Loading...
मन्त्र चुनें
  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 5/ मन्त्र 27
    ऋषिः - अथर्वाचार्यः देवता - ब्रह्मगवी छन्दः - आर्च्युष्णिक् सूक्तम् - ब्रह्मगवी सूक्त
    67

    अ॑नु॒गच्छ॑न्ती प्रा॒णानुप॑ दासयति ब्रह्मग॒वी ब्र॑ह्म॒ज्यस्य॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒नु॒ऽगच्छ॑न्ती । प्रा॒णान् । उप॑ । दा॒स॒य॒ति॒ । ब्र॒ह्म॒ऽग॒वी । ब्र॒ह्म॒ऽज्यस्य॑ ॥७.१६॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अनुगच्छन्ती प्राणानुप दासयति ब्रह्मगवी ब्रह्मज्यस्य ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अनुऽगच्छन्ती । प्राणान् । उप । दासयति । ब्रह्मऽगवी । ब्रह्मऽज्यस्य ॥७.१६॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 12; सूक्त » 5; मन्त्र » 27
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।

    पदार्थ

    (अनुगच्छन्ती) निरन्तर चलती हुई (ब्रह्मगवी) वेदवाणी (ब्रह्मज्यस्य) ब्रह्मचारियों के हानिकारक के (प्राणान्) प्राणों को (उप दासयति) दबोच डालती है ॥२७॥

    भावार्थ

    वेदों के निरन्तर अभ्यासी पुरुष वेदविरोधियों को अवश्य हराते हैं ॥२७॥

    टिप्पणी

    २७−(अनुगच्छन्ती) अनुसरन्ती (प्राणान्) जीवनसाधनानि (उप दासयति) सर्वथा नाशयति (ब्रह्मगवी) म० ५। वेदवाणी (ब्रह्मज्यस्य) म० १५। ब्रह्मचारिणां हानिकरस्य ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    अन्धकार व विनाश

    पदार्थ

    १. यदि एक ब्रह्मज्य राजन्य एक वेदज्ञ ब्राह्मण को नौकर की तरह अपने समीप उपस्थित होने के लिए आदिष्ट करता है, तो (उपतिष्ठन्ती) = उसके समीप उपस्थित होती हुई यह ब्रह्मगवी (सेदिः) = उस अत्यचारी के विनाश का कारण होती है। (परामृष्टा) = और यदि उस अत्याचारी से यह किसी प्रकार परामृष्ट होती है-कठोर स्पर्श को प्राप्त करती है, तो (मिथोयोध:) = यह राष्ट्र की इन प्रकृतियों को परस्पर लड़ानेवाली हो जाती है, अर्थात् ये शासक आपस में ही लड़ मरते हैं। इस ब्रह्मज्न द्वारा (मुखे अपिनाह्यमाने) = मुख के बाँधे जाने पर, अर्थात् प्रचार पर प्रतिबन्ध लगा दिये जाने पर (शरव्या) = यह लक्ष्य पर आघात करनेवाले बाणसमूह के समान हो जाती है। (हन्यमाना) = मारी जाती हुई यह ब्रह्मगवी (ऋति:) = विनाश ही हो जाती है। (निपतन्ती) = नीचे गिरती हुई यह (अघविषा) = भयंकर विष हो जाती है और (निपतिता तम:) = गिरी हुई चारों ओर अन्धकार ही-अन्धकार फैला देती है। संक्षेप में, इसप्रकार पीड़ित हुई-हुई यह (ब्रह्मगवी) = वेदवाणी (ब्रह्मज्यस्य) = ब्रह्म की हानि करनेवाले इस ब्रह्मघाती के (अनुगच्छन्ती) = पीछे चलती हुई (प्राणान् उपदासयति) = उसके प्राणों को विनष्ट कर डालती है।

    भावार्थ

    ब्रह्मज्य शासक ज्ञानप्रसार का विरोध करता हुआ राष्ट्रको अन्धकार के गर्त में डाल देता है और स्वयं भी उस अन्धकार में ही कहीं विलीन हो जाता है।

     

    इस भाष्य को एडिट करें

    भाषार्थ

    (ब्रह्मगवी) ब्रह्म अर्थात् परमेश्वर की गौ या गोजाति (ब्रह्मज्यस्य) ब्राह्मण को हानि पहुंचाने वाले मृत क्षत्रिय का (अनुगच्छन्ती) अनुगमन करती हुई, पीछा करती हुई, (प्राणान्) प्राणों को (उप दासयति) विनष्ट करती है।

    टिप्पणी

    [मन्त्र २६ के अनुसार घातक क्षत्रिय (राजा) को तो मार दिया गया। गौ भी मारी गई। मन्त्र का अभिप्राय यह है मृत गौ, मृत हत्यारे क्षत्रिय का पीछा करती है, और पुनः जन्म लिये हत्यारे के प्राणों को नष्ट कर देती है। कर्म गति के अनुसार यह सम्भव है कि मृत गौ, ऐसे मनुष्य या प्राणी के रूप में पुनः पैदा हो जोकि नए शरीर में प्राप्त हत्यारे के प्राणों का हरण कर ले]।

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    ब्रह्मगवी का वर्णन।

    भावार्थ

    (ब्रह्मज्यस्य) ‘ब्रह्म’ = ब्राह्मण और ब्रह्म वेद की हानि करने वाले ब्रहाद्वेषी पुरुष के (अनुगच्छन्ती) पीछे पीछे चलती हुई (ब्रह्मगवी) ‘ब्रह्मगवी’ उसके (प्राणान् उप दासयति) प्राणों का नाश करा डालती है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिर्देवताच पूर्वोक्ते। १२ विराड् विषमा गायत्री, १३ आसुरी अनुष्टुप्, १४, २६ साम्नी उष्णिक, १५ गायत्री, १६, १७, १९, २० प्राजापत्यानुष्टुप्, १८ याजुषी जगती, २१, २५ साम्नी अनुष्टुप, २२ साम्नी बृहती, २३ याजुषीत्रिष्टुप्, २४ आसुरीगायत्री, २७ आर्ची उष्णिक्। षोडशर्चं सूक्तम्॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (4)

    Subject

    Divine Cow

    Meaning

    The Divine Cow pursues the violator by his foot steps and destroys the very soul of his life.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    Going after him, the Brahman-cow exhausts the breaths of the Brahman-scather.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    The Brahmagavi following him destroyes the vital breath of injurer of the Brahmana.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    Pursuing him, Vedic knowledge extinguished the vital breath of its injurer.

    इस भाष्य को एडिट करें

    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २७−(अनुगच्छन्ती) अनुसरन्ती (प्राणान्) जीवनसाधनानि (उप दासयति) सर्वथा नाशयति (ब्रह्मगवी) म० ५। वेदवाणी (ब्रह्मज्यस्य) म० १५। ब्रह्मचारिणां हानिकरस्य ॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top