सहायक होकर सुखी होवें ॥२१, २२॥मन्त्र २२ कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१।५०।७। और साम० पू० ६।१४।१२ ॥

    टिप्पणी

    २१−(येन) (पावक) शोधक (चक्षसा) प्रकाशेन (भुरण्यन्तम्) भुरण धारणपोषणयोः-शतृ। धरन्तं पोषयन्तं च (जनान् अनु) उत्पन्नान् प्राणिनः प्रति (त्वम्) (वरुण) उत्तमगुणविशिष्ट (पश्यसि) दर्शयसि ॥

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    विषय

    भुरण्यन्-लोकभरण करनेवाला

    पदार्थ

    १. हे पावक-प्रकाश से जीवनों को पवित्र करनेवाले! हे वरुण सब रोगों व आसुर भावनाओं का निवारण करनेवाले सूर्य! त्वम्-त् जनान् भुरण्यन्तम्-लोगों का भरण व पोषण करनेवाले को-लोकों के धारणात्मक कर्मों में लगे हुए पुरुष को येन चक्षसा-जिस प्रकाश से अनुपश्यसि-अनुकूलता से देखता है, उसी प्रकाश को हम प्राप्त करें। वही प्रकाश हमसे स्तुति के योग्य हो। २. जो लोग द्वेष का निवारण करके [वरुण] अपने हृदय को पवित्र बनाकर [पावक] लोकहितकारी कार्यों में प्रवृत्त होते हैं [भुरण्यन्तम्] उनके लिए सूर्य का प्रकाश सदा हितकारी होता है। वस्तुत: हमारी वृत्ति उत्तम हो तो संसार भी हमारे लिए उत्तम होता है। हमारी दृष्टि में न्यूनता आने पर प्रकृति के देवता भी हमारे लिए उतने हितकर नहीं रहते।

    भावार्थ

    सूर्य का प्रकाश उनके लिए हितकर होता है जो लोकों का भरण करनेवाले होते है।

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    भाषार्थ

    (पावक वरुण) हे पवित्र करने वाले श्रेष्ठ सूर्य! (येना चक्षसा) जिस कृपा दृष्टि से (जनान् अनु) मनुष्यों में (भुरण्यन्तम्) प्रगति शील मनुष्य को (त्वं पश्यसि) तू देखता है। [उस कृपा दृष्टि से मुझे भी देख]।

    टिप्पणी

    [सूर्य के प्रकाश में कई व्यक्ति उद्यमशील हो कर सफलता प्राप्त करते हैं, और कई उद्यमशील होते हुए भी सफलता प्राप्त नहीं करते। यह विषमता अपने-अपने कर्मों के अनुसार है। परन्तु असफल व्यक्ति भी सफलता के अभिलाषी तो होते ही है, अतः ये भी कृपा दृष्टि चाहते हैं। भुरण्यति गतिकर्मा (निघं० २।१४)]।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Rohita, the Sun

    Meaning

    Lord purifier and sanctifier, lord of light and judgement, with the eye with which you watch the mighty world of dynamic activity, holding every thing in equipoise, with the same kind and benign eye, watch and bless us.

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    Translation

    It is your divine light that purifies our soul, and keeps us away from evil thoughts and actions. (See also Rg. 1.50.6)

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    Translation

    Let this purifying sun make us see all the objects through that light causing sight, whereby this appears to be seen by the man giving food and vigour to all the men.

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    Translation

    . O Pure, Adorable God, behold us with the same eye of compassion,with which thou beholdest the benevolent one among mankind!

    Footnote

    See Rig, 1-50-6.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २१−(येन) (पावक) शोधक (चक्षसा) प्रकाशेन (भुरण्यन्तम्) भुरण धारणपोषणयोः-शतृ। धरन्तं पोषयन्तं च (जनान् अनु) उत्पन्नान् प्राणिनः प्रति (त्वम्) (वरुण) उत्तमगुणविशिष्ट (पश्यसि) दर्शयसि ॥

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