ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 45/ मन्त्र 40
भि॒न्धि विश्वा॒ अप॒ द्विष॒: परि॒ बाधो॑ ज॒ही मृध॑: । वसु॑ स्पा॒र्हं तदा भ॑र ॥
स्वर सहित पद पाठभि॒न्धि । विश्वाः॑ । अप॑ । द्विषः॑ । परि॑ । बाधः॑ । ज॒हि । मृधः॑ । वसु॑ । स्पा॒र्हम् । तत् । आ । भ॒र॒ ॥
स्वर रहित मन्त्र
भिन्धि विश्वा अप द्विष: परि बाधो जही मृध: । वसु स्पार्हं तदा भर ॥
स्वर रहित पद पाठभिन्धि । विश्वाः । अप । द्विषः । परि । बाधः । जहि । मृधः । वसु । स्पार्हम् । तत् । आ । भर ॥ ८.४५.४०
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 45; मन्त्र » 40
अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 49; मन्त्र » 5
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अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 49; मन्त्र » 5
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भाष्य भाग
इंग्लिश (1)
Meaning
Break off all the jealous adversaries, remove all obstacles, eliminate the enemies and violence and fill the world with cherished wealth, honour and prosperity.
मराठी (1)
भावार्थ
या जगात द्वेष करणाऱ्या मनुष्य जाती किंवा पशू इत्यादी जाती किती हानी करणाऱ्या आहेत हे प्रत्यक्ष दिसते व उन्मत्त स्वार्थी राजे युद्ध करून सन्मार्गात किती बाधा आणतात हेही प्रत्यक्ष आहे. या दोन्हीपासून सुटका करून घेण्यासाठी वेदामध्ये वारंवार प्रार्थना केलेली आहे. या दोन्हींच्या अभावाने जगात सुख पसरते ॥४०॥
संस्कृत (1)
विषयः
N/A
पदार्थः
हे विश्वम्भर इन्द्र ! मम प्रार्थनां श्रुत्वा विश्वाः सर्वाः । द्विषः=द्वेष्टॄः प्रजाः । अपभिन्धि=दूरी कुरु । तथा बाधः=बाधयित्रीः । मृधः=संग्रामान् । परिजहि=परिहर । तत्=ततः । स्पार्हम्=स्पृहणीयम् । वसु=धनम् । जगति । आभर=पूरय ॥४० ॥
हिन्दी (3)
विषय
N/A
पदार्थ
हे विश्वम्भर इन्द्र ! मेरी प्रार्थना सुनकर (विश्वाः) समस्त (द्विषः) द्वेष करनेवाली प्रजाओं को (अपभिन्धि) इस संसार से उठा लो । और (बाधः) बाधाएँ डालनेवाले (मृधः) संग्रामों को भी (परि+जहि) निवारण करो । (तत्) तब इस संसार में (स्पार्हम्) स्पृहणीय (वसु) धन को (आभर) भर दो ॥४० ॥
भावार्थ
इस संसार में द्वेष करनेवाली मनुष्जाति या पशुप्रभृति जातियाँ कितनी हानि करनेवाली हैं, यह प्रत्यक्ष है और उन्मत्त स्वार्थी राजा लड़कर कितनी बाधाएँ सन्मार्ग में फैलाते हैं, यह भी प्रत्यक्ष ही है, अतः इन दोनों उपद्रवों से छूटने के लिये वारंवार वेद में प्रार्थना आती है और इन दोनों के अभाव होने से ही संसार में सुख पहुँचता है । इत्यादि ॥४० ॥
विषय
श्रेष्ठ राजा, उससे प्रजा की न्यायानुकूल नाना अभिलाषाएं।
भावार्थ
( विश्वाः द्विषः अप भिन्धि ) सत्र शत्रुओं को छिन्न भिन्न करके दूर कर। ( परि बाधः ) पीड़ित कर और ( मृधः जहि ) हिंसकों का नाश कर। ( तत् स्पार्हं वसु आ भर ) वह नाना उत्तम चाहने योग्य ऐश्वर्य हमें प्राप्त करा।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
त्रिशोकः काण्व ऋषिः॥ १ इन्द्राग्नी। २—४२ इन्द्रो देवता॥ छन्दः—॥ १, ३—६, ८, ९, १२, १३, १५—२१, २३—२५, ३१, ३६, ३७, ३९—४२ गायत्री। २, १०, ११, १४, २२, २८—३०, ३३—३५ निचृद् गायत्री। २६, २७, ३२, ३८ विराड् गायत्री। ७ पादनिचृद् गायत्री॥
विषय
'द्विषः, बाधः, मृधः ' अपजहि
पदार्थ
[१] हे प्रभो! आप (विश्वाः) = सब, हमारे अन्दर प्रविष्ट हो जानेवाली (द्विषः) = द्वेष की भावनाओं को (अपभिन्धि) = सुदूर विदीर्ण करिये। (बाधः) = हमें बाधा पहुँचानेवाली इन वासनाओं को (परि जहि) = सर्वथा नष्ट कर दीजिए (मृध:) = हमारा विनाश [हिंसन] करनेवाली वृत्तियों को भी विनष्ट करिये। [२] इसप्रकार हमें द्वेष व वासनाओं से रहित करके (तत्) = उस प्रसिद्ध (स्पाईं) = स्पृहणीय (वसु) = धन को (आभर) = सर्वथा प्राप्त कराइये।
भावार्थ
भावार्थ- प्रभु हमें द्वेष, वासना व हिंसक शत्रुओं से बचाकर स्पृहणीय धन को प्राप्त कराएँ।
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