Loading...
मन्त्र चुनें
  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 5/ मन्त्र 43
    ऋषिः - अथर्वाचार्यः देवता - ब्रह्मगवी छन्दः - साम्नी बृहती सूक्तम् - ब्रह्मगवी सूक्त
    82

    छि॒नत्त्य॑स्य पितृब॒न्धु परा॑ भावयति मातृब॒न्धु ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    छि॒नत्ति॑ । अ॒स्य॒ । पि॒तृ॒ऽब॒न्धु । परा॑ । भा॒व॒य॒ति॒ । मा॒तृ॒ऽब॒न्धु ॥९.५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    छिनत्त्यस्य पितृबन्धु परा भावयति मातृबन्धु ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    छिनत्ति । अस्य । पितृऽबन्धु । परा । भावयति । मातृऽबन्धु ॥९.५॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 12; सूक्त » 5; मन्त्र » 43
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।

    पदार्थ

    वह (अस्य) इसके (पितृबन्धु) पैतृक सम्बन्ध को (छिनत्ति) काट देती है और [इसके] (मातृबन्धु) मातृक सम्बन्ध को (पराभावयति) विध्वंस कर देती है ॥४३॥

    भावार्थ

    वेदनिन्दक के सब भीतरी और बाहिरी उपयोगी व्यवहार नष्ट हो जाते हैं और वैदिक मर्यादा भङ्ग होने से सब सम्बन्धी लोग उस के बिगड़ बैठते हैं ॥४२, ४३॥

    टिप्पणी

    ४२, ४३−(सर्वा) सर्वाणि (अस्य) ब्रह्मजस्य (अङ्गा) अङ्गानि (पर्वा) पर्वाणि। ग्रन्थीन् (मूलानि) (वृश्चति) (छिनत्ति) (अस्य) ब्रह्मज्यस्य (पितृबन्धु) पैतृकसम्बन्धनम् (पराभावयति) पराजयति (मातृबन्धु) मातृकसम्बन्धनम् ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    वंशविनाश

    पदार्थ

    १. पीड़ित की गई ब्रह्मगवी (अस्य पितबन्धु छिनत्ति) = पैतृक सम्बन्धों को छिन्न कर डालती है, (मातृबन्ध पराभावयति) = मातृपक्षवालों को भी पराभूत करती है। यह (ब्रह्मगवी) = वेदवाणी यदि (क्षत्रियेण) = क्षत्रिय से (अपुन: दीयमाना) = फिर वापस लौटाई न जाए तो यह (ब्रह्मज्यस्य) = ब्रह्मघाती के (विवाहान्) = विवाहों को व (सर्वान् ज्ञातीन् अपि) = सब रिश्तेदारों को भी (क्षापयति) = नष्ट कर देती है। २. (यः) = जो (क्षत्रियः) = क्षत्रिय (एवं विदुषः ब्रह्मणस्य) = इसप्रकार ज्ञानी ब्राह्मण की (गाम् आदते) = इस ब्रह्मगवी को छीन लेता है, वह (अपरापरणः भवति) = सहायक से रहित हो जाता है अथवा पुराणों व नयों से रहित हो जाता है-सब इसका साथ छोड़ जाते हैं और (क्षीयते) = यह नष्ट हो जाता है। यह छिन्ना ब्रह्मगवी (एनम्) = इसको (अवास्तुम्) = घर-बार से रहित, (अस्वगम्) = [अ स्व ग] निर्धन व (अप्रजसम्) = सन्तानरहित (करोति) = कर देती है।

     

    भावार्थ

    छिन्ना ब्रह्मगवी ब्रह्मज्य के सब वंश को ही समाप्त कर देती है।

    इस भाष्य को एडिट करें

    भाषार्थ

    (अस्य) इस ब्रह्मज्य के (पितृबन्धु) पैतृक सम्बन्ध या बन्धुधों को (छिनत्ति) गौ अर्थात् गो जाति काट देती है, और (मातृबन्धु) मातृक बन्धुओं का (परा भावयति) पराभव कर देती है।

    टिप्पणी

    [काटती और पराभव करती है निज रक्षकों के आन्दोलनों द्वारा]।

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    ब्रह्मगवी का वर्णन।

    भावार्थ

    (अस्य) उस ब्रह्मघ्न के (पितृबन्धु) मां बाप और उनके बन्धुओं को (छिनत्ति) विनाश कर डालती है। और (मातृबन्धु) माता और उसके सम्बन्ध के बन्धुओं को भी (पराभावयति) उससे जुदा करके विनाश कर देती है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिर्देवता च पूर्वोक्ते। ३९ साम्नी पंक्ति:, ४० याजुषी अनुष्टुप्, ४१, ४६ भुरिक् साम्नी अनुष्टुप, ४२ आसुरी बृहती, ४३ साम्नी वृहती, ४४ पिपीलिकामध्याऽनुष्टुप्, ४५ आर्ची बृहती। अष्टर्चं पञ्चमं पर्यायसूक्तम्॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (4)

    Subject

    Divine Cow

    Meaning

    She cuts off all his paternal connections from divinity and humanity, she cuts off all his maternal connections from earth and nature, and reduces him to total alienation from living existence in a state of self- condemnation.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    She severs his paternal connection, makes perish his maternal connection.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    She cuts all relations of him from fathers side and all from mothers’ side.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    It cuts off his relationship on the father’s side and destroys maternal kinship.

    इस भाष्य को एडिट करें

    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ४२, ४३−(सर्वा) सर्वाणि (अस्य) ब्रह्मजस्य (अङ्गा) अङ्गानि (पर्वा) पर्वाणि। ग्रन्थीन् (मूलानि) (वृश्चति) (छिनत्ति) (अस्य) ब्रह्मज्यस्य (पितृबन्धु) पैतृकसम्बन्धनम् (पराभावयति) पराजयति (मातृबन्धु) मातृकसम्बन्धनम् ॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top