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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 4/ मन्त्र 54
    ऋषिः - यम, मन्त्रोक्त देवता - त्रिष्टुप् छन्दः - अथर्वा सूक्तम् - पितृमेध सूक्त
    44

    ऊ॒र्जो भा॒गो यइ॒मं ज॒जानाश्मान्ना॑ना॒माधि॑पत्यं ज॒गाम॑। तम॑र्चत वि॒श्वमि॑त्रा ह॒विर्भिः॒ सनो॑ य॒मः प्र॑त॒रं जी॒वसे॑ धात् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ऊ॒र्ज: । भा॒ग: । य: । इ॒मम् । ज॒जान॑ । अश्मा॑ । अन्ना॑नाम् । आधि॑ऽपत्यम् । ज॒गाम॑ । तम् । अ॒र्च॒त॒ । वि॒श्वऽमि॑त्रा: । ह॒वि:ऽभि॑: । स: । न॒:। य॒म: । प्र॒ऽत॒रम् । जी॒वसे॑ । धा॒त् ॥४.५४॥


    स्वर रहित मन्त्र

    ऊर्जो भागो यइमं जजानाश्मान्नानामाधिपत्यं जगाम। तमर्चत विश्वमित्रा हविर्भिः सनो यमः प्रतरं जीवसे धात् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    ऊर्ज: । भाग: । य: । इमम् । जजान । अश्मा । अन्नानाम् । आधिऽपत्यम् । जगाम । तम् । अर्चत । विश्वऽमित्रा: । हवि:ऽभि: । स: । न:। यम: । प्रऽतरम् । जीवसे । धात् ॥४.५४॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 18; सूक्त » 4; मन्त्र » 54
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    परमात्मा की भक्ति के फल का उपदेश।

    पदार्थ

    (ऊर्जः) पराक्रम के (यः) जिस (भागः) भाग करनेवाले [परमेश्वर] ने (इमम्) इस [संसार] को (जजान)उत्पन्न किया है और (अश्मा) व्यापक होकर (अन्नानाम्) अन्नों का (आधिपत्यम्)स्वामिपन (जगाम) पाया है। (तम्) उस [परमात्मा] को (विश्वमित्राः) सबके मित्र तुम (हविर्भिः) आत्मदानों से (अर्चत) पूजो, (सः) वह (यमः) न्यायकारी परमेश्वर (नः)हमें (प्रतरम्) अधिक उत्तमता से (जीवसे) जीने के लिये (धात्) धारणकरे ॥५४॥

    भावार्थ

    जगत्स्रष्टा परमेश्वरसब प्राणियों को उन के पुरुषार्थ के अनुसार सामर्थ्य देकर अन्न आदि देता है, इसलिये मनुष्य अधिक-अधिक पुरुषार्थ करके अपने जीवन को अधिक-अधिक ऊँचा बनावें॥५४॥इस मन्त्र का उत्तरार्द्ध ऊपर आ चुका है-अ० १८।३।६३ ॥

    टिप्पणी

    ५४−(ऊर्जः) ऊर्जबलप्राणनयोः-क्विप्। पराक्रमस्य (भागः) संभक्ता (यः) परमेश्वरः (इमम्) दृश्यमानंसंसारम् (जजान) जनयामास (अश्मा) अशू व्याप्तौ-मनिन्। व्यापकः परमात्मा (अन्नानाम्) भोजनानाम् (आधिपत्यम्) स्वामित्वम् (जगाम) प्राप। अन्यत्पूर्ववत्-अ० १८।३।६३ ॥

