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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 4/ मन्त्र 64
    ऋषिः - यम, मन्त्रोक्त देवता - त्रिष्टुप् छन्दः - अथर्वा सूक्तम् - पितृमेध सूक्त
    61

    यद्वो॑अ॒ग्निरज॑हा॒देक॒मङ्गं॑ पितृलो॒कं ग॒मयं॑ जा॒तवे॑दाः। तद्व॑ ए॒तत्पुन॒राप्या॑ययामि सा॒ङ्गाः स्व॒र्गे पि॒तरो॑ मादयध्वम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यत् । व॒: । अ॒ग्नि: । अज॑हात् । एक॑म् । अङ्ग॑म् । पि॒तृऽलो॒कम् । ग॒मय॑न् । जा॒तऽवे॑दा: । तत् । व॒: । ए॒तत् । पुन॑: । आ । प्या॒य॒या॒मि॒ । स॒ऽअ॒ङ्गा । स्व॒:ऽगे । पि॒तर॑: । मा॒द॒य॒ध्व॒म् ॥४.६४॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यद्वोअग्निरजहादेकमङ्गं पितृलोकं गमयं जातवेदाः। तद्व एतत्पुनराप्याययामि साङ्गाः स्वर्गे पितरो मादयध्वम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यत् । व: । अग्नि: । अजहात् । एकम् । अङ्गम् । पितृऽलोकम् । गमयन् । जातऽवेदा: । तत् । व: । एतत् । पुन: । आ । प्याययामि । सऽअङ्गा । स्व:ऽगे । पितर: । मादयध्वम् ॥४.६४॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 18; सूक्त » 4; मन्त्र » 64
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    पितरों के सत्कार का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे पितरो !] (वः)तुम्हारे (यत्) जिस (एकम्) एक (अङ्गम्) अङ्ग को (पितृलोकम्) पितृ समाज में [मनुष्यों को] (गमयन्) ले चलते हुए, (जातवेदाः) धनों के उत्पन्न करनेवाले (अग्निः) अग्नि [शारीरिक पराक्रम] ने (अजहात्) त्याग दिया है। (वः) तुम्हारे (तत्) उस [अङ्ग] को (एतत्) अव (पुनः) निश्चय करके (आ) सब प्रकार (