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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 1/ मन्त्र 47
    ऋषिः - ब्रह्मा देवता - अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - अध्यात्म प्रकरण सूक्त
    41

    हि॒मं घ्रं॒सं चा॒धाय॒ यूपा॑न्कृ॒त्वा पर्व॑तान्। व॒र्षाज्या॑व॒ग्नी ई॑जाते॒ रोहि॑तस्य स्व॒र्विदः॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    हि॒मम । घ्रं॒सम् । च॒ । आ॒ऽधाय॑ । यूपा॑न् । कृ॒त्वा । पर्व॑तान् । व॒र्षऽआ॑ज्यौ । अ॒ग्नी इति॑ । ई॒जा॒ते॒ इति॑ । रोहि॑तस्य । स्व॒:ऽविद॑: ॥१.४७॥


    स्वर रहित मन्त्र

    हिमं घ्रंसं चाधाय यूपान्कृत्वा पर्वतान्। वर्षाज्यावग्नी ईजाते रोहितस्य स्वर्विदः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    हिमम । घ्रंसम् । च । आऽधाय । यूपान् । कृत्वा । पर्वतान् । वर्षऽआज्यौ । अग्नी इति । ईजाते इति । रोहितस्य । स्व:ऽविद: ॥१.४७॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 13; सूक्त » 1; मन्त्र » 47
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    हिन्दी (4)

    विषय

    जीवात्मा और परमात्मा का उपदेश।

    पदार्थ

    (हिमम्) शीत (च) और (घ्रंसम्) ताप को (आधाय) स्थापित करके, (पर्वतान्) पर्वतों को (यूपान्) जयस्तम्भ रूप (कृत्वा) बनाकर, (वर्षाज्यौ) वृष्टि को घी रूप रखनेवाले (अग्नी) दोनों अग्नियों [सूर्य और चन्द्रमा] ने (स्वर्विदः) सुख पहुँचानेवाले (रोहितस्य) सबके उत्पन्न करनेवाले परमेश्वर के लिये (ईजाते) यज्ञ [संयोग-वियोग व्यवहार] को किया है ॥४७॥

    भावार्थ

    परमेश्वर के सामर्थ्य से सूर्य चन्द्र आदि लोक नियमित होकर ताप, शीत, वृष्टि, पर्वत आदि की उत्पत्ति और स्थिति के कारण होते हैं ॥४७॥

    टिप्पणी

    ४७−(हिमम्) शीतम् (घ्रंसम्) म० ४६। तापम् (च) (आधाय) स्थापयित्वा (यूपान्) जयस्तम्भान् यथा (कृत्वा) विधाय (पर्वतान्) शैलान् (वर्षाज्यौ) वर्षं वृष्टिर्घृतवद्ययोस्तौ (अग्नी) सूर्याचन्द्रमसौ (ईजाते) यज देवपूजासंगतिकरणदानेषु-लिट्। यज्ञं संयोगवियोगव्यवहारं कृतवन्तौ (रोहितस्य) चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि। पा० २।३।६२। इति षष्ठी। रोहिताय। सर्वोत्पादकाय परमेश्वराय (स्वर्विदः) विद्लृ लाभे-क्विप्। सुखप्रापकाय ॥

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    विषय

    वर्षाज्यौ अग्नी

    पदार्थ

    १. (रोहितस्य) = उस तेजस्वी, सदावृद्ध प्रभु के ये (वर्षाज्यौ) = वृष्टिरूप घृतवाले अग्री-सूर्य चन्द्ररूप अग्नि (हिमं घंसं च) = शीत व आतप को समय-समय पर आहित करके और (पर्वतान् यूपान् कृत्वा) = पर्वतों को यज्ञस्तम्भरूप करके (ईजाते) = इस सृष्टियज्ञ को चलाते हैं। २. इस सृष्टियज्ञ के मुख्य प्रवर्तक ये सूर्य और चन्द्र हैं। इस यज्ञ की वेदिरूप भूमि के स्तम्भ ये पर्वत हैं। ये सूर्य और चन्द्र समय-समय पर शीत व आतप का आदान करते हुए इस यज्ञ को चला रहे हैं।

    भावार्थ

    यह सृष्टि यज्ञ है। पर्वत यज्ञवेदिरूप भूमि के स्तम्भ हैं। वृष्टि ही यहाँ आज्य [घृत] है। सूर्य और चन्द्र इस यज्ञ की अग्रियाँ हैं।

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    भाषार्थ

    (हिमम्) शीत चन्द्रमा का, (घ्रंसंच) और गर्म सूर्य का (आधाय) आधान करके, और (पर्वतान्) पर्वतों को (यूपान् कृत्वा) यूप अर्थात् यज्ञशाला स्तम्भरूप करके; (वर्षा ज्यौ१) वर्षा रूपी यज्ञिय-घृत वाली (अग्नी) चन्द्रमा और सूर्य रूपी दो अग्नियां - (स्वर्विदः) उपतप्त द्युलोक में विद्यमान या आनन्दाभिज्ञ (रोहितस्य) सर्वोपरि आरूढ़ परमेश्वर के (ईजाते) संसार यज्ञ को रचा रही हैं।