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    विषय

    "ऊर्ज: भागः' प्रभु

    पदार्थ

    १. (ऊर्ज:) = सब बल व प्राणशक्तियों का (भाग:) = संविभाग करनेवाला-प्राप्त करानेवाला (यः) = जो (इमं जजान) = इस ब्रह्माण्ड को जन्म देता है, वह (अश्मा) = [अश् व्याप्तौ] सर्वव्यापक है। (अन्नानामाधिपत्यं जगाम) = वही सब अन्नों के आधिपत्य को प्राप्त हुआ है-वही सब अन्नों का स्वामी है। २. हे जीवो! तुम (विश्वमित्रा:) = सबके प्रति स्नेहवाले होते हुए (हविभिः) = त्यागपूर्वक अदन के द्वारा (तम् अर्चत) = उस प्रभु का पूजन करो। इसप्रकार 'सबके प्रति स्नेह व हवि द्वारा प्रभु-पूजन होने पर (स: यमः) = वे सर्वनियन्ता प्रभु (न:) = हमें (प्रतरं जीवसे धात्) = खूब ही दीर्घ जीवन के लिए धारण करें।

    भावार्थ

    प्रभु ही बल व प्राणशक्ति का धारण करनेवाले हैं, सब अन्नों के स्वामी हैं। प्रभु पूजन का प्रकार यह है कि हम सबके प्रति स्नेहवाले होते हुए त्यागपूर्वक अदन करें। वे नियन्ता प्रभु हमें दीर्घजीवन प्राप्त कराएंगे।

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    भाषार्थ

    वस्तुतः (ऊर्जः) अन्न का (भागः) यथोचित विभाग करनेवाला वह है, (यः) जिसने कि (इमम्) इस प्राणिवर्ग को (जजान) पैदा किया है। वह (अश्मा) मेघ के सदृश-व्यापक परमेश्वर (अन्नानाम्) अन्नों के (आधिपत्यं जगाम) आधिपत्य को प्राप्त किये हुए है। (विश्वमित्राः) हे सब भूतों के ..साथ मैत्री बालो.! (हविर्भिः) अन्न-प्रदान द्वारा (तम्) उस अन्नाधिपति की (अर्चत) अर्चनाएं= स्तुतियां किया करो। (सः यमः) वह नियामक परमेश्वर (प्रतरं जीवसे) अधिक पीने के लिये (नः) हमारा (धात्) धारण-पोषण करे।

    टिप्पणी

    [भागः= संभक्ता (सायण)। तथा- "विभक्तारं हवामहे बसोश्चित्रस्य राधसः। सवितारं नृचक्षसम् ॥ यजु० ३०।४ ॥ "सुखों के निवास के हेतु, आश्चर्यस्वरूप धन का विभाग करनेहारे, सब के उत्पादक, सब मनुष्यों के- अन्तर्यामीस्वरूप से-सब कामों के देखनेहारे परमात्मा की हम लोग प्रशंसा करें" (दयानन्द-भाष्य)। तथा " रत्ना विभजासि" (अथर्व० १८।१।२६)= अर्थात् हे परमेश्वर ! आप रमणीय पदार्थों का विभाग करनेवाले हैं, वांटने वाले हैं। अश्मा = मेघ (निघं० १।१०]; तथा अश्नुते व्याप्नोति= परमेश्वर। विश्वमित्राः= सब के मित्र, या सब प्राणी जिन के भिन्न बन गए हैं। हविर्भिः = हु दाने, देय अन्न। यमः = पौराणिक यम मृत्यु का अधिष्ठाता है, जीवनदाता और धारणपोषण का अधिष्ठाता नहीं।]

