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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 4/ मन्त्र 60
    ऋषिः - यम, मन्त्रोक्त देवता - भुरिक् त्रिष्टुप् छन्दः - अथर्वा सूक्तम् - पितृमेध सूक्त
    45

    प्र वाए॒तीन्दु॒रिन्द्र॑स्य॒ निष्कृ॑तिं॒ सखा॒ सख्यु॒र्न प्र मि॑नाति संगि॒रः। मर्य॑इव॒ योषाः॒ सम॑र्षसे॒ सोमः॑ क॒लशे॑ श॒तया॑मना प॒था ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प्र । वै । ए॒ति॒ । इन्दु॑: । इन्द्र॑स्य । नि:ऽकृ॑तिम् । सखा॑ । सख्यु॑: । न । प्र । मि॒ना॒ति॒ । स॒म्ऽगि॒र: । मर्य॑:ऽइव । योषा॑: । सम् । अ॒र्ष॒से॒ । सोम॑: । क॒लशे॑ । श॒तऽया॑मना । प॒था ॥४.६०॥


    स्वर रहित मन्त्र

    प्र वाएतीन्दुरिन्द्रस्य निष्कृतिं सखा सख्युर्न प्र मिनाति संगिरः। मर्यइव योषाः समर्षसे सोमः कलशे शतयामना पथा ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    प्र । वै । एति । इन्दु: । इन्द्रस्य । नि:ऽकृतिम् । सखा । सख्यु: । न । प्र । मिनाति । सम्ऽगिर: । मर्य:ऽइव । योषा: । सम् । अर्षसे । सोम: । कलशे । शतऽयामना । पथा ॥४.६०॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 18; सूक्त » 4; मन्त्र » 60
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    ईश्वर की उपासना का उपदेश।

    पदार्थ

    (इन्दुः) ऐश्वर्यवान्जीवात्मा (इन्द्रस्य) परम ऐश्वर्यवान् जगदीश्वर की (निष्कृतिम्) निस्तार शक्तिको (वै) निश्चय करके (प्र) आगे को (एति) पाता जाता है, (सखा) सखा [परमात्मा कामित्र जीव] (सख्युः) सखा [अपने मित्र जगदीश्वर] की (संगिरः) उचित वाणियों को (न)नहीं (प्र मिनाति) तोड़ देता है। (मर्यः इव) जैसे मनुष्य (योषाः) अपनी स्त्री को [प्रीति से वैसे] (सोमः) प्रेरक आत्मा तू (कलशे) कलस [घटरूप हृदय] के भीतर (शतयामना) सैकड़ों गतिवाले (पथा) मार्ग से [परमात्मा को] (सम्) यथाविधि (अर्षसे)प्राप्त होता है ॥६०॥

    भावार्थ

    जो मनुष्य परमात्मा कीआज्ञाओं का पालन करता है, वही पापों से छूटकर मोक्षसुख भोगता है, और जैसेस्त्री-पुरुष गृहाश्रम की सिद्धि के लिये परस्पर हार्दिक प्रीति करते हैं, वैसेही योगी पुरुष अनेक प्रकार से अपने हृदय में परमात्मा का दर्शन करके उसके साथप्रीति में मग्न हो जाता है ॥६०॥यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−९।८६।१६ औरसामवेद में है−पू० ६।७।४ तथा उ० ४।२।७ ॥

    टिप्पणी

    ६०−(प्र) प्रकर्षेण (वै) निश्चयेन (एति)प्राप्नोति (इन्दुः) ऐश्वर्यवान् जीवात्मा (इन्द्रस्य) परमैश्वर्यवतःपरमेश्वरस्य (निष्कृतिम्) निस्तारशक्तिम्। निर्मुक्तिम् (सखा) सुहृद्वज्जीवात्मा (सख्युः) सर्वमित्रस्य परमात्मनः (न) निषेधे (प्र) (मिनाति) मीञ् हिंसायाम्।मीनातेर्निगमे। पा० ७।३।८१। इति ह्रस्वत्वम्। हिनस्ति (संगिरः) गॄविज्ञापने-क्विप्। संगरान्। समीचीनवचननानि (मर्यः) मनुष्यः (इव) यथा (योषाः) सुपांसुपो भवन्ति। वा० पा० ७।१।३९। एकवचनस्य बहुवचनम्। योषाम्। सेवनीयां स्त्रियम् (सम्) सम्यक् (अर्षसे) ऋषी गतौ, भौवादिकः। प्राप्नोषि (सोमः) सोमः सूर्यःप्रसवनात्, सोम आत्माऽप्येतस्मादेव-निरु० १४।१२। प्रेरको जीवात्मा (कलशे) घटरूपेहृदये (शतयामना) अल्लोपोऽनः। पा० ६।४।१३४। इति प्राप्तस्यअकारलोपस्याभावश्छान्दसः। शतयाम्ना। बहुगतियुक्तेन (पथा) मार्गेण ॥

