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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 4/ मन्त्र 32
    ऋषिः - यम, मन्त्रोक्त देवता - अनुष्टुप् छन्दः - अथर्वा सूक्तम् - पितृमेध सूक्त
    43

    धा॒नाधे॒नुर॑भवद्व॒त्सो अ॑स्यास्ति॒लोऽभ॑वत्। तां वै य॒मस्य॒ राज्ये॒ अक्षि॑ता॒मुप॑जीवति ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    धा॒ना: । धे॒नु: । अ॒भ॒व॒त् । व॒त्स: । अ॒स्या॒: । ति॒ल: । अ॒भ॒व॒त् । ताम् । वै । य॒मस्य॑ । राज्ये॑ । अक्षि॑ताम् । उप॑ । जी॒व॒ति॒ ॥४.३२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    धानाधेनुरभवद्वत्सो अस्यास्तिलोऽभवत्। तां वै यमस्य राज्ये अक्षितामुपजीवति ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    धाना: । धेनु: । अभवत् । वत्स: । अस्या: । तिल: । अभवत् । ताम् । वै । यमस्य । राज्ये । अक्षिताम् । उप । जीवति ॥४.३२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 18; सूक्त » 4; मन्त्र » 32
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    गोरक्षा का उपदेश।

    पदार्थ

    (अस्याः) इस [गौ] से (धानाः) धानियें [सुसंस्कृत पौष्टिक पदार्थ] और (धेनुः) गौ और (वत्सः) बछड़ा (अभवत्) होता है और (तिलः) तिल [तिल सरसों आदि] (अभवत्) होता है। (यमस्य)न्यायकारी राजा के (राज्ये) राज्य में [मनुष्य] (वै) निश्चय करके (ताम्) उस (अक्षिताम्) बिना सतायी हुई [गौ] के (उप जीवति) सहारे से जीवता है ॥३२॥

    भावार्थ

    उत्तम राज्य केप्रबन्ध द्वारा गौ के उपकार से अन्न और तेल आदि भोजन आदि के लिये तथा गौ दूध, घीआदि के लिये और बैल खेती आदि के लिये होते हैं, जिन पदार्थों के ऊपर मनुष्य काजीवन निर्भर है ॥३२॥

    टिप्पणी

    ३२−(धानाः) सुसंस्कृतपौष्टिकपदार्थाः (धेनुः) दोग्ध्री गौः (अभवत्) भवति (वत्सः) गोशिशुः। वृषभः (अस्याः) धेनोः सकाशात् (तिलः)तिलसर्षपादिपदार्थः (ताम्) गाम् (वै) निश्चयेन (यमस्य) न्यायशीलस्य राज्ञः (राज्ये) जनपदे (अक्षिताम्) अहिंसिताम् (उप) उपेत्य (जीवति) प्राणान् धारयति ॥

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    विषय

    थाना और तिल

    पदार्थ

    १. गतमन्त्र में वस्त्रों के लिए सामान्य नियम का संकेत किया था। यहाँ भोजन का प्रतिपादन करते हुए कहते हैं कि (धाना:) = भृष्टयव [भुने जौ] तुम्हारे लिए (धेनुः अभवत्) = धेनु-पालन करनेवाली गौ हों। (तिल:) = तिल (अस्याः वत्सा अभवत्) = इस धेनु के बछड़े के स्थानापन्न हों। २. (ताम्) = उस नानारूप गौ का (वै) = निश्चय से (अक्षिताम्) = जो नष्ट नहीं होने देनेवाली, उसका (यमस्य राज्ये) = उस सर्वनियन्ता प्रभु के राज्य में (उपजीवति) = यह साधक उपभोग करता है। इस साधक के भोजन 'धान तथा तिल' आदि सात्विक पदार्थ ही होते हैं।

    भावार्थ

    हम भोजन के लिए 'धान ब तिल' आदि सात्विक पदार्थों का ही ग्रहण करें।

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    भाषार्थ

    (यमस्य राज्ये) नियामक राजा के राज्य में (धानाः) धानें (अभवत्) होती हैं, (धेनुः अभवत्) दुधार गौएँ होती हैं। (अस्याः) इन गौओं के (वत्सः) बछड़े होते हैं, और (तिलः) तिल (अभवत्) होते हैं। (वै) निश्चित से (ताम्) उस धाना तिल और गौ के आश्रय—जो धाना तिल और गौ (अक्षिताम्) क्षीण नहीं होने पाते, जिनकी मात्रा तथा संख्या कम नहीं होने पाती—(जीवति) प्रजाजन जीवित रहता है।

