ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 45/ मन्त्र 10
ऋषिः - त्रिशोकः काण्वः
देवता - इन्द्र:
छन्दः - निचृद्गायत्री
स्वरः - षड्जः
वृ॒ज्याम॑ ते॒ परि॒ द्विषोऽरं॑ ते शक्र दा॒वने॑ । ग॒मेमेदि॑न्द्र॒ गोम॑तः ॥
स्वर सहित पद पाठवृ॒ज्याम॑ । ते॒ । परि॑ । द्विषः॑ । अर॑म् । ते॒ । श॒क्र॒ । दा॒वने॑ । ग॒मेम॑ । इत् । इ॒न्द्र॒ । गोऽम॑तः ॥
स्वर रहित मन्त्र
वृज्याम ते परि द्विषोऽरं ते शक्र दावने । गमेमेदिन्द्र गोमतः ॥
स्वर रहित पद पाठवृज्याम । ते । परि । द्विषः । अरम् । ते । शक्र । दावने । गमेम । इत् । इन्द्र । गोऽमतः ॥ ८.४५.१०
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 45; मन्त्र » 10
अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 43; मन्त्र » 5
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अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 43; मन्त्र » 5
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भाष्य भाग
इंग्लिश (1)
Meaning
Indra, we would wholly give up those who are contrary and opposed to you, and surely in matters of your cherished love and charity, blest with lands and cows, literature and culture, we would come close to you.
मराठी (1)
भावार्थ
त्या अंतरात्म्याचे गुण ओळखा. जो कोणी ते जाणून त्याला शुद्ध बनवितो व पापापासून बचाव करतो तो ईश्वराद्वारे पुष्कळ प्राप्त करतो. हे माणसांनो! तो ‘शक्र’ आहे, तो महादंडधारी आहे. त्याला पापाचरणाची स्वाभाविकरीत्या घृणा आहे. त्याची उपासना करा. ॥१०॥
संस्कृत (1)
विषयः
N/A
पदार्थः
हे शक्र=शक्तिसम्पन्न अन्तरात्मन् । वयमुपासकाः । ते=तव । द्विषः=द्वेष्टॄन् पापाचारान् । परिवृज्याम=नोपगच्छेम । किन्तु । हे इन्द्र ! गोमतः=प्रशस्तेन्द्रिययुक्तस्य । ते=तव । दावने=दानाय । अरं=पर्य्याप्तम् । गमेम इत्=गच्छेमैव ॥१० ॥
हिन्दी (3)
विषय
N/A
पदार्थ
(शक्र) हे शक्तिसम्पन्न अन्तरात्मन् ! हम उपासक (ते) तेरे (द्विषः) द्वेषी पापाचारों को (परि+वृज्याम) सर्वथा त्याग देवें उनके निकट न जावें किन्तु (गोमतः) प्रशस्त इन्द्रियों से युक्त (ते) तेरे (दावने) दान के लिये (इन्द्र) हे इन्द्र ! (गमेम+इत्) तेरे निकट अवश्य पहुँचे ॥१० ॥
भावार्थ
इस अन्तरात्मा के गुण पहिचानो । जो कोई इसे जान इसको शुद्ध बनाता और पापों से बचाता है, वह इसके द्वारा बहुत कुछ पाता है । हे मनुष्यों ! यह शक्र है । यह महादण्डधारी है । इसको पापाचार से स्वभावतः घृणा है । इसकी उपासना करो ॥१० ॥
विषय
उसके कर्त्तव्य।
भावार्थ
हे ( शक्र ) शक्तिशालिन् ! हम ( ते द्विषः ) तेरे शत्रुओं को ( अरं ) खूब ( परि वृज्याम ) दूर करें। ( गोमतः ते ) भूमि, वाणी [ हुकूमत ] और गवादि पशु सम्पन्न जितेन्द्रिय ( ते दावने ) तेरे दिये अन्न, भूमि, ज्ञान, शासन, वेतनादि प्राप्त करने के लिये ( ते गमेम इत् ) तुझे अवश्य प्राप्त करें।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
त्रिशोकः काण्व ऋषिः॥ १ इन्द्राग्नी। २—४२ इन्द्रो देवता॥ छन्दः—॥ १, ३—६, ८, ९, १२, १३, १५—२१, २३—२५, ३१, ३६, ३७, ३९—४२ गायत्री। २, १०, ११, १४, २२, २८—३०, ३३—३५ निचृद् गायत्री। २६, २७, ३२, ३८ विराड् गायत्री। ७ पादनिचृद् गायत्री॥
विषय
ते द्विषः परिवृज्याम
पदार्थ
[१] हे प्रभो! हम (ते) = आपके (द्विषः) = द्वेष करनेवाले लोगों को (परिवृज्याम) = दूर से छोड़नेवाले हों, ऐसे पुरुषों के संग में न बैठें। हे (शक्र) = सर्वशक्तिमन् प्रभो ! हम (ते दावने) = आपके दान में (अरं) = खूब हों, अर्थात् आपकी देनों को खूब ही प्राप्त करें। [२] हे (इन्द्र) = ज्ञानरूप परमैश्वर्यवाले प्रभो! हम (गोमतः) = प्रशस्त ज्ञान की वाणियोंवाले आपके समीप (इत्) = निश्चय से (गमेमः) = जाएँ । आपके समीप प्राप्त होकर हम इन ज्ञान की वाणियों को प्राप्त करें।
भावार्थ
भावार्थ- प्रभु के द्वेषियों से हम दूर रहें। प्रभु से दातव्य धनों को खूब ही प्राप्त करें । प्रशस्त ज्ञान की वाणियोंवाले प्रभु के समीप खूब ही ज्ञानों को प्राप्त करें।
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