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यजुर्वेद अध्याय - 6

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  • यजुर्वेद - अध्याय 6/ मन्त्र 17
    ऋषिः - दीर्घतमा ऋषिः देवता - आपो देवताः छन्दः - निचृत् ब्राह्मी अनुष्टुप्, स्वरः - गान्धारः
    216

    इ॒दमा॑पः॒ प्रव॑हताव॒द्यं च॒ मलं॑ च॒ यत्। यच्चा॑भिदु॒द्रोहानृ॑तं॒ यच्च॑ शे॒पेऽअ॑भी॒रुण॑म्। आपो॑ मा॒ तस्मा॒देन॑सः॒ पव॑मानश्च मुञ्चतु॥१७॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इ॒दम्। आ॒पः॒। प्र। व॒ह॒त॒। अ॒व॒द्यम्। च॒ मल॑म्। च॒। यत्। यत्। च॒। अ॒भि॒दु॒द्रोहेत्य॑भिऽदु॒द्रोह॑। अनृ॑तम्। यत्। च॒। शे॒पे। अभी॒रुण॑म्। आपः॑। मा॒। तस्मा॑त्। एन॑सः। पव॑मानः। च॒। मु॒ञ्च॒तु॒ ॥१७॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इदमापः प्रवहतावद्यञ्च मलञ्च यत् । यच्चाभिदुद्रोहानृतं यच्च शेपे अभीरुणम् । आपो मा तस्मादेनसः पवमानश्च मुञ्चतु ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    इदम्। आपः। प्र। वहत। अवद्यम्। च मलम्। च। यत्। यत्। च। अभिदुद्रोहेत्यभिऽदुद्रोह। अनृतम्। यत्। च। शेपे। अभीरुणम्। आपः। मा। तस्मात्। एनसः। पवमानः। च। मुञ्चतु॥१७॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 6; मन्त्र » 17
    Acknowledgment

    संस्कृत (2)

    विषयः

    शुद्धेन जलेन किं भावनीयमित्युपदिश्यते॥

    अन्वयः

    आपः सर्वविद्याव्यापिनो विपश्चितो यूयं यथापः शुद्धिकरास्तथा मम यदवद्यं निन्द्यं कर्म यच्च मलं अविद्यारूपं तदिदं प्रवहत अपनयत च। पुनः यदहमनृतं कं च दुद्रोह च यत् अभीरुणं निरपराधिनं पुरुषं शेपे तस्मात् पूर्वोक्तादेनसः मा मां पृथक् रक्षतु, यथा पवमानो मालिन्यान्मां सद्यो दूरीकरोति, तथान्यानपि मुञ्चतु पृथक् करोतु॥१७॥

    पदार्थः

    (इदम्) वक्ष्यमाणम् (आपः) आप्नुवन्तीत्यापः (प्र) (वहत) अत्र लडर्थे लोट् (अवद्यम्) निंद्यम् (च) विकारिसमुच्चये (मलम्) अशुद्धिकरम् (यत्) (च) प्रकृतिविरुद्धग्रहणे (यत्) (च) लोकविप्रुष्टसमुच्चये (अभिदुद्रोह) यथाभिद्रुह्यति तथा (अनृतम्) असत्यम् (यत्) (च) परुषवचः समुच्चये (शेपे) आक्रुश्यामि (अभीरुणम्) निर्भयम् (आपः) (मा) माम् (तस्मात्) (एनसः) धर्मविरुद्धाचरणात् (पवमानः) पवित्रीकरो व्यवहारः (च) शुद्धोपदेशसमुच्चये (मुञ्चतु) पृथक् करोतु॥१७॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कार उपमालङ्कारश्च। विद्वान् जलमिव सांसारिकपदार्थानां शोधको भूत्वा धर्म्यं कर्माचरेत्। मनुष्यैरीश्वरप्रार्थनया दुष्टाचारात् पृथक् भूत्वा निर्मलेषु विद्यादिग्रहणकर्मसु सदा प्रवर्तितव्यमिति॥१७॥