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    विषय

    देवयान और पितृयाण।

    भावार्थ

    (ऊर्जः) अन्न, या बल और प्राण देने वाले पदार्थ का (यः) जो (भागः) षष्ठ भाग (इमम्) इस राजा को (जजान) उत्पन्न करता है उससे ही वह (अश्मा अन्नानाम्) अन्नों को पीस डालने वाले चक्की के पाट के समान (अश्मा अन्नानाम्) प्रजाओं को दलन करने में समर्थ वीर्यवान् होकर (आधिपत्यम्) अधिपति पद को (जगाम) प्राप्त हो जाता है। हे (विश्वमित्राः) समस्त प्रजाओं के स्नेहपात्र, प्रतिष्ठित पुरुषो ! आप लोग (हविर्भिः) उत्तम स्तुतियों और अन्नों द्वारा (तम् अर्चत) उसकी अर्चा या पूजा सत्कार करो। (सः) वह (नः) हमारा, हमारे राष्ट्र का (यमः) नियन्ता यम, राजा है, वह हमें (प्रतरं) खूब लम्बे (जीवसे) जीवन के लिये (धात्) शक्ति प्रदान करे।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। यमः, मन्त्रोक्ताः बहवश्च देवताः (८१ पितरो देवताः ८८ अग्निः, ८९ चन्द्रमाः) १, ४, ७, १४, ३६, ६०, भुरिजः, २, ५,११,२९,५०, ५१,५८ जगत्यः। ३ पश्चपदा भुरिगतिजगती, ६, ९, १३, पञ्चपदा शक्वरी (९ भुरिक्, १३ त्र्यवसाना), ८ पश्चपदा बृहती (२६ विराट्) २७ याजुषी गायत्री [ २५ ], ३१, ३२, ३८, ४१, ४२, ५५-५७,५९,६१ अनुष्टुप् (५६ ककुम्मती)। ३६,६२, ६३ आस्तारपंक्तिः (३९ पुरोविराड्, ६२ भुरिक्, ६३ स्वराड्), ६७ द्विपदा आर्ची अनुष्टुप्, ६८, ७१ आसुरी अनुष्टुप, ७२, ७४,७९ आसुरीपंक्तिः, ७५ आसुरीगायत्री, ७६ आसुरीउष्णिक्, ७७ दैवी जगती, ७८ आसुरीत्रिष्टुप्, ८० आसुरी जगती, ८१ प्राजापत्यानुष्टुप्, ८२ साम्नी बृहती, ८३, ८४ साम्नीत्रिष्टुभौ, ८५ आसुरी बृहती, (६७-६८,७१, (८६ एकावसाना), ८६, ८७, चतुष्पदा उष्णिक्, (८६ ककुम्मती, ८७ शंकुमती), ८८ त्र्यवसाना पथ्यापंक्तिः, ८९ पञ्चपदा पथ्यापंक्तिः, शेषा स्त्रिष्टुभः। एकोननवत्यृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Victory, Freedom and Security

    Meaning

    He that is the giver of food and energy, who has created this world of life, He that is pervasive and holds control over all life-giving food substances, Him alone, O friends of all the world, worship with offers of havi in yajnic oblations, and pray that He, Yama, lord of time, life and law, may bless us with higher and saviour food and energy for body, mind and soul so that we may live a long and full life of health and joy.

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    Translation

    The share of refreshment that generated this man; the stone attained the overlordship of the foods - him praise ye, all befriended with oblations; may that yama make us to live further.

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    Translation

    O Ye men, you the friends of all worship through the offer of oblations (in Yajna to Him who is the distribution of vigor and has created it. He is firm like rock and has attained the mastership over Annas, the worlds and objects of mortality, May He, the All-controlling entity make us to live long.

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    Translation

    The agriculturist produces a part (i.e., sixth) of food-grains for this king, who thus attains the lordship of the people, like a grinding stone of the food-grains. O benefactors of the populace, honor him (the king) thus by offering food-grains (as revenue in kind). The very same controller (of grains etc.) may give us nourishment to enable us to lead a long life.

    Footnote

    The king gets one-sixth of the food-grains and utilizes it for the benefit of the people for enabling them to attain long life.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ५४−(ऊर्जः) ऊर्जबलप्राणनयोः-क्विप्। पराक्रमस्य (भागः) संभक्ता (यः) परमेश्वरः (इमम्) दृश्यमानंसंसारम् (जजान) जनयामास (अश्मा) अशू व्याप्तौ-मनिन्। व्यापकः परमात्मा (अन्नानाम्) भोजनानाम् (आधिपत्यम्) स्वामित्वम् (जगाम) प्राप। अन्यत्पूर्ववत्-अ० १८।३।६३ ॥

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