ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 45/ मन्त्र 16
इ॒म उ॑ त्वा॒ वि च॑क्षते॒ सखा॑य इन्द्र सो॒मिन॑: । पु॒ष्टाव॑न्तो॒ यथा॑ प॒शुम् ॥
स्वर सहित पद पाठइ॒मे । ऊँ॒ इति॑ । त्वा॒ । वि । च॒क्ष॒ते॒ । सखा॑यः । इ॒न्द्र॒ । सो॒मिनः॑ । पु॒ष्टऽव॑न्तः । यथा॑ । प॒शुम् ॥
स्वर रहित मन्त्र
इम उ त्वा वि चक्षते सखाय इन्द्र सोमिन: । पुष्टावन्तो यथा पशुम् ॥
स्वर रहित पद पाठइमे । ऊँ इति । त्वा । वि । चक्षते । सखायः । इन्द्र । सोमिनः । पुष्टऽवन्तः । यथा । पशुम् ॥ ८.४५.१६
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 45; मन्त्र » 16
अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 45; मन्त्र » 1
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अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 45; मन्त्र » 1
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भाष्य भाग
इंग्लिश (1)
Meaning
Indra, these friends, celebrants of soma and holiness, holding offerings of precious homage, look and wait for you as the seeker waits for the sight of his wealth.
मराठी (1)
भावार्थ
हे माणसांनो! प्रथम तुम्ही शुभकर्मी बना. मगच ईश्वराची प्रतीक्षा करा. नाहीतर तो तुमचा सखा कधीच होणार नाही. तुम्ही सर्वांचे सखा बना. कुणाच्या हानीची चिंता करू नका. पाहा या जगात तुम्हाला किती दिवस राहावयाचे आहे. ॥१६॥
संस्कृत (1)
विषयः
N/A
पदार्थः
हे इन्द्र ईश ! इमे । मम सखायः=सुहृदः । सोमिनः=शुभकर्मवन्तो भूत्वा । त्वा+उ=त्वामेव । विचक्षते । प्रतीक्षन्ते=त्वामेव पश्यन्ति । अत्र दृष्टान्तः । यथा पुष्टावन्तः=घासैर्युक्ताः स्वामिनः । पशुमपेक्षन्ते ॥१६ ॥
हिन्दी (3)
विषय
N/A
पदार्थ
(इन्द्र) हे ईश ! (इमे) ये मेरे (सखायः) जनसमुदायमित्र (सोमिनः) शुभकर्मी होकर (त्वा+उ) तेरी ओर देखते, तेरी ही प्रतीक्षा करते हैं । (यथा) जैसे (पुष्टावन्तः) घासों से पुष्ट स्वामी (पशुम्) अपने पशुओं की राह देखता है ॥१६ ॥
भावार्थ
हे मनुष्यों ! प्रथम तुम शुभकर्मी बनो, तब ईश्वर की प्रतीक्षा करो, अन्यथा तुम्हारा साथी वह कदापि न होगा । तुम सबके सखा बनो । किसी की हानि की चिन्ता मत करो । देखो, संसार में कितने दिन तुम्हें रहना है ॥१६ ॥
विषय
उस से नाना प्रार्थनाएं, शरणयाचना।
भावार्थ
( पुष्ट-वन्तः ) उत्तम हृष्ट पुष्ट पशु के स्वामी ( यथा पशुम् ) जिस प्रकार अपने पशु को विशेष स्नेह से देखते हैं उसी प्रकार हे ( इन्द्र ) ऐश्वर्यवन् ! ( सोमिनः सखायः ) ऐश्वर्यवान् मित्रगण (इमे) ये ( त्वा उ विचक्षते ) तुझे विशेष आदर और स्नेह से देखते हैं। और विविध प्रकार की स्तुति करते हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
त्रिशोकः काण्व ऋषिः॥ १ इन्द्राग्नी। २—४२ इन्द्रो देवता॥ छन्दः—॥ १, ३—६, ८, ९, १२, १३, १५—२१, २३—२५, ३१, ३६, ३७, ३९—४२ गायत्री। २, १०, ११, १४, २२, २८—३०, ३३—३५ निचृद् गायत्री। २६, २७, ३२, ३८ विराड् गायत्री। ७ पादनिचृद् गायत्री॥
विषय
सोमिनः सखायः
पदार्थ
[१] (इमे) = ये (सोमिन्ः) = सोम का रक्षण करनेवाले (सखायः) = सखा लोग सबके (मित्र उ) = ही हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (त्वा विचक्षते) - आपको देखते हैं। आपके दर्शन के पात्र से 'सोमी सखा' ही होते हैं। [२] इस प्रकार ये आपके दर्शन को करते हैं (यथा) = जैसे (पुष्टावन्तः) = पुष्टि के साधन - भूत घास को लिये हुए लोग (पशुम्) = गवादि पशु को देखते हैं। घास लेकर पशु के समीप लाया जाता है, सोम व मित्रभाव को लेकर प्रभु के समीप ।
भावार्थ
भावार्थ- हम सोम का रक्षण करते हुए तथा सबके साथ मित्रभाव से वर्तते हुए प्रभु का दर्शन करनेवाले बनें।
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