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    विषयः

    शुद्धेन जलेन कि भावनीयमित्युपदिश्यते॥

    सपदार्थान्वयः

    [हे] आपः=सर्वविद्याव्यापिनो विपश्चितः! प्राप्नुवन्तीत्यापः,यूयं यथाऽऽपः शुद्धकरास्तथा मम यदवद्यं=निन्द्यं कर्म निन्द्यं, यच्च विकारि मलम्=अविद्यारूपम् अशुद्धिकरं तदिदं=वक्ष्यमाणं प्र+वहत=अपनयत, च प्रकृतिविरुद्धग्रहणं पुनः यदहमनृतम् असत्यं कं च लोकविप्रष्टं[अभि]+दुद्रोह यथाऽभिद्रह्यति तथा च परुषवचः यत् अभीरुणं=निरपराधिनं पुरुषं निर्भयं शेपे आक्रुश्यामि,तस्मात्=पूर्वोक्तादेनसः धर्मविरुद्धाचरणाद् मा=मां पृथक् रक्षतु, यथा पवमानः पवित्रीकरो व्यवहारः [च] शुद्धोपदेशश्च मालिन्यान्मां सद्यो दूरीकरोतु तथाऽन्यानपि मुञ्चतु=पृथक् करोतु ।। ६ । १७ ।। [[हे] [आप:=सर्वविद्याव्यापिनो विपश्चितः! यूयं यथाऽऽपः शुद्धिकरास्तथा मम यदवद्यं=निन्द्यं कर्म....प्रवहत=अपनयत]

    पदार्थः

    ( इदम्) वक्ष्यमाणम् (आपः) प्राप्नुवन्तीत्यापः (प्र) (वहत) अत्र लडर्थे लोट् (अवद्यम्) निंद्यम् (च) विकारिसमुच्चये (मलम्) अशुद्धिकरम् (यत्) (च) प्रकृतिविरुद्धग्रहणे (यत्) (च) लोकविप्रुष्टसमुच्चये (अभिदुद्रोह) यथाभिद्रुह्यति तथा (अनृतम्) असत्यम् (यत्) (च) परुषवच: समुच्चये (शेपे) आक्रुश्यामि (अभीरुणम्) निर्भयम् (आपः) (मा) माम् (तस्मात्) (एनसः) धर्मविरुद्धाचरणात् (पवमानः) पवित्रीकरो व्यवहारः (च) शुद्धोपदेशसमुच्चये (मुञ्चतु) पृथक् करोतु ।। १७।।

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कार उपमालङ्कारश्च॥ विद्वान् जलमिव सांसारिकपदार्थानां शोधको भूत्वा धर्म्यं कर्माचरेत्। [तस्मात्=पूर्वोक्तादेनसो मा=मां पृथक् रक्षतु, यथा पवमानः [च] मालिन्यान्मां सद्यो दूरी करोतु] मनुष्यैरीश्वरप्रार्थनया दुष्टाचारात् पृथक् भूत्वा निर्मलेषु विद्यादिग्रहणकर्मसु सदा प्रवर्तितव्यमिति ।। ६ । १७ ।।

    भावार्थ पदार्थः

    एनस:=दृष्टाचारात् ॥ पवमानः=निर्मलं विद्यादिग्रहणकर्म।।

    विशेषः

    दीर्घतमाः। आपः=जलानि॥ निचृद्ब्राह्म्युनुष्टुप्। गान्धारः॥

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    हिन्दी (4)

    विषय

    अब निर्दोष जल से क्या संभावना करनी चाहिये, यह अगले मन्त्र में उपदेश किया है॥

    पदार्थ

    भो (आपः) सर्वविद्याव्यापक विद्वान् लोगो! आप जैसे (आपः) जल शुद्धि करते हैं, वैसे मेरा (यत्) जो (अवद्यम्) अकथनीय निन्द्यकर्म (च) और विकार तथा (यत्) जो (मलम्) अविद्यारूपी मल है, (इदम्) इस को (प्रवहत) बहाइये अर्थात् दूर कीजिये। (च) और (यत्) जो मैं (अनृतम्) झूंठ-मूंठ किसी से (दुद्रोह) द्रोह करता होऊं (च) और (यत्) जो (अभीरुणम्) निर्भय निरपराधी पुरुष को (शेपे) उलाहने देता हूं (तस्मात्) उस उक्त (एनसः) पाप से (मा) मुझे अलग रक्खो (च) और जैसे (पवमानः) पवित्र व्यवहार (मा) मुझसे पाप से अलग रखता है, वैसे (च) अन्य मनुष्यों को भी रक्खे॥१७॥

    भावार्थ

    जैसे जल सांसारिक पदार्थों का शुद्धि का निदान है, वैसे विद्वान् लोग सुधार का निदान हैं, इस से वे अच्छे कामों को करें। मनुष्यों को चाहिये कि ईश्वर की उपासना और विद्वानों के संग से दुष्टाचरणों को छोड़ सदा धर्म में प्रवृत्त रहें॥१७॥

