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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 4/ मन्त्र 47
    ऋषिः - यम, मन्त्रोक्त देवता - त्रिष्टुप् छन्दः - अथर्वा सूक्तम् - पितृमेध सूक्त
    36

    सर॑स्वति॒ यास॒रथं॑ य॒याथो॒क्थैः स्व॒धाभि॑र्देवि पि॒तृभि॒र्मद॑न्ती। स॑हस्रा॒र्घमि॒डोअत्र॑ भा॒गं रा॒यस्पोषं॒ यज॑मानाय धेहि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    सर॑स्वत‍ि । या । स॒ऽरथ॑म् । य॒याथ॑ । उ॒क्थै: । स्व॒धाभि॑: । दे॒वि॒ । पि॒तृऽभि॑: । मद॑न्ती । स॒ह॒स्र॒ऽअ॒र्घम् । इ॒ड: । अत्र॑ । भा॒गम् । रा॒य: । पोष॑म् । यज॑मानाय । धे॒हि॒ ॥४.४७॥


    स्वर रहित मन्त्र

    सरस्वति यासरथं ययाथोक्थैः स्वधाभिर्देवि पितृभिर्मदन्ती। सहस्रार्घमिडोअत्र भागं रायस्पोषं यजमानाय धेहि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    सरस्वत‍ि । या । सऽरथम् । ययाथ । उक्थै: । स्वधाभि: । देवि । पितृऽभि: । मदन्ती । सहस्रऽअर्घम् । इड: । अत्र । भागम् । राय: । पोषम् । यजमानाय । धेहि ॥४.४७॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 18; सूक्त » 4; मन्त्र » 47
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    सरस्वती के आवाहन का उपदेश।

    पदार्थ

    (सरस्वति) हे सरस्वती ! [विज्ञानवती वेदविद्या] (देवि) हे देवी ! [उत्तम गुणवाली] (या) जो तू (उक्थैः) वेदोक्त स्तोत्रों से (सरथम्) रमणीय गुणोंवाली होकर और (स्वधाभिः) आत्मधारणशक्तियों के सहित [विराजमान] (पितृभिः) पितरों [विज्ञानियों] के साथ (मदन्ती)तृप्त होती हुई (ययाथ) प्राप्त हुई है। सो तू (अत्र) यहाँ (इडः) विद्या के (सहस्रार्घम्) सहस्रों प्रकार पूजनीय (भागम्) भाग को और (रायः) धन का (पोषम्)वृद्धि को (यजमानाय) यजमान [विद्वानों के सत्कारी] के लिये (धेहि) दान कर ॥४७॥

    भावार्थ

    आत्मविश्वासी विज्ञानीलोग वेदविद्या प्राप्त करके आनन्द भोगते हैं। सब मनुष्य विद्वानों के सत्सङ्ग सेवेदविद्या ग्रहण करके धन आदि की वृद्धि करें ॥४७॥

    टिप्पणी

    ४५-४७−मन्त्राव्याख्याताः-अ० १८।१।४१-४३ ॥

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    विषय

    सरस्वती का आराधन

    पदार्थ

    व्याख्या देखो १८.१.४१-४३

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    भाषार्थ

    (सरस्वति) हे ज्ञानमयि, सरसहृदये, जगन्मातः! (या) जो आप (सरथम्) जीवात्मा के साथ एक हृदयरथ में, या शरीररथ में आरूढ़ हुई (ययाथ) सक्रिय हुई हैं, और (उक्थैः) वैदिक सूक्तों द्वारा सदुपदेश दे कर (स्वधाभिः) तथा आत्म-धारण-पोषण योग्य सात्त्विक अन्न देकर, तथा (पितृभिः) रक्षा तथा पालन करनेवाले माता-पिता आदि सम्बन्धी देकर (मदन्ती) हमें आनन्दित तथा मुदित-प्रमुदित कर रही हैं, वह आप (अत्र) इस हमारे पार्थिव जीवन में (यजमानाय) प्रत्येक यजन-कर्त्ता के लिए (इडः) वैदिक स्तुतियों में कथित (सहस्रार्घम्) महामूल्य तथा (भागम्) सेवनीय (रायस्पोषम्) सांसारिक और आध्यात्मिक सम्पत्ति की परिपुष्टि (धेहि) प्रदान करें।