    टिप्पणी

    [धेनु वत्स और तिल में जात्येकवचन है। इसी दृष्टि से “अभवत्” में भी एकवचन प्रयुक्त हुआ है। मन्त्र में धाना को गो रूप, तथा तिल को वत्सरूप मानकर अर्थ किया जाता है। इस दृष्टि में अभिप्राय यह है कि जैसे बछड़े के होते गौ पुष्टिकर दूध देती है, वैसे तिलों के साथ धाना का सेवन करने से धाना पुष्टि देता है। “धानाः” पद नित्यबहुवचनात्न होता है। जैसे ओषधियों के अनुपान, ओषधियों के गुणों के अभिव्यञ्जक होते हैं, वैसे धाना के अनुखाद्य अर्थात् तिल, धाना के गुणों के अभिव्यञ्जक हैं।]

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    विषय

    देवयान और पितृयाण।

    भावार्थ

    पूर्वोक्त २५ में कहे ‘तिलमिश्रा धाना’ की व्याख्या करते हैं। (धानाः) ‘धाना’, लोक के धारण पोषण में समर्थ होने से ही (धेनुः अभवत्) धेनु है और (अस्याः वत्सः) उसका बछड़ा (तिलः अभवत्) स्नेह युक्त होने से तिल हैं। २७ मन्त्र में कहे ‘अक्षिति’ की व्याख्या करते हैं। (यमस्य राज्ये) नियन्ता परमेश्वर के राज्य में (ताम्) उस गो माता को (अक्षिताम्) सदा अक्षीण रूप में या अक्षय सम्पदा के रूप में प्राप्त करके उसके आधार पर (उप जीवति) यह लोक अपनी जीवनवृत्ति चलाना है।

    टिप्पणी

    (च०) ‘जीवति’ इति सायणाभिमतः।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। यमः, मन्त्रोक्ताः बहवश्च देवताः (८१ पितरो देवताः ८८ अग्निः, ८९ चन्द्रमाः) १, ४, ७, १४, ३६, ६०, भुरिजः, २, ५,११,२९,५०, ५१,५८ जगत्यः। ३ पश्चपदा भुरिगतिजगती, ६, ९, १३, पञ्चपदा शक्वरी (९ भुरिक्, १३ त्र्यवसाना), ८ पश्चपदा बृहती (२६ विराट्) २७ याजुषी गायत्री [ २५ ], ३१, ३२, ३८, ४१, ४२, ५५-५७,५९,६१ अनुष्टुप् (५६ ककुम्मती)। ३६,६२, ६३ आस्तारपंक्तिः (३९ पुरोविराड्, ६२ भुरिक्, ६३ स्वराड्), ६७ द्विपदा आर्ची अनुष्टुप्, ६८, ७१ आसुरी अनुष्टुप, ७२, ७४,७९ आसुरीपंक्तिः, ७५ आसुरीगायत्री, ७६ आसुरीउष्णिक्, ७७ दैवी जगती, ७८ आसुरीत्रिष्टुप्, ८० आसुरी जगती, ८१ प्राजापत्यानुष्टुप्, ८२ साम्नी बृहती, ८३, ८४ साम्नीत्रिष्टुभौ, ८५ आसुरी बृहती, (६७-६८,७१, (८६ एकावसाना), ८६, ८७, चतुष्पदा उष्णिक्, (८६ ककुम्मती, ८७ शंकुमती), ८८ त्र्यवसाना पथ्यापंक्तिः, ८९ पञ्चपदा पथ्यापंक्तिः, शेषा स्त्रिष्टुभः। एकोननवत्यृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Victory, Freedom and Security

    Meaning

    From this Aditi, Nature, the cows are born, of this, the calf was born, there is the rice grain, there is the sesamum grain. All sacred. Thus in the dominion of the Ruling Yama, man lives by that Aditi Cow, unhurt, undiminished, unexhausted, unpolluted mother source.

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    Translation

    This garment god Savitar gives thee to wear; putting on that which is tarpya, do thou go about in Yama’s realm.

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    Translation

    O Yajmana, the grains of corn are known as Dhenu, the cow (in the jurisdiction of) Yajna and the sesamum becomes her calf. The man keeping this Dhenu, grain property inexhaustible conducts his affairs in the realm of Yama.the fire of the Yajna.

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    Translation

    The parched rice (i.e., khilan) is cow and sesame is her calf. in the kingdom of the Controller of all, people subsist on her with imperishable sources of nourishment.

    Footnote

    Parched rice (khilan), having the same qualities of nourishment as cow, is named cow here. Sesame with oily qualities of attachment is termed calf. Both provide means of subsistence to the populace. Thus they provide inexhaustible source of nourishment to them

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३२−(धानाः) सुसंस्कृतपौष्टिकपदार्थाः (धेनुः) दोग्ध्री गौः (अभवत्) भवति (वत्सः) गोशिशुः। वृषभः (अस्याः) धेनोः सकाशात् (तिलः)तिलसर्षपादिपदार्थः (ताम्) गाम् (वै) निश्चयेन (यमस्य) न्यायशीलस्य राज्ञः (राज्ये) जनपदे (अक्षिताम्) अहिंसिताम् (उप) उपेत्य (जीवति) प्राणान् धारयति ॥

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