अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 5/ मन्त्र 18
ऋषिः - अथर्वाचार्यः
देवता - ब्रह्मगवी
छन्दः - याजुषी जगती
सूक्तम् - ब्रह्मगवी सूक्त
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वज्रो॒ धाव॑न्ती वैश्वान॒र उद्वी॑ता ॥
स्वर सहित पद पाठवज्र॑: । धाव॑न्ती । वै॒श्वा॒न॒र: । उत्ऽवी॑ता ॥७.७॥
स्वर रहित मन्त्र
वज्रो धावन्ती वैश्वानर उद्वीता ॥
स्वर रहित पद पाठवज्र: । धावन्ती । वैश्वानर: । उत्ऽवीता ॥७.७॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।
पदार्थ
(धावन्ती) दौड़ती हुई वह [वेदवाणी] [दुष्ट के लिये] (वज्रः) वज्ररूप, और (उद्वीता) ऊँची हुई वह [सज्जन के लिये] (वैश्वानरः) सर्वनायक पुरुष [के समान हितकारी] है ॥१८॥
भावार्थ
वेदवाणी की प्रवृत्ति से संसार में पापियों का नाश और धर्मात्माओं को आनन्द का प्रकाश होता है ॥१८॥
टिप्पणी
१८−(वज्रः) (धावन्ती) शीघ्रं गच्छन्ती (वैश्वानरः) अ० १।१०।४। विश्व+नॄ प्रापणे−अच्, स्वार्थे−अण्। वैश्वानरः कस्माद् विश्वान् नरान् नयतीति−निरु० ७।२१। सर्वनायकः पुरुषो यथा (उद्वीता) वी गतौ−क्त। उदयं गता ॥
विषय
मेनिः + हेतिः
पदार्थ
१. (सा) = वह निरुद्ध ब्रह्मगवी (हि) = निश्चय से (शतवधा मेनिः) = सैकड़ों प्रकार से वध करनेवाला वज़ हो है। ब्रह्मण्यस्य ज्ञान का हिंसन करनेवालों की (सा) = वह (हि) = निश्चय से (क्षिति:) = विनाशिका है [क्षि क्षये] । (तस्मात्) = उस कारण से यह (ब्राह्मणानां गौ:) = ब्राह्मणों की वाणी (विजानता) = समझदार पुरुष से (वै) = निश्चय ही (दुराधर्षा) = सर्वथा दुर्जेय होती है-वह इसका घर्षण नहीं करता। २. यदि नासमझी के कारण इसका घर्षण हुआ तो (धावन्ती) = राष्ट्र में से भागती हुई यह ब्रह्मगवी (वज्रः) = वन ही होती है और (उद्वीता) = [throw, cast] बाहर फेंकी गई [निर्वासित हुई-हुई] यह ब्रह्मगवी (वैश्वानरः) = अग्नि ही हो जाती है, अर्थात् यह राष्ट्र से दूर की गई ब्रह्मगवी वज़ के समान घातक व अग्नि के समान जलानेवाली होती है। पीड़ित होने पर (शफान् उत्खिदन्ती) = [Strike] अपने शफों [खुरों] को ऊपर आहत करती हुई यह (हेति:) = हनन करनेवाला आयुध बनती है, और (अप ईक्षमाणा) = [Stand in need of] सहायता के लिए इधर-उधर देखती हुई, किसी रक्षक को चाहती हुई यह ब्रह्मगवी (महादेवः) = प्रलयंकर महादेव ही हो जाती है, अर्थात् जिस राष्ट्र में यह ब्रह्मगवी अत्याचारित होकर सहायता की अपेक्षावारली होती है, वहाँ यह प्रलय ही मचा देती है।
भावार्थ
प्रतिबन्ध को प्राप्त हुई-हुई ब्रह्मगवी राष्ट्र के विनाश का कारण बनती है।
भाषार्थ
(धावन्ती) भय के कारण दौड़ती हुई (वज्रः) वज्ररूप है। (उद्वीता) उठती हुई (वैश्वानरः) वैश्वानर अग्निरूप है।
टिप्पणी
[धावन्ती में "धातु-गतौ", और वज्र में "वज गतौ"। दोनों में गत्यर्थ समान होने से भय द्वारा धावन्ती गौ अर्थात् गो जाति को वज्र कहा है। उद्वीता अर्थात् उठ कर चलती फिरती गौ वैश्वानर अर्थात् सब नर नारियों का हित करने वाली है, परन्तु भय के कारण उठी हुई गौ अग्नि रूप है। वैश्वानरः = वैश्वानर = अग्निः]
विषय
ब्रह्मगवी का वर्णन।
भावार्थ
ब्रह्मघ्न के लिये ब्रह्मगवी ही (धावन्ती) दौड़ती हुई दीखती है (वज्रः) वज्र तलवार होकर या (वैश्वानरः उद्वीता) अग्नि, बिजुली रूप होकर ऊपर उठती या धधकती है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिर्देवताच पूर्वोक्ते। १२ विराड् विषमा गायत्री, १३ आसुरी अनुष्टुप्, १४, २६ साम्नी उष्णिक, १५ गायत्री, १६, १७, १९, २० प्राजापत्यानुष्टुप्, १८ याजुषी जगती, २१, २५ साम्नी अनुष्टुप, २२ साम्नी बृहती, २३ याजुषीत्रिष्टुप्, २४ आसुरीगायत्री, २७ आर्ची उष्णिक्। षोडशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Divine Cow
Meaning
When raised high, it is Vaishvanara, refulgent sun for humanity, but when terrorised, it is thunderbolt.
Translation
(She is) a thunderbolt when running, Vaisvanara when driven up.
Translation
She running is thunderbolt and she standing is the fire.
Translation
Preached freely, it acts as a powerful force. Held in high esteem it acts as a benefactor of humanity like a leader.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
१८−(वज्रः) (धावन्ती) शीघ्रं गच्छन्ती (वैश्वानरः) अ० १।१०।४। विश्व+नॄ प्रापणे−अच्, स्वार्थे−अण्। वैश्वानरः कस्माद् विश्वान् नरान् नयतीति−निरु० ७।२१। सर्वनायकः पुरुषो यथा (उद्वीता) वी गतौ−क्त। उदयं गता ॥
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