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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 5/ मन्त्र 54
    ऋषिः - अथर्वाचार्यः देवता - ब्रह्मगवी छन्दः - प्राजापत्योष्णिक् सूक्तम् - ब्रह्मगवी सूक्त
    389

    ओष॑न्ती स॒मोष॑न्ती॒ ब्रह्म॑णो॒ वज्रः॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ओष॑न्ती । स॒म्ऽओष॑न्ती । ब्रह्म॑ण: । वज्र॑: ॥१०.८॥


    स्वर रहित मन्त्र

    ओषन्ती समोषन्ती ब्रह्मणो वज्रः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    ओषन्ती । सम्ऽओषन्ती । ब्रह्मण: । वज्र: ॥१०.८॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 12; सूक्त » 5; मन्त्र » 54
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।

    पदार्थ

    (ओषन्ती) जलाती हुई, (समोषन्ती) भस्म कर देती हुई, तू [वेदनिन्दक के लिये] (ब्रह्मणः) ब्रह्म [परमेश्वर] का (वज्रः) वज्ररूप है ॥५४॥

    भावार्थ

    वेदानुयायी सत्यवीर पुरुष समाज हेतु वज्र बनकर प्रशासन का सहयोग करें जिससे वेद प्रतिकूल अत्याचारी व्यक्ति का उपद्रव अग्नि के भाँति नाश हों ॥५४॥

    टिप्पणी

    ५४−(ओषन्ती) उष दाहे−शतृ। दहन्ती (समोषन्ती) सम्यग्भस्मीकुर्वती (ब्रह्मणः) परमेश्वरस्य (वज्रः) शस्त्रं यथा ॥

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    विषय

    छेदन.....हिंसा.....आशरविनाश

    पदार्थ

    १. हे (आंगिरसि) = विद्वान् ब्राह्मण की शक्तिरूप वेदवाणि! तू (ब्रह्माज्यम्) = ज्ञान के ध्वंसक दुष्ट पुरुष को (छिन्धि) = काट डाल, (आच्छिन्धि) = सब ओर से काट डाल, (प्रच्छिन्धि) = अच्छी प्रकार काट डाल। (क्षापय क्षापय) = उजाड़ डाल और उजाड़ ही डाल। २. हे आंगिरसि! तू (हि) = निश्चय से (वैश्वदेवी उच्यसे) = सब दिव्य गुणोंवाली व सब शत्रुओं की विजिगीषावाली [दिव विजिगीषायाम्] कही जाती है। (आवृता) = आवृत कर दी गई-प्रतिबन्ध लगा दी गई तू (कृत्या) = हिंसा हो जाती है, (कूल्वजम्) = [कु+उल दाहे+ज] इस पृथिवी पर दाह को उत्पन्न करनेवाली होती है। तू ओषन्ती जलाती हुई, और (सम् ओषन्ती) = खूब ही जलाती हुई (ब्रह्मणो वज्र:) = इस ब्रह्मज्य के लिए ब्रह्म [परमात्मा] का वज्र ही हो जाती है। ३. (क्षुरपवि:) = छुरे की नोक बनकर (मृत्युः भूत्वा विधाव त्वम्) = मौत बनकर तू ब्रह्मज्य पर आक्रमण कर। इन (जिनताम्) = ब्रह्मज्यों के (वर्च:) = तेज को (इष्टम्) = यज्ञों को (पूर्तम्) = वापी, कूप, तड़ागादि के निर्माण से उत्पन्न फलों को (आशिषः च) = और उन ब्रह्मज्यों की सब कामनाओं को तू (आदत्से) = छीन लेती है-विनष्ट कर डालती है।

    भावार्थ

    नष्ट की गई ब्रह्मगवी इन ब्रह्मज्यों को ही छिन कर डालती है। वैश्वदेवी होती हुई भी यह ब्रह्मज्यों के लिए हिंसा प्रमाणित होती है। यह उनके सब पुण्यफलों को छीन लेती |

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    भाषार्थ

    [गोजाति] (ओषन्ती) दग्ध करने वाली, तथा (समोषन्ती) सम्यक् दग्ध करने वाली (ब्रह्मणः वज्रः) ब्रह्म का वज्ररूप है।[ओषन्ती= उष दाहे]।

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    विषय

    ब्रह्मगवी का वर्णन।

    भावार्थ

    हे अङ्गिरस ! तू (ओषन्ती) दहन और सन्ताप करती हुई और (सम् ओषन्ती) खूब जलाती हुई (ब्रह्मणः वज्रः) ब्रह्म, ब्राह्मण की वज्र = तलवार के समान है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिर्देवते च पूर्वोक्ते। ४७, ४९, ५१-५३, ५७-५९, ६१ प्राजापत्यानुष्टुभः, ४८ आर्षी अनुष्टुप्, ५० साम्नी बृहती, ५४, ५५ प्राजापत्या उष्णिक्, ५६ आसुरी गायत्री, ६० गायत्री। पञ्चदशर्चं षष्टं पर्यायसूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Divine Cow

    Meaning

    Blazing, burning, warming with life, Brahma’s thunder, Brahmana’s lightning light and freedom.

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    Translation

    Burning, consuming, thunderbolt of the brahman.

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    Translation

    This device heating and burning all is called the thunder-bolt of Brahmanas.

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    Translation

    Consuming, burning all things up, O Vedic knowledge! thou art the thunderbolt of God

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ५४−(ओषन्ती) उष दाहे−शतृ। दहन्ती (समोषन्ती) सम्यग्भस्मीकुर्वती (ब्रह्मणः) परमेश्वरस्य (वज्रः) शस्त्रं यथा ॥

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