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ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 45 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 45/ मन्त्र 15
    ऋषिः - त्रिशोकः काण्वः देवता - इन्द्र: छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः

    यस्ते॑ रे॒वाँ अदा॑शुरिः प्रम॒मर्ष॑ म॒घत्त॑ये । तस्य॑ नो॒ वेद॒ आ भ॑र ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यः । ते॒ । रे॒वान् । अदा॑शुरिः । प्र॒ऽम॒मर्ष॑ । म॒घत्त॑ये । तस्य॑ । नः॒ । वेदः॑ । आ । भ॒र॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यस्ते रेवाँ अदाशुरिः प्रममर्ष मघत्तये । तस्य नो वेद आ भर ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यः । ते । रेवान् । अदाशुरिः । प्रऽममर्ष । मघत्तये । तस्य । नः । वेदः । आ । भर ॥ ८.४५.१५

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 45; मन्त्र » 15
    अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 44; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    If a man is rich and yet neglects and fails to pay to you, generous one, wielder of power, what is due for social causes, in that case make up from his money or property what is required for our sake, i.e., for the sake of society.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    कृपण माणसाला धनाचा स्वामी कधी करू नये. ॥१५॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    N/A

    पदार्थः

    हे इन्द्र ! ईश ! तस्य=पुरुषस्य । वेदो धनम् । नोऽस्मभ्यम् । आभर=आहर । यः खलु रेवान्=धनवान् भूत्वाऽपि । ते=तव प्रीत्यर्थम् । दीनानां मध्ये । अदाशुरिः=अदाताऽस्ति । पुनः । मघत्तये । धनदानाय । प्रममर्ष=अभ्यसूयति ॥१५ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    N/A

    पदार्थ

    हे इन्द्र हे महेश ! आप (तस्य) उस कृपण पुरुष का (वेदः) धन (नः) हमारे लिये (आभर) ले आवें, (यः) जो (रेवान्) धनिक होकर भी (ते) आपके उद्देश से दीन दरिद्र मनुष्यों के मध्य (अदाशुरिः) कुछ नहीं देता, प्रत्युत (मघत्तये) धनदान करने के लिये (प्रममर्ष) अन्यान्य उदार पुरुषों की जो निन्दा किया करता है ॥१५ ॥

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    विषय

    उस से नाना प्रार्थनाएं, शरणयाचना।

    भावार्थ

    (यः) जो ( रेवान् ) धनवान् होकर भी ( अदाशुरिः ) दान, यज्ञादि नहीं करता और (ते मघत्तये) तेरे दिये पूज्य धन को लेने के लिये ( प्र ममर्ष ) बलात्कार करता है, ( तस्य वेदः ) उसका धन ( नः आभर ) हमें लादे। इति चतुश्चत्वारिंशो वर्गः॥

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    त्रिशोकः काण्व ऋषिः॥ १ इन्द्राग्नी। २—४२ इन्द्रो देवता॥ छन्दः—॥ १, ३—६, ८, ९, १२, १३, १५—२१, २३—२५, ३१, ३६, ३७, ३९—४२ गायत्री। २, १०, ११, १४, २२, २८—३०, ३३—३५ निचृद् गायत्री। २६, २७, ३२, ३८ विराड् गायत्री। ७ पादनिचृद् गायत्री॥

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    विषय

    रेवान् अदाशुरिः

    पदार्थ

    [१] हे प्रभो ! (यः) = जो (रेवान्) = धनवान् होकर (ते अदाशुरिः) = आपकी प्राप्ति के लिए यज्ञादि कर्मों में दानशील नहीं होता तथा (मघत्तये) = धन को देने के लिए (प्रममर्ष) = भूल जाता है व प्रमाद करता है। (तस्य वेदः) = उसके धन को (नः) = हमारे लिए (आभर) = प्राप्त कराइये। उससे धन को छीनकर दानशील व्यक्ति के लिए उस धन को प्राप्त कराइये। [२] वस्तुतः धन तो प्रभु का ही है। एक व्यक्ति तो उस धन को रक्षकमात्र है। प्रभु प्रेरणा के अनुसार उस धन का यज्ञादि में विनियोग ही ठीक है।

    भावार्थ

    भावार्थ- हम धन को प्रभु का समझते हुए, उसका यज्ञादि सत्कर्मों के लिए सदा दान करनेवाले हों, यही प्रभु प्राप्ति का मार्ग है। 'धनी अदाता' पुरुष प्रभु से सदा दूर है।

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