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    विषय

    पाप-मोचन

    पदार्थ

    गत मन्त्र का ‘मेधातिथि’ ज्ञान-रश्मिसमूह से वासनान्धकार का विदारण करके अब ‘दीर्घतमा’ बन गया है और प्रार्थना करता है कि— १. ( आपः ) = [ आप्नुवन्ति सर्वा विद्या: ] हे सब विद्याओं को प्राप्त करानेवाले आप्त पुरुषो! आप ( इदम् ) = इस ( अवद्यं च ) = अकथनीय—गर्हणीय पापों को ( मलं च ) = और मलों को ( प्रवहत ) = हमसे बहाकर दूर ले-जाओ। आपकी कृपा से मेरे ज्ञानचक्षु इस प्रकार खुलें कि मैं कोई भी बुरा कर्म न करूँ और खान-पान को ठीक रखता हुआ शरीर में किसी प्रकार के मल का सञ्चय न होने दूँ। 

    २. ( च ) = और ( यत् ) = जो ( अभिदुद्रोह ) = मैं किसी का द्रोह [ जिघांसा = मारने की इच्छा ] करता हूँ, ( यत् च ) = और जो ( अनृतम् ) = झूठ-मूठ बातों को बनाता हूँ तथा ( अभीरुणम् ) = [ अनपराधिनं ] निष्पाप और निर्भय व्यक्ति से ( शेपे ) = गाली- गलौच करता हूँ ( तस्मात् एनसः ) = उस पाप से ( आपः ) = ज्ञानी लोक तथा ( पवमानः च ) = अपने को पवित्र करनेवाले सन्त लोग ( मुञ्चतु ) = अपने ज्ञानोपदेश व मधुर प्रेरणा के द्वारा मुक्त करें।

    भावार्थ

    भावार्थ — सबसे बड़े पाप यही हैं कि [ क ] किसी से द्रोह करना [ ख ] अनृत बोलना [ ग ] निष्पाप को कोसना। ज्ञानी, पवित्रात्मा लोग हमें इन पापों से छुड़ाएँ।

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    विषय

    पाप, मल का परिशोधन।

    भावार्थ

    हे ( आपः ) जलों के समान शान्त स्वभाव एवं मलशोधक विद्याओं को प्राप्त करनेहारे आप्त पुरुषो ! (अवद्यं च ) जो निन्दनीय कर्म और ( यत् मलं) जो मल, मलिन कार्य हैं और (यत् च ) जो कुछ मैं ( अभिदुद्रोह ) दूसरे के प्रति द्रोहकार्य, द्वेष, बात, वैर आदि करूं और ( यत् च ) जो (अनॄतम् ) असत्य भाषण करूं और जो ( अभीरुणम्) निर्भय होकर मैं ( शेपे ) दूसरे को कोसूं निन्दाजनक अपशब्द कहूं उस सब मल को आप लोग ( इदम् ) बहुत शीघ्र ( प्रवहत ) जलों के समान बहाकर दूर करो और मुझे स्वच्छ करदो । और ( आपः ) वे याआप्त पुरुष और ( पवमानः च ) पवित्र करनेहारा, या सूर्य या वायु के समान अन्न को तुष से पृथक् २ करवेनेहारा व न्यायकारी पुरुष ( मा ) मुभको ( तस्मात् ) उस पाप से ( मुन्चतु ) छुड़ावें ॥

    टिप्पणी

     १७ - अयं मन्त्रः शतपथे नास्ति । इदमापः प्रवहत यत्किंच दुरितं मयि यद्वाहमभि दुद्रोह यद्वा शेप उतानृतं । इति काण्व० ॥ 

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    आपो देवताः । निचृद् ब्राह्मी त्रिष्टुप् । गांधारः ॥ 

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    विषय

    अब शुद्ध जल से क्या करना चाहिये, यह उपदेश किया है।।

    भाषार्थ

    हे (आपः) सब विद्याओं में व्यापक विद्वानो ! तुम--जैसे जल शुद्धिकारक हैं, वैसे मेरा जो (अवद्यम्) निन्दनीय कर्म है, (च) और जो विकार उत्पन्न करने वाला (मलम् ) अशुद्धि-कारक अविद्या रूप कर्म है उसे (प्रवहत) बहा दीजिये अर्थात् दूर कीजिये, (च) और जो स्वभाव से विरुद्ध (अनृतम्) मिथ्या व्यवहार है, (च) और जो लोकविरुद्ध ([अभि] दुद्रोह) किसी से द्रोह किया है, (च) और जो कठोर वचन से (अभीरुणम्) निरपराधी पुरुष को (शेपे) शाप दिया है, (तस्मात् ) इस पूर्वोक्त (एनसः) धर्म विरुद्ध आचरण रूप पाप से (मा) मुझे पृथक् रखो, और जिस प्रकार (पवमानः) पवित्र व्यवहार [च] और शुद्ध उपदेश मलिनता से मुझे शीघ्र दूर करता है, वैसे अन्यों को भी (मुञ्चतु) पाप से पृथक् करें।। ६। १७।।

