ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 45/ मन्त्र 21
स्तो॒त्रमिन्द्रा॑य गायत पुरुनृ॒म्णाय॒ सत्व॑ने । नकि॒र्यं वृ॑ण्व॒ते यु॒धि ॥
स्वर सहित पद पाठस्तो॒त्रम् । इन्द्रा॑य । गा॒य॒त॒ । पु॒रु॒ऽनृ॒म्णाय । सत्व॑ने । नकिः॑ । यम् । वृ॒ण्व॒ते । यु॒धि ॥
स्वर रहित मन्त्र
स्तोत्रमिन्द्राय गायत पुरुनृम्णाय सत्वने । नकिर्यं वृण्वते युधि ॥
स्वर रहित पद पाठस्तोत्रम् । इन्द्राय । गायत । पुरुऽनृम्णाय । सत्वने । नकिः । यम् । वृण्वते । युधि ॥ ८.४५.२१
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 45; मन्त्र » 21
अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 46; मन्त्र » 1
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अष्टक » 6; अध्याय » 3; वर्ग » 46; मन्त्र » 1
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भाष्य भाग
इंग्लिश (1)
Meaning
Sing songs of adoration and prayer in honour of Indra, lord of world’s power and wealth. Who can ignore and neglect him in the battle of life?
मराठी (1)
भावार्थ
युद्धातही परमेश्वराचे गान करावे, कारण त्याच्याच कृपेने तेथेही विजय प्राप्त होतो. ॥२१॥
संस्कृत (1)
विषयः
N/A
पदार्थः
तस्मै । इन्द्राय । स्तोत्रम् । गायत । यम् । युधि=युद्धे । नकिः=न केऽपि । वृण्वते=निवारयितुं शक्नुवन्ति यद्वा युद्धाय स्वीकुर्वन्ति । कीदृशाय । पुरुनृम्णाय=बहुधनाय सर्वधनाय । पुनः । सत्वने=परमबलस्वरूपाय ॥२१ ॥
हिन्दी (3)
विषय
N/A
पदार्थ
हे मनुष्यों ! उस (इन्द्राय) परमात्मा के लिये (स्तोत्रम्+गायत) अच्छे-२ स्तोत्र गाओ (यम्) जिस इन्द्र को (युधि) युद्ध में (नकिः) कोई नहीं (वृण्वते) निवारण कर सकते, यद्वा जिसको युद्ध के लिये कोई स्वीकार नहीं करता है । पुनः वह इन्द्र कैसा है, (पुरुनृम्णाय) सर्वधनसम्पन्न और (सत्वने) परमबलस्वरूप ॥२१ ॥
भावार्थ
समर में भी परमात्मा का ही गान करे, क्योंकि उसी की कृपा से वहाँ भी विजय होती है ॥२१ ॥
विषय
उस से नाना प्रार्थनाएं, शरणयाचना।
भावार्थ
हे मनुष्यो ! ( यं ) जिसको (युधि) युद्ध में (नकिः वृण्वते) कोई रोक नहीं सकता, उस ( सत्वने ) बलशाली, ( पुरु-नृम्णाय ) बहुत धनों के स्वामी, ( इन्द्राय ) ऐश्वर्यवान् पुरुष के लिये ( स्तोत्रं गायत ) स्तुति-वचन, प्रशंसा का गान करो।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
त्रिशोकः काण्व ऋषिः॥ १ इन्द्राग्नी। २—४२ इन्द्रो देवता॥ छन्दः—॥ १, ३—६, ८, ९, १२, १३, १५—२१, २३—२५, ३१, ३६, ३७, ३९—४२ गायत्री। २, १०, ११, १४, २२, २८—३०, ३३—३५ निचृद् गायत्री। २६, २७, ३२, ३८ विराड् गायत्री। ७ पादनिचृद् गायत्री॥
विषय
'पुरुनृम्ण सत्वा' प्रभु
पदार्थ
[१] हे मनुष्यो ! (यं) = जिसको (युधि) = युद्ध में (नकिः वृण्वते) = कोई भी रोक नहीं सकता, उस (सत्वने) = बलशाली, शत्रुओं का सादन करनेवाले (पुरुनृम्णाय) = बहुत धनों व शक्तियों के स्वामी (इन्द्राय) = शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले प्रभु के लिए (स्तोत्रं गायत) = स्तुति का गायन करो। [२] इस संसार संघर्ष में प्रभु ने ही हमें विजय प्राप्त करानी है। प्रभु अनन्तशक्ति व धनवाले हैं, सब शत्रुओं का सादन करनेवाले हैं। प्रभु का गायन करते हुए उस शक्ति से शक्तिसम्पन्न होकर हम शत्रुओं को पराजित कर पाते हैं।
भावार्थ
भावार्थ - अनन्त शक्ति व धनवाले शत्रुसंहारक प्रभु का ही हम स्तवन करें। प्रभु युद्ध में अपराजेय हैं।
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