    टिप्पणी

    [जगन्माता प्रत्येक के हृदय में तथा शरीर में बसी हुई उसके शारीरिक अङ्ग-प्रत्यङ्ग को सक्रिय कर रही है। श्वास-प्रश्वास, हृदय की गति, पाचनक्रिया आदि परमेश्वररूप जगन्माता द्वारा संचालित हो रहे हैं। यह तब तक ही जब तक कि जीवात्मा इस शरीर के साथ कर्मों द्वारा बन्धा हुआ है। महामूल्य सांसारिक सम्पत्ति=स्वास्थ्य, जीवन की पवित्रता, यश, तेज, सद्बुद्धि, प्रज्ञा आदि। भागम्=भज सेवायाम्।]

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    विषय

    देवयान और पितृयाण।

    भावार्थ

    व्याख्या देखो अथर्व० १८। ९। ४२। ४३॥

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। यमः, मन्त्रोक्ताः बहवश्च देवताः (८१ पितरो देवताः ८८ अग्निः, ८९ चन्द्रमाः) १, ४, ७, १४, ३६, ६०, भुरिजः, २, ५,११,२९,५०, ५१,५८ जगत्यः। ३ पश्चपदा भुरिगतिजगती, ६, ९, १३, पञ्चपदा शक्वरी (९ भुरिक्, १३ त्र्यवसाना), ८ पश्चपदा बृहती (२६ विराट्) २७ याजुषी गायत्री [ २५ ], ३१, ३२, ३८, ४१, ४२, ५५-५७,५९,६१ अनुष्टुप् (५६ ककुम्मती)। ३६,६२, ६३ आस्तारपंक्तिः (३९ पुरोविराड्, ६२ भुरिक्, ६३ स्वराड्), ६७ द्विपदा आर्ची अनुष्टुप्, ६८, ७१ आसुरी अनुष्टुप, ७२, ७४,७९ आसुरीपंक्तिः, ७५ आसुरीगायत्री, ७६ आसुरीउष्णिक्, ७७ दैवी जगती, ७८ आसुरीत्रिष्टुप्, ८० आसुरी जगती, ८१ प्राजापत्यानुष्टुप्, ८२ साम्नी बृहती, ८३, ८४ साम्नीत्रिष्टुभौ, ८५ आसुरी बृहती, (६७-६८,७१, (८६ एकावसाना), ८६, ८७, चतुष्पदा उष्णिक्, (८६ ककुम्मती, ८७ शंकुमती), ८८ त्र्यवसाना पथ्यापंक्तिः, ८९ पञ्चपदा पथ्यापंक्तिः, शेषा स्त्रिष्टुभः। एकोननवत्यृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Victory, Freedom and Security

    Meaning

    Mother Sarasvati, refulgent spirit of divine light and knowledge, who move with essential powers and cosmic hymns, rejoicing with veteran souls of creative vision on the same clairvoyant medium of imagination as they, like a goddess on chariot, pray bring and vest the yajamana here with his characteristic share of universal wealth, honour, excellence and living energy of infinite vision and inspiration flowing in a thousand streams of divinity.

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    Translation

    O Sarasvati, that wentest in company with the songs, with the svadhas, O goddess, revelling with the Fathers, assign thou to the sacrificer here a portion of refreshment of thousand-fold value, abundance of wealth.

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    Translation

    Madhyamika Vac (Saraswati), the sound-vibration which plays mysterious roles and which oscillates in the uninterruptory space, grasping the oblational substance of Yajna operates its functions with the cereals offered in the Yajna-fire, pronounced Ved-mantras and the rays. This bestows to the Yajmana, in the Yajna the plenteous wealth a portion worth a thousand, of refreshment.

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    Translation

    O Divine Saraswati, ye who go along with the praise-songs, being pleased with self-sustaining elders, endow the sacrificer, here in this world with thousand-fold riches and prosperity of a part of food-grains.

    Footnote

    Here in Saraswati means both the Vedic lore and lady of the house as in 46 above. See 18.1.43.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ४५-४७−मन्त्राव्याख्याताः-अ० १८।१।४१-४३ ॥

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