    भावार्थ

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा और उपमा अलङ्कार हैं। विद्वान् पुरुष जल के समान सांसारिक पदार्थों का शोधक होकर धर्मानुसार कर्म का आचरण करें। सब मनुष्य ईश्वर प्रार्थना से दुष्ट आचरण से पृथक् होकर निर्मल विद्यादि ग्रहण करने के कर्मों में सदा प्रवृत्त रहें।। ६। १७।।

    प्रमाणार्थ

    (प्रवहत) यहाँ लट् अर्थ में लोट् लकार है।। ६। १७।।

    भाष्यसार

    १. शुद्ध जल से क्या करें-- जैसे जल सर्वत्र व्यापक है, इसी प्रकार विद्वान् लोग सब विद्याओं में व्यापक हों, सब विद्याओं के ज्ञाता हों। जैसे जल सांसारिक पदार्थों को शुद्ध करनेवाला है, इसी प्रकार विद्वान् लोग स्वयं धर्मानुसार शुद्ध कर्मों का आचरण करें तथा संसार के निन्द्य, विकारी, अविद्यामय अशुद्धिकारक, स्वभावविरुद्ध, असत्य, लोकनिन्दित कर्मों का शोधन करें। द्रोह, कठोर वचन, निरपराधी पुरुष को दण्ड, धर्मविरुद्ध आचरण आदि पाप कर्म से स्वयं सदा पृथक् रहें तथा संसार को भी पृथक् रखें। अपने पवित्र व्यवहार और शुद्ध उपदेश से जल के तुल्य मलिनता को शीघ्र दूर करें।विद्वानों के समान सब मनुष्य ईश्वर-प्रार्थना से दुष्ट आचरण से सदा पृथक् रहें और विद्याआदि की प्राप्ति रूप निर्मल कर्मों में सदा लगे रहें।। ६। १७।। २. अलङ्कार– मन्त्र में उपमावाचक शब्द लुप्त है इसलिये वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है। उपमा यह है कि जैसे जल सांसारिक पदार्थों का शोधक है इसी प्रकार विद्वान् लोग भी संसार के अविद्यादि मलों का शोधन करें।। ६। १७।।

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    जसे जल हे जगातील पदार्थांच्या शुद्धीचे कारण आहे तसे विद्वान हे सुधारणा होण्यास कारणीभूत ठरतात. त्यासाठी विद्वानांनी चांगले काम करावे. माणसांनी ईश्वराची उपासना करावी, विद्वानांची संगती धरावी. दुष्टपणा सोडून द्यावा व नेहमी धर्माकडे वळावे.

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    विषय

    त्या शुद्ध दोषरहितजल पासून काय बोध घ्यावा, याविषयी पुढील मंत्रात कथन केले आहे -

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - हे (आपः सर्वविद्यावित्) विद्वज्जनहो, आपण ज्याप्रमाणे (आपः) जलाची शुद्धी करता, त्याप्रमाणे माझ्या (स्वभावात या हृद्यात) (यत्) जे अकथनीय निंदनीय कर्म (च) वा विचार असेल, तसेच (यत्) जे (मलम्) अविद्यारुप मल आहे वा असेल (इदम्) त्या मलदोषाला (प्रवहत) धूवून टाका (माझ्यातील कुप्रवृत्तीस नष्ट करा) (च) आणि (वत्) जर मी (अनृतम्) कोणाशी असत्य वा कपटपूर्ण आचरण करीत असेन वा (दुद्रोह) कोणाशी द्रोह करीत असेन अथवा (अभीरुणम्) कोणा निर्दोष निरपराधी व्यक्तीची (शेवे) चेष्टा वा पापापासून (मा) मला दूर ठेवा (च) आणि जसे (पवमानः) माझे पवित्र आचरण (माझी सत्प्रवृत्ती) (भा) मला पापकृत्यापासून अलिप्त ठेवते, त्याप्रमाणे (च) अन्य मनुष्यांना देखील पापकर्मापासून दूर ठेवावे. (असत्याचरण, द्रोह, निंदा या दुष्कृत्याच्याप्रसंगी मला विद्वानांचे मार्गदर्शन मिळावे व आणि हृदयातील सत्प्रवृत्तीने मला व इतरांना पापाचरणापासून सदा वाचवावे, हीच इच्छा आहे) ॥17॥