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    विषय

    पवित्र हृदय व सोमरक्षण

    पदार्थ

    १. (इन्द्र:) = सोम [वीर्यशक्ति] (इन्द्रस्य) = जितेन्द्रिय पुरुष के (निष्कृतिम्) = संस्कृत-पवित्र हृदय की ओर (वा) = निश्चय से (प्रएति) = प्रकर्षण प्राप्त होता है। हृदय के पवित्र होने पर सोम की शरीर में ऊर्ध्वगति होती ही है। सोम का रक्षण होने पर (सखा) = प्रभु का मित्र बना हुआ वह सोमी पुरुष (सख्युः) = उस सबके सखा प्रभु के (संगिरः) = आदेशों को (न प्रमिनाति) = हिंसित नहीं करता। यह प्रभु के आदेशों का अवश्य पालन करता है। २. (इव) = जैसे (मर्य:) = एक मनुष्य (योषा:) = पत्नियों से मेलवाला होता है, उसी प्रकार यह (सोमः) = सोम भी (कलशे) = इस सोलह कलाओं के आधारभूत शरीर में (शतयामना पथा) = सौ मंजिलोंवाले [प्रयाणोंवाले] मार्ग के हेतु से, अर्थात् शतवर्षपर्यन्त चलानेवाले दीर्घजीवन के हेतु से-(समर्षसे) = प्राप्त होता है। वस्तुत: सोम एक मनुष्य का इतना प्रिय होना चाहिए जैसे पत्नी पति को प्रिय होती है।

    भावार्थ

    हम हृदय को पवित्र बनाते हुए अपने शरीर में सोम का रक्षण करनेवाले बनें। यह सोमी पुरुष प्रभु के आदेशों का पालन करता है। शरीर में सुरक्षित सोम हमें सौ वर्ष का दीर्घ जीवन प्राप्त कराता है।

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    भाषार्थ

    (इन्दुः) चन्द्रसम शीतल प्रकाशवाला परमेश्वर (इन्द्रस्य) जीवात्मा के (निष्कृतिम्) पवित्र हृदय में (वै) निश्चय से (प्र एति) आ प्रकट होता है। (सखा) परमेश्वर-सखा (सख्युः) जीवात्म-सखा के साथ की गई (संगिरः) प्रतिज्ञा का (न प्रमिनाति) भंग नहीं करता। (इव) जैसे (मर्यः) पति (योषाः) निज पत्नी के प्रति गमन करता है, वैसे (सोमः) सर्वोत्पादक आप (शतयामना) सैकड़ों उपमार्गोंवाले (पथा) पथों द्वारा (कलशे) उपासक के हृदय-घट या शरीर घट में (सभर्षसे) सम्यक्तया प्राप्त हो जाते हैं। [शतयाममा =भक्तिमार्ग, ज्ञानमार्ग, ध्यानमार्ग, क्रियायोगमार्ग आदि उपमार्ग।]

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    विषय

    देवयान और पितृयाण।

    भावार्थ

    जीव ईश्वर के मोक्षमें मिलाप का वर्णन करते हैं। (इन्दुः) चन्द्र के समान आह्लादक गुणों से युक्त तथा पर प्रकाश से प्रकाशित होने वाला जीव मोक्ष में (इन्द्रस्य) उस महान् ऐश्वर्यवान्, सूर्य के समान तेजस्वी परमेश्वर के (निष्कृतिम्) उस परम मोक्ष धामको जिसमें और कोई कार्य करना शेष न रह जाय (प्र एति) प्राप्त होता है। तब (सखा सख्युः न) जिस प्रकार मित्र अपने परममित्र के स्थान को प्राप्त करता है और बराबर (संगिरः) उत्तम मित्रतायुक्त प्रेमोक्तियों को (प्रमिनाति) कहता है उसी प्रकार वह जीव भी उस परमेश्वर के धाम को पहुंच कर उसके संग (सं-गिरः) उत्तम स्तुति वाणियों को (प्रमिनाति) उच्चारण करता है, उसकी बहुत बहुत स्तुतियां करता है। और फिर (मर्यः) हे परमेश्वर ! जिस प्रकार पुरुष, मद (योषाः इव) नाना स्त्रियों को भी स्वयं भोग लेता है उसी प्रकार प्रेम युक्त होकर तू एक होकर नाना जीवों का अपने अनन्त सामर्थ से सबको उसी आनन्दमय रूप में (शतयामना पया) सैकड़ों पुरुषों से चलने योग्य मार्गद्वारा तू (सोमः) सर्व प्रेरक होकर (कलशे) हृदय कलश में (सम् अर्षसे) सबको एक साथ ही प्राप्त होना है, साक्षात् होकर आनन्दित करता है। इसी एक पुरुष के नाना स्त्री भोगने के दृष्टान्त से पद्मपुराण, भागवत आदि में कृष्ण गोपी आदि के रमण को प्रधानता देने का साम्प्रदायिकों ने यत्न किया है।

