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ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 45 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 45/ मन्त्र 13
    ऋषिः - त्रिशोकः काण्वः देवता - इन्द्र: छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः

    वि॒द्मा हि त्वा॑ धनंज॒यमिन्द्र॑ दृ॒ळ्हा चि॑दारु॒जम् । आ॒दा॒रिणं॒ यथा॒ गय॑म् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    वि॒द्म । हि । त्वा॒ । ध॒न॒म्ऽज॒यम् । इन्द्र॑ । दृ॒ळ्हा । चि॒त् । आ॒ऽरु॒जम् । आ॒दा॒रिण॑म् । यथा॑ । गय॑म् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    विद्मा हि त्वा धनंजयमिन्द्र दृळ्हा चिदारुजम् । आदारिणं यथा गयम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    विद्म । हि । त्वा । धनम्ऽजयम् । इन्द्र । दृळ्हा । चित् । आऽरुजम् । आदारिणम् । यथा । गयम् ॥ ८.४५.१३

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 45; मन्त्र » 13
    अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 44; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    We know you, Indra, as our very haven and home, winner of wealth, honour and excellence, strong and firm, destroyer of evil and breaker of the strongholds of darkness, superstition and misery.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    परमेश्वराला जाणूनच त्याची उपासना केली पाहिजे. तो धनाचा स्वामी आहे, त्यामुळे धनासाठीही त्याची स्तुती करावी, तो दुष्टांचा नाश करणारा आहे व गृहाप्रमाणे रक्षक आहे. त्यासाठी सर्व कामना पूर्ण व्हाव्या यासाठी माणसाने त्याच्या जवळ जावे. ॥१३॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    N/A

    पदार्थः

    हे इन्द्र ! वयम् । त्वा=त्वाम् । विद्म हि=जानीमः खलु । कीदृशम् । धनंजयम् । दृळ्हाचित्=दृढानामपि शत्रूणाम् । आरुजम्=भक्तारम् । पुनः । आदारिणम्=आदर्त्तारम् । पुनः । यथा गयम् । गृहमिव उपद्रवेभ्यो रक्षकम् ॥१३ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    N/A

    पदार्थ

    (इन्द्र) परमैश्वर्य्यशालिन् देव (त्वाम्+विद्म+हि) तुझको हम उपासक जानते ही हैं, आपको (धनञ्जयम्) धनंजय (दृढा+चित्) दृढ शत्रुओं को भी (आरुजम्) भग्न करनेवाले (आदारिणम्) और विदीर्ण करनेवाले जानते हैं और (गयम्+यथा) जैसे गृह विविध उपद्रवों से रक्षक होता है, वैसे आप भी हमको नाना विघ्नों से बचाते हैं ॥१३ ॥

    भावार्थ

    परमेश्वर को जानकर ही उसकी उपासना करनी चाहिये । वह धन का स्वामी है, अतः धन पाकर भी उसी की स्तुति करें । वह दुष्टों को विदीर्ण करनेवाला है और गृहवद् रक्षक है, अतः सर्वकामनाओं के लिये उसी के निकट मनुष्य पहुँचे ॥१३ ॥

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    विषय

    गृहपतिवत् अग्नि प्रभु।

    भावार्थ

    हे ( इन्द्र ) शत्रुहन्तः ! ऐश्वर्यवन् ! द्रष्टः ! हम ( त्वा ) तुझ को ही ( धनं-जयम् ) सब ऐश्वर्यो को जीतने वाला ( दृढ़ा चित् आरुजम् ) शत्रु के दृढ़ से दृढ़ दुर्गों तक को तोड़ने वाला (विद्म हि) जानते हैं और (यथा गयं आदारिणम्) जिस प्रकार गृह उत्तम दारा अर्थात् धर्मपत्नी से युक्त होकर सुखप्रद होता है उसी प्रकार हम (त्वा) तुझ को भी (आदारिणम् विद्म) उत्तम गृहपतिवत् वा शत्रु जनों को आक्रमण कर छेदन भेदन करने में कुशल जानते हैं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    त्रिशोकः काण्व ऋषिः॥ १ इन्द्राग्नी। २—४२ इन्द्रो देवता॥ छन्दः—॥ १, ३—६, ८, ९, १२, १३, १५—२१, २३—२५, ३१, ३६, ३७, ३९—४२ गायत्री। २, १०, ११, १४, २२, २८—३०, ३३—३५ निचृद् गायत्री। २६, २७, ३२, ३८ विराड् गायत्री। ७ पादनिचृद् गायत्री॥

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    विषय

    धनञ्जयं आदारिणम्

    पदार्थ

    [१] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! हम (त्वा) = आपको (हि) = निश्चय से (धनञ्जयम्) = सब धनों का विजेता (विद्मा) = जानते हैं । सब धनों का विजय आप ही करते हैं। आप (दृढ़ाचित्) = प्रबल भी शत्रुओं का (आरुजं) = समन्तात् भंग करनेवाले हैं। [२] (आदारिणं) = शत्रुओं को छिन्न-भिन्न करनेवाले आपको हम (यथा गयम्) = घर के समान जानते हैं। आप हमारे लिए उपद्रवों से रक्षक गृह के समान हैं।

    भावार्थ

    भावार्थ:- प्रभु धनों के विजेता- शत्रुओं के छेत्ता व गृह के समान रक्षक हैं।

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