    भावार्थ

    भावार्थ – ज्याप्रमाणे जल हे सांसारिक पदार्थांना शुद्ध व स्वच्छ करण्याचे साधन आहे, त्याप्रमाणे विद्वज्जन वा त्यांनी संगती जीवन-सुधाराचे महत्त्वपूर्ण साधन आहे. यामुळे सज्जनांचा संग करीत माणसे सत्कर्म करतील. सर्व मनुष्यांसाठी हे हितकर कर्म आहे की त्यानी ईश्‍वराची उपासना करावी विद्वज्जनांच्या संगतीत राहून दुराचरणाचा त्याग करावा व सदा धर्माकडे प्रवृत्त असावे. ॥17॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    Ye masters of knowledge, just as waters purify us, so do ye wash away this indescribable sin and ignorance of mine. O learned persons keep me away from the vice of false malice, and accusation of the innocent. May noble, virtuous deed save me from sin.

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    Meaning

    Whatever is despicable (in me), whatever is dirty (such as ignorance and illusion), whatever is wrong, false or anti-social, whatever execrable (I have uttered) toward the innocent, these waters may wash off that sin from me, the purifying wind may dry that off from me, the holy men of wisdom may absolve me of that and release me from self-bondage.

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    Translation

    May the waters wash away all that is dirty and filthy in me. Whatever treachery and falsehood I committed, and whatever abuse I poured on the innocent, may the waters and the purifier, cleanse me of that sin. (1)

    Notes

    Addressed to the waters and the wind, the two agents cleansing pollution, not only physical, but mental also.

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    बंगाली (1)

    विषय

    শুদ্ধেন জলেন কিং ভাবনীয়মিত্যুপদিশ্যতে ॥
    এখন নির্দোষ জল হইতে কী সম্ভাবনা করা উচিত, ইহা পরবর্ত্তী মন্ত্রে উপদেশ দেওয়া হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ- হে (আপঃ) সর্ববিদ্যাব্যাপক বিদ্বান্গণ ! আপনারা যেমন (আপঃ) জল শুদ্ধি করেন সেইরূপ আমার (য়ৎ) যে (অবদ্যম্) অকথনীয় নিন্দ্যকর্ম (চ) এবং বিকার তথা (য়ৎ) যে (মলম্) অবিদ্যারূপী মল (ইদম্) ইহাকে (প্রবহত) প্রবাহিত করুন অর্থাৎ দূর করুন (চ) এবং (য়ৎ) যে আমি (অনৃতম্) মিথ্যাপূর্বক কাহারও সহিত (দুদ্রোহ) দ্রোহ করি (চ) এবং (য়ৎ) যে (অভীরুণম্) নির্ভয় নিরপরাধী পুরুষকে (শেপে) ভৎর্সনা করি (তস্মাৎ) সেই উক্ত (এনসঃ) পাপ হইতে (মা) আমাকে পৃথক রাখুন (চ) এবং যেমন (পবমানঃ) পবিত্র ব্যবহার (মা) আমাকে পাপ ব্যবহার হইতে পৃথক রাখে সেইরূপ (চ) অন্য মনুষ্যকেও রাখিবেন ॥ ১৭ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ- যেমন জল সাংসারিক পদার্থ সকলের শুদ্ধির নিদান সেইরূপ বিদ্বান্গণ সংস্কারের নিদান এইজন্য তাঁহারা ভাল কর্মগুলি করুন । মনুষ্যদিগের উচিত যে, ঈশ্বরের উপাসনা এবং বিদ্বান্দিগের সঙ্গ হইতে দুষ্টাচরণগুলি ত্যাগ করিয়া সর্বদা ধর্মে প্রবৃত্ত থাকে ॥ ১৭ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    ই॒দমা॑পঃ॒ প্র ব॑হতাব॒দ্যং চ॒ মলং॑ চ॒ য়ৎ । য়চ্চা॑ভিদু॒দ্রোহানৃ॑তং॒ য়চ্চ॑ শে॒পেऽঅ॑ভী॒রুণ॑ম্ । আপো॑ মা॒ তস্মা॒দেন॑সঃ॒ পব॑মানশ্চ মুঞ্চতু ॥ ১৭ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ইদমাপ ইত্যস্য দীর্ঘতমা ঋষিঃ । আপো দেবতাঃ । নিচৃদ্ব্রাহ্ম্যনুষ্টুপ্ ছন্দঃ । গান্ধারঃ স্বরঃ ॥

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