ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 45/ मन्त्र 3
अयु॑द्ध॒ इद्यु॒धा वृतं॒ शूर॒ आज॑ति॒ सत्व॑भिः । येषा॒मिन्द्रो॒ युवा॒ सखा॑ ॥
स्वर सहित पद पाठअयु॑द्धः । इत् । यु॒धा । वृत॑म् । शूरः॑ । आ । अ॒ज॒ति॒ । सत्व॑ऽभिः । येषा॑म् । इन्द्रः॑ । युवा॑ । सखा॑ ॥
स्वर रहित मन्त्र
अयुद्ध इद्युधा वृतं शूर आजति सत्वभिः । येषामिन्द्रो युवा सखा ॥
स्वर रहित पद पाठअयुद्धः । इत् । युधा । वृतम् । शूरः । आ । अजति । सत्वऽभिः । येषाम् । इन्द्रः । युवा । सखा ॥ ८.४५.३
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 45; मन्त्र » 3
अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 42; मन्त्र » 3
Acknowledgment
अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 42; मन्त्र » 3
Acknowledgment
भाष्य भाग
इंग्लिश (1)
Meaning
Unequalled is Indra, irresistible, even when there is no war. The mighty hero by the very force of his presence and character throws off the enemy supported by brave warriors all round. Blessed are they whose friend is Indra, the mighty youthful heroic soul.
मराठी (1)
भावार्थ
ईश्वराची उपासना व अग्निहोत्र इत्यादी कर्माचे सेवन करण्याने आत्मा बलवान होतो व आपले पाप दूर करण्याचा प्रयत्न करतो. पापाला आपल्या जवळपासही भटकू देत नाही. ॥४॥
संस्कृत (1)
विषयः
अनया फलमादिशति ।
पदार्थः
अग्निहोत्रेश्वरोपासनासहितः पुरुषः । अयुद्ध इत्=अयोद्धा अपि । शूरो वीरो भूत्वा । सत्त्वभिः=स्वकीयैरात्मबलैरेव । युधा=योद्धृगणैः । वृतमावृतमपि । शत्रुम् । अजति=प्रक्षिपति=दूरीकरोति । येषामिन्द्रो युवा सखा ॥३ ॥
हिन्दी (3)
विषय
इस ऋचा से फल दिखलाते हैं ।
पदार्थ
(येषाम्) जिन पुरुषों का (इन्द्रः) आत्मा (युवा+सखा) युवा और सखा है और जो अग्निहोत्र और ईश्वर की उपासनासहित है, (अयुद्धः+इत्) योद्धा न भी हों, तथापि (शूरः) शूरवीर होकर (सत्त्वभिः) निज आत्मिक बलों के साहाय्य से (युधा) विविध योद्धाओं से (वृतम्) आवृत शत्रु को भी (अजति) दूर फेंक देते हैं ॥३ ॥
भावार्थ
ईश्वर की उपासना और अग्निहोत्रादि कर्मों के सेवने से आत्मा बलिष्ठ होता है और अपने निकट भी पापों को नहीं आने देता है ॥३ ॥
विषय
प्रभु के उपासकों का महान् ऐश्वर्य।
भावार्थ
( येषाम् इन्द्रः युवा सखा ) जिनका मित्र, बलवान् शत्रुहन्ता है वह ( शूरः ) शूरवीर होकर ( सत्वभिः ) अपने बलों से ही ( युधावृतं ) योधा जन से घिरे, बड़े सैन्यवान् शत्रु को भी ( आ अजति ) उखाड़ डालता है और ( अयुद्ध ) उससे खूब युद्ध करता है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
त्रिशोकः काण्व ऋषिः॥ १ इन्द्राग्नी। २—४२ इन्द्रो देवता॥ छन्दः—॥ १, ३—६, ८, ९, १२, १३, १५—२१, २३—२५, ३१, ३६, ३७, ३९—४२ गायत्री। २, १०, ११, १४, २२, २८—३०, ३३—३५ निचृद् गायत्री। २६, २७, ३२, ३८ विराड् गायत्री। ७ पादनिचृद् गायत्री॥
विषय
शत्रु पराजय
पदार्थ
[१] (येषां) = जिनका (इन्द्रः) = शत्रुओं का विदावण करनेवाले प्रभु (युवा) = बुराइयों को दूर करनेवाला (सखा) = मित्र होता है, वह (अयुद्धः इत्) = योधा न होता हुआ भी (शूरः) = शूर बनता है और (युधावृतं) = योद्धाओं से (घिरे) = प्रबल शत्रु को भी (सत्वभिः) = व्रतों के द्वारा (आ अजति) = समन्तात् उखाड़ फेंकता है। [२] प्रभु की शक्ति से शक्तिसम्पन्न होकर यह काम-क्रोध-लोभ आदि प्रबल शत्रुओं को भी पराजित करनेवाला होता है।
भावार्थ
भावार्थ:- प्रभु की मित्रता में कोई भी शत्रु हमारे लिए अजेय नहीं होता।
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
N/A
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
N/A
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
N/A
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
Shri Virendra Agarwal
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal