Loading...
मन्त्र चुनें
  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 1/ मन्त्र 15
    ऋषिः - यम, मन्त्रोक्त देवता - आर्षी पङ्क्ति छन्दः - अथर्वा सूक्तम् - पितृमेध सूक्त
    64

    ब॒तो ब॑तासि यम॒नैव ते॒ मनो॒ हृद॑यं चाविदा॒म। अ॒न्या किल॒ त्वां क॒क्ष्येव यु॒क्तं परि॑ष्वजातौ॒ लिबु॑जेव वृ॒क्षम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ब॒त: । ब॒त॒ । अ॒सि॒ । य॒म॒ । न । ए॒व । ते॒ । मन॑: । हृद॑यम् । च॒ । अ॒वि॒दा॒म॒ । अ॒न्या । किल॑ । त्वाम् । क॒क्ष्या᳡ऽइव । यु॒क्तम् । परि॑ । स्व॒जा॒तै॒ । लिबु॑जाऽइव । वृ॒क्षम् ॥१.१५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    बतो बतासि यमनैव ते मनो हृदयं चाविदाम। अन्या किल त्वां कक्ष्येव युक्तं परिष्वजातौ लिबुजेव वृक्षम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    बत: । बत । असि । यम । न । एव । ते । मन: । हृदयम् । च । अविदाम । अन्या । किल । त्वाम् । कक्ष्याऽइव । युक्तम् । परि । स्वजातै । लिबुजाऽइव । वृक्षम् ॥१.१५॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 18; सूक्त » 1; मन्त्र » 15
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    भाई-बहिन के परस्पर विवाह के निषेध का उपदेश।

    पदार्थ

    (बत) हा ! (यम) हे यम ! [जोड़िया भाई] तू (बतः) बड़ा निर्बल (असि) है, (ते) तेरे (मनः) मन [संकल्प] को (च) और (हृदयम्) हृदय [निश्चय] को (एव) निःसन्देह (न अविदाम) हम ने नहीं पाया। (अन्या) दूसरी स्त्री (किल) अवश्य (त्वाम्) तुझ से (परि ष्वजातै) आलिङ्गन करेगी, (कक्ष्या इव) जैसे घोड़े की पेटी (युक्तम्) कसे हुए [घोड़े] से और (लिबुजा इव)जैसे बेल [लता] (वृक्षम्) वृक्ष से [लिपट जाती है] ॥१५॥

    भावार्थ

    स्त्री का वचन है। भाई ! मैंने तुझे इतना समझाया पर तूने मेरी बात न मानी, अवश्य मुझ से दूसरी स्त्रीतेरे साथ विवाह कर के सुख भोगेगी ॥१५॥मन्त्र १५ और १६ कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१०।१०।१३, १४ ॥

    टिप्पणी

    १५−(बतः) वन उपकारे उपतापे च-क्त। बतो बलादतीतो भवतिदुर्बलः-निरु० ६।२८। अतिनिर्बलः (बत) शोके। हा (असि) (यम) म० ८। हे यमजभ्रातः (न) निषेधे (एव) निश्चयेन (ते) तव (मनः) चित्तम् संकल्पम् (हृदयम्) अन्तःकरणम्।निश्चयम् (च) (अविदाम) विद् लाभे-लुङ्। वयं प्राप्तवत्यः (अन्या) मद्भिन्नास्त्री (किल) प्रसिद्धौ (त्वाम्) (कक्ष्या) अश्वस्य कक्षप्रदेशस्था रज्जुः (इव)यथा (युक्तम्) गमनाय योजितमश्वम् (परिष्वजातै) आलिङ्गेत् (लिबुजा) अ० ६।८।१। लता (वृक्षम्) तरुम् ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    कक्ष्या जैसे युक्त को, बेल जैसे वृक्ष को

    पदार्थ

    १. सम्पूर्ण कड़ी परीक्षा में उत्तीर्ण होते हुए अपने भाई को देखकर हृदय में प्रसन्न होती हुई यमी कहती है कि (बतः बत असि) [Joy, Wonder] = अरे भाई! तू तो मेरे हदय को आनन्दित व आश्चर्यित करनेवाला है। मैंने अभी तक (ते मन:) = तेरे मन को (हृदयं च) = व हृदय की गहराई को (न एव अविदाम) = नहीं ही जाना था। आज तेरे मानसभावों व हृदय की पवित्रता को जानकर बड़ी प्रसन्नता, खुशी हुई है। २. यह ठीक ही है कि (अन्या किल) = निश्चय से मुझसे भिन्न [विलक्षण] अर्थात् सुदूर गोत्रवाली ही कोई कन्या (त्वां परिष्यजाते) = तेरा आलिंगन करे। उसीप्रकार आलिंगन करे (इव) = जैसे (लिबुजः) = बेल वृक्ष को आलिंगित करती है, अथवा (इव) = जिस प्रकार (कक्ष्या) = कमर में बाँधी जानेवाली रज्जु (युक्तम्) = अपने से सम्बद्ध घोड़े को आलिंगित करती है। तेरा अपनी पत्नी से सम्बन्ध तुझे शक्तिशाली बनानेवाला हो, उसीप्रकार जैसे कक्ष्या घोड़े को कसी हुई कमरवाला बनाती है और तू पत्नी का उसीप्रकार सहारा हो जैसे कि वृक्ष बेल का।

    भावार्थ

    सुदूर सम्बन्ध होने पर पत्नी पति की शक्ति व उत्साह-वर्धन का कारण बने और पति पत्नी का आश्रय व वर्धक हो।

    इस भाष्य को एडिट करें

    भाषार्थ

    (बत) हे दुर्बल! (बतः असि) तू वस्तुतः दुर्बल है। (यम) हे यम (ते) तेरे (मनः) मन (च) और (हृदयम्) हृदय को (न अविदाम) मैं नहीं जान पाई। (किल) निश्चय ही (अन्या) और कोई है तेरे मन और हृदय में, जो (त्वाम्) तुझे (परि ष्यजातै) आलिङ्गन करेगी; (इव) जैसे कि (कक्ष्या) अश्व की बगलों अर्थात् छाती पर लिपटी पेटी (युक्तम्) रथ में जुते अश्व का आलिङ्गन करती है, और (इव) जैसे (लिबुजा) बेल (वृक्षम्) वृक्ष का आलिङ्गन करती है। [बतः = बलात् अतीतः (निरु० ६।५।२५)]

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    सन्तान के निमित्त पति-पत्नी का परस्पर व्यवहार।

    भावार्थ

    हे (यम) यम ! नियमवान् पुरुष ! (बत) खेद है कि तू (बतः असि) तू निर्बल है। (ते मनः) तेरे मन और (हृदयम् च) हृदय को (न अविदाम) हम नहीं समझ पाये। (किल) क्या (त्वां) तुझ को (कक्ष्या इव युक्तम्) बगल की रस्सी जिस प्रकार जुते हुए घोड़े के संग चिपटी रहती है उसी प्रकार या (वृक्षम्) वृक्ष को (लिबुजा इव) लता जिस प्रकार आलिंगन करती है उस प्रकार (अन्या) कोई दूसरी स्त्री (त्वाम्) तुझको (परिष्वजातै) आलिंगन करती है जिससे तू मेरे से इस प्रकार अपना मन बटोरता है।

    टिप्पणी

    (च०) ‘स्वजाते’ इति ऋ०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। यमो मन्त्रोक्ता वा देवताः। ४१, ४३ सरस्वती। ४०, रुद्रः। ४०-४६,५१,५२ पितरः। ८, १५ आर्षीपंक्ति। १४,४९,५० भुरिजः। १८, २०, २१,२३ जगत्यः। ३७, ३८ परोष्णिक्। ५६, ५७, ६१ अनुष्टुभः। ५९ पुरो बृहती शेषास्त्रिष्टुभ्। एकाशीयृचं सूक्तम्॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (4)

    Subject

    Victory, Freedom and Security

    Meaning

    Yami: Sorry Yama, it is a pity I did not understand your mind and heart this way of nature and tradition. May be someone other than me would join you like a girdle round your waist and embrace you as a creeper clings by a tree.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    A weakling, alas, art thou, O Yama; we have not found mind and heart thine; verily, another woman shall embrace thee, as a girth a harnessed (horse), as twining plant a tree.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    Alas! thou art indeed a weakling, Yama. I have not been able to understand thy mind or spirit. Another woman will cling about thee, as the woodbine clings round a tree or a girdle about a yoked horse.

    Footnote

    See Rig, 10-10-13

    इस भाष्य को एडिट करें

    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १५−(बतः) वन उपकारे उपतापे च-क्त। बतो बलादतीतो भवतिदुर्बलः-निरु० ६।२८। अतिनिर्बलः (बत) शोके। हा (असि) (यम) म० ८। हे यमजभ्रातः (न) निषेधे (एव) निश्चयेन (ते) तव (मनः) चित्तम् संकल्पम् (हृदयम्) अन्तःकरणम्।निश्चयम् (च) (अविदाम) विद् लाभे-लुङ्। वयं प्राप्तवत्यः (अन्या) मद्भिन्नास्त्री (किल) प्रसिद्धौ (त्वाम्) (कक्ष्या) अश्वस्य कक्षप्रदेशस्था रज्जुः (इव)यथा (युक्तम्) गमनाय योजितमश्वम् (परिष्वजातै) आलिङ्गेत् (लिबुजा) अ० ६।८।१। लता (वृक्षम्) तरुम् ॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top