    टिप्पणी

    [वर्षाज्यौ = चन्द्रमा और सूर्य के कारण वर्षा होती है, अतः वर्षा का सम्बन्ध, इन दोनों के साथ दर्शाया है। मन्त्र में घ्रंस अर्थात् सूर्य का पृथक् वर्णन किया हैं। अतः "रोहितस्य" द्वारा सूर्य अभिप्रेत नहीं।][१. देखो "वर्षेणाज्येन" (मन्य ५२, ५३)।]

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    विषय

    ‘रोहित’ रूप से परमात्मा और राजा का वर्णन।

    भावार्थ

    परमेश्वर (हिमं घ्रंसं च आधाय) हिम = शीतकाल और घ्रंस = ग्रीष्मकाल इन दोनों का आधान करके और (पर्वतान् यूपान्) पर्वतों को ‘यूप’ नामक स्तम्भरूप (कृत्वा) रचकर (वर्षाज्यौ अग्नी) इन दोनों अग्नियों में वर्षारूप घृत को प्राप्त करके (स्वर्विदः) स्वः = प्रकाश और परितापक सूर्य को प्राप्त करनेहारे (रोहितस्य) सर्वोत्पादक प्रजापति के (ईजाते) यज्ञ का सम्पादन करते हैं।

    टिप्पणी

    ‘अग्नीजाते’ इति पैप्प० सं।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ब्रह्मा ऋषिः। रोहित आदित्यो देवता। अध्यात्मं सूक्तम्। ३ मरुतः, २८, ३१ अग्निः, ३१ बहुदेवता। ३-५, ९, १२ जगत्यः, १५ अतिजागतगर्भा जगती, ८ भुरिक्, १६, १७ पञ्चपदा ककुम्मती जगती, १३ अति शाक्वरगर्भातिजगती, १४ त्रिपदा पुरः परशाक्वरा विपरीतपादलक्ष्म्या पंक्तिः, १८, १९ ककुम्मत्यतिजगत्यौ, १८ पर शाक्वरा भुरिक्, १९ परातिजगती, २१ आर्षी निचृद् गायत्री, २२, २३, २७ प्रकृता विराट परोष्णिक्, २८-३०, ५५ ककुम्मती बृहतीगर्भा, ५७ ककुम्मती, ३१ पञ्चपदा ककुम्मती शाक्वरगर्भा जगती, ३५ उपरिष्टाद् बृहती, ३६ निचृन्महा बृहती, ३७ परशाक्वरा विराड् अतिजगती, ४२ विराड् जगती, ४३ विराड् महाबृहती, ४४ परोष्णिक्, ५९, ६० गायत्र्यौ, १, २, ६, ७, १०, ११, २०, २४, २५, ३२-३४, ३८-४१, ४२-५४, ५६, ५८ त्रिष्टुभः। षष्ट्यचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Rohita, the Sun

    Meaning

    Having placed the double fires of cold and heat in the earthly vedi, and having made the mountains as yajna posts of accomplishment, Rohita conducts the yajna, and the two fires, rain as medium of cold and ghrta as fuel of fire, conduct the creative yajna of Rohita, the spirit of existential bliss.

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    Translation

    Establishing the cold and heat, making the mountains as sacrificial posts, the two fires, for whom the rain is sacrificial butter, worship the ascendant Lord, the bestower of light (bliss).

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    Translation

    These two fire hot and cold, being established and mountains being made posts, rain being made ghee are being done for Rohita which is a celestial light.

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    Translation

    God established heat and cold. He made the mountains victory posts. Both the fires performed sacrifice with rain as butter, for God, the Giver of happiness and the Creator of all objects.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ४७−(हिमम्) शीतम् (घ्रंसम्) म० ४६। तापम् (च) (आधाय) स्थापयित्वा (यूपान्) जयस्तम्भान् यथा (कृत्वा) विधाय (पर्वतान्) शैलान् (वर्षाज्यौ) वर्षं वृष्टिर्घृतवद्ययोस्तौ (अग्नी) सूर्याचन्द्रमसौ (ईजाते) यज देवपूजासंगतिकरणदानेषु-लिट्। यज्ञं संयोगवियोगव्यवहारं कृतवन्तौ (रोहितस्य) चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि। पा० २।३।६२। इति षष्ठी। रोहिताय। सर्वोत्पादकाय परमेश्वराय (स्वर्विदः) विद्लृ लाभे-क्विप्। सुखप्रापकाय ॥

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