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ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 45 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 45/ मन्त्र 36
    ऋषिः - त्रिशोकः काण्वः देवता - इन्द्र: छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः

    मा सख्यु॒: शून॒मा वि॑दे॒ मा पु॒त्रस्य॑ प्रभूवसो । आ॒वृत्व॑द्भूतु ते॒ मन॑: ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    मा । सख्युः॑ । शून॑म् । आ । वि॒दे॒ । मा । पु॒त्रस्य॑ । प्र॒भु॒व॒सो॒ इति॑ प्रभुऽवसो । आ॒ऽवृत्व॑त् । भू॒तु॒ । ते॒ । मनः॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    मा सख्यु: शूनमा विदे मा पुत्रस्य प्रभूवसो । आवृत्वद्भूतु ते मन: ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    मा । सख्युः । शूनम् । आ । विदे । मा । पुत्रस्य । प्रभुवसो इति प्रभुऽवसो । आऽवृत्वत् । भूतु । ते । मनः ॥ ८.४५.३६

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 45; मन्त्र » 36
    अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 49; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    I pray I should never suffer want of friends, never be deprived of children. O lord of wealth, honour and grandeur of the world, let your mind turn to me with kindness.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    प्रत्येक माणसाने एवढा उद्योग अवश्य केला पाहिजे, ज्याद्वारे तो आपले घर व मित्रवर्गाला सुखी ठेवू शकेल. निरुद्योगी व आळशी पुरुष ईश्वराच्या राज्यात क्लेश भोगतात. निर्बुद्ध परंतु परिश्रमी पक्षी कसे प्रसन्न राहतात ते पाहा. ॥३६॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    N/A

    पदार्थः

    हे इन्द्र ! मम सख्युः=मित्रस्याहम् । शूनम्=शून्यं न्यूनताम् । मा+आविदे=न जानीयाम् । हे प्रभुवसो=बहुधनम् ! पुत्रस्य । शूनम् । मा+आविदे । ते तव मनः । आवृत्वत्=आवर्त्तताम् ॥३६ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    N/A

    पदार्थ

    (प्रभुवसो) हे समस्तसम्पत्तिसंयुक्त महेश ! मैं (सख्युः) अपने मित्रगण की (शूनम्) न्यूनता का (मा+आविदे) बोध न करूँ तथा (पुत्रस्य) पुत्र की न्यूनता का बोध (मा) मैं न करूँ, ऐसी कृपा आप करें । (ते+मनः) आपका मन (आवृत्वम्) इस मेरी प्रार्थना की ओर आवे ॥३६ ॥

    भावार्थ

    प्रत्येक आदमी को उतना उद्योग अवश्य करना चाहिये, जिससे कि वह अपने गृह तथा मित्र-वर्ग को सुखी रख सके । अनुद्योगी और आलसी पुरुष ही ईश्वर के राज्य में क्लेश पाते हैं । देखो, निर्बुद्धि परन्तु परिश्रमी पक्षिगण कैसे प्रसन्न रहते हैं ॥३६ ॥

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    विषय

    श्रेष्ठ राजा, उससे प्रजा की न्यायानुकूल नाना अभिलाषाएं।

    भावार्थ

    हे ( प्रभु-वसो ) प्रभूत धन के स्वामिन् ! प्रचुर प्रजा के स्वामिन् ! मैं ( सख्युः शूनम् मा आ विदे ) मित्र के सुखकारक धन को ( न अपहरण करूं। ( पुत्रस्य मा ) मैं पुत्र के धन को भी अपहरण न करूं। ( ते मनः ) तेरा मन ( आवृत्वत् भूतु ) हमारी ओर आने वाला, प्रेम अनुराग से युक्त हो।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    त्रिशोकः काण्व ऋषिः॥ १ इन्द्राग्नी। २—४२ इन्द्रो देवता॥ छन्दः—॥ १, ३—६, ८, ९, १२, १३, १५—२१, २३—२५, ३१, ३६, ३७, ३९—४२ गायत्री। २, १०, ११, १४, २२, २८—३०, ३३—३५ निचृद् गायत्री। २६, २७, ३२, ३८ विराड् गायत्री। ७ पादनिचृद् गायत्री॥

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    विषय

    मनः ते आवृत्वद् भवतु

    पदार्थ

    [१] (प्रभूवसो) = प्रभूत धन के स्वामिन् प्रभो ! (सख्युः) = मैं अपने मित्रों की (शूनं) = अशुभ धन आदि की वृद्धि का (मा आविदे) = मत आवेदन करता रहूँ। इसी प्रकार (पुत्रस्य) = पुत्र की भी अशुभ धनवृद्धि का (मा) = मत निवेदन करूँ। मेरे मित्र व सन्तान सब शुभ मार्ग से धन को कमानेवाले हों। [२] हे प्रभो ! (मनः) = हमारा मन (ते) = आपके प्रति (आवृत्वत्) = आवर्तनवाला भूतु हो । आपका स्मरण करते हुए हम स्वस्थ धनवृद्धिवाले बनें।

    भावार्थ

    भावार्थ- हमारे मित्र व हमारे सन्तान सब शुभमार्ग से धनवृद्धि को करें। हमारा मन सदा प्रभु के प्रति आवर्तनवाला हो ।

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