    टिप्पणी

    (प्र०) ‘प्रो अयासीदुन्दुरिन्द्रस्य निष्कृतम्’ (द्वि०) ‘संगिरं’ (तृ०) ‘युवतिभिः’, ‘अर्षति’ (च०) ‘शतयाम्ना’ इति ऋ०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। यमः, मन्त्रोक्ताः बहवश्च देवताः (८१ पितरो देवताः ८८ अग्निः, ८९ चन्द्रमाः) १, ४, ७, १४, ३६, ६०, भुरिजः, २, ५,११,२९,५०, ५१,५८ जगत्यः। ३ पश्चपदा भुरिगतिजगती, ६, ९, १३, पञ्चपदा शक्वरी (९ भुरिक्, १३ त्र्यवसाना), ८ पश्चपदा बृहती (२६ विराट्) २७ याजुषी गायत्री [ २५ ], ३१, ३२, ३८, ४१, ४२, ५५-५७,५९,६१ अनुष्टुप् (५६ ककुम्मती)। ३६,६२, ६३ आस्तारपंक्तिः (३९ पुरोविराड्, ६२ भुरिक्, ६३ स्वराड्), ६७ द्विपदा आर्ची अनुष्टुप्, ६८, ७१ आसुरी अनुष्टुप, ७२, ७४,७९ आसुरीपंक्तिः, ७५ आसुरीगायत्री, ७६ आसुरीउष्णिक्, ७७ दैवी जगती, ७८ आसुरीत्रिष्टुप्, ८० आसुरी जगती, ८१ प्राजापत्यानुष्टुप्, ८२ साम्नी बृहती, ८३, ८४ साम्नीत्रिष्टुभौ, ८५ आसुरी बृहती, (६७-६८,७१, (८६ एकावसाना), ८६, ८७, चतुष्पदा उष्णिक्, (८६ ककुम्मती, ८७ शंकुमती), ८८ त्र्यवसाना पथ्यापंक्तिः, ८९ पञ्चपदा पथ्यापंक्तिः, शेषा स्त्रिष्टुभः। एकोननवत्यृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Victory, Freedom and Security

    Meaning

    Indu, the human soul which is enlightened, goes forward and rises to attain to the light of the grace of Indra. Neither the soul nor Indra violates the covenant of love between the human and the divine as a friend never violates the love and trust with another friend. Just as a man abides faithfully by the love of his beloved, so do you, O Soma, lord of peace and inspiration, proceed and emerge in the heart core of the devotee in a hundred ways.

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    Translation

    Soma verily goes forward to Indra’s rendezvous; the comrade does not violate the comrade’s agreements; thou rushest to join, as a male after female - soma, in the jar, by a road of a hundred tracks.

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    Translation

    Indu, the mystic attains the blessedness of God wherein nothing remains to be done and attained. As His friend he does not violate, His, the friends' advices. As a bride- groom meets his bride the Soma comes in to pot by the course or hundred (various) paths.

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    Translation

    The emancipated soul, with charming qualities like the moon, attain to the action-less state of the Glorious God (in salvation). Then the friend (soul), holds mutual conversations with his Friend (God). Just as a powerful man affords happiness to many women by looking after them, so does the pleasure-giving God instills bliss in the heart of the countless emancipated souls.

    Footnote

    The verse shows how the soul attains to the culmination of his object of life, i.e., salvation also see Rig, 9.86.10.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ६०−(प्र) प्रकर्षेण (वै) निश्चयेन (एति)प्राप्नोति (इन्दुः) ऐश्वर्यवान् जीवात्मा (इन्द्रस्य) परमैश्वर्यवतःपरमेश्वरस्य (निष्कृतिम्) निस्तारशक्तिम्। निर्मुक्तिम् (सखा) सुहृद्वज्जीवात्मा (सख्युः) सर्वमित्रस्य परमात्मनः (न) निषेधे (प्र) (मिनाति) मीञ् हिंसायाम्।मीनातेर्निगमे। पा० ७।३।८१। इति ह्रस्वत्वम्। हिनस्ति (संगिरः) गॄविज्ञापने-क्विप्। संगरान्। समीचीनवचननानि (मर्यः) मनुष्यः (इव) यथा (योषाः) सुपांसुपो भवन्ति। वा० पा० ७।१।३९। एकवचनस्य बहुवचनम्। योषाम्। सेवनीयां स्त्रियम् (सम्) सम्यक् (अर्षसे) ऋषी गतौ, भौवादिकः। प्राप्नोषि (सोमः) सोमः सूर्यःप्रसवनात्, सोम आत्माऽप्येतस्मादेव-निरु० १४।१२। प्रेरको जीवात्मा (कलशे) घटरूपेहृदये (शतयामना) अल्लोपोऽनः। पा० ६।४।१३४। इति प्राप्तस्यअकारलोपस्याभावश्छान्दसः। शतयाम्ना। बहुगतियुक्तेन (पथा) मार्गेण ॥

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