Loading...
मन्त्र चुनें
  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 5/ मन्त्र 37
    ऋषिः - अथर्वाचार्यः देवता - ब्रह्मगवी छन्दः - आसुर्यनुष्टुप् सूक्तम् - ब्रह्मगवी सूक्त
    59

    अव॑र्तिर॒श्यमा॑ना॒ निरृ॑तिरशि॒ता ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अव॑र्ति: । अ॒श्यमा॑ना । नि:ऽऋ॑ति: । अ॒शि॒ता॥८.१०॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अवर्तिरश्यमाना निरृतिरशिता ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अवर्ति: । अश्यमाना । नि:ऽऋति: । अशिता॥८.१०॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 12; सूक्त » 5; मन्त्र » 37
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।

    पदार्थ

    वह [वेदवाणी] (अश्यमाना) खायी जाती हुई [वेदनिन्दक के लिये] (अवर्तिः) निर्धनता, और (अशिता) खायी गयी (निर्ऋतिः) महामारी होती है ॥३७॥

    भावार्थ

    अन्यायी लोग वेदविद्या के नाश करने से निर्धनी होकर महाकष्ट भोगते हैं ॥३७॥

    टिप्पणी

    ३७−(अवर्तिः) अ० ९।२।३। निर्जीविका (अश्यमाना) भक्ष्यमाणा (निर्ऋतिः) अ० ३।११।२। कृच्छ्रापत्तिः−निरु० २।७। (अशिता) भक्षिता ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    अभ्युदय व नि:श्रेयस का विनाश

    पदार्थ

    १. (पिश्यमाना) = टुकड़े-टुकड़े की जाती हुई यह ब्रह्मगवी (क्रुद्धः शर्वः) = कुद्ध हुए-हुए प्रलंकार रुद्र के समान होती है। (पिशिता) = काटी गई होने पर (शिमिदा) = शान्ति व सुख को नष्ट करनेवाली होती है [दाप लवने]। (अश्यमाना) = खाई जाती हुई (अवर्तिः) = दरिद्रता व सत्ताविनाश का हेतु होती है और अशिता (निर्ऋति:) = खायी गई होकर पापदेवता व मृत्यु के समान भयंकर होती है। २. (अशिता ब्रह्मगवी) = खायी गई यह 'ब्रह्मगबी' (ब्रह्मज्यम्) = ज्ञान के विनाशक इस राजन्य को (अस्मात् च अमुष्मात् च) = इस लोक से और परलोक से-अभ्युदय व निःश्रेयस से (छिनत्ति) = उखाड़ फेंकती है।

    भावार्थ

    वेदवाणी का प्रतिरोध प्रलयंकर होता है-यह शान्ति का विनाश कर देता है, दरिद्रता व दुर्गति का कारण बनता है तथा अभ्युदय व निःश्रेयस को विनष्ट कर देता है।

    इस भाष्य को एडिट करें

    भाषार्थ

    गोमांसरूप में (अश्यमाना) खाई जाती हुई गौ (अवर्तिः) दरिद्रता पैदा करती, और (अशिता) खाई गई (निर्ऋतिः) कष्टोत्पादन करती है।

    टिप्पणी

    [गोमांस के प्रचार से गोवंश के विनाश द्वारा दुग्ध आदि के अभाव से जीवन में दरिद्रता होती तथा जीवन कष्टप्रद होता है।]

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    ब्रह्मगवी का वर्णन।

    भावार्थ

    ‘ब्रह्मगवी’ (अश्यमाना) खाई या निगली जाती हुई (अवर्त्तिः) ब्रह्मद्वेषी के लिये उसकी सत्ता मिटाने वाली है। और (अशिता) खाई गई ही वह (निर्ऋतिः) पाप देवता या मृत्यु के समान भयंकर है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिर्देवता च पूर्ववत्। २८ आसुरी गायत्री, २९, ३७ आसुरी अनुष्टुभौ, ३० साम्नी अनुष्टुप्, ३१ याजुपी त्रिष्टुप्, ३२ साम्नी गायत्री, ३३, ३४ साम्नी बृहत्यौ, ३५ भुरिक् साम्नी अनुष्टुप, ३६ साम्न्युष्णिक्, ३८ प्रतिष्ठा गायत्री। एकादशर्चं चतुर्थं पर्यायसूक्तम्॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (4)

    Subject

    Divine Cow

    Meaning

    Being eaten, she is calamitous, eaten, she is death.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    Ruin when being partaken of, perdition when partaken of.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    She being eaten (by any wild beast) become calamity and if eaten away dreadful destruction.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    It brings poverty when it is being outraged, and destruction,having been outraged.Vedic knowledge when desecrated cuts off the injurer of the learned from this world and the world yonder.

    इस भाष्य को एडिट करें

    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३७−(अवर्तिः) अ० ९।२।३। निर्जीविका (अश्यमाना) भक्ष्यमाणा (निर्ऋतिः) अ० ३।११।२। कृच्छ्रापत्तिः−निरु० २।७। (अशिता) भक्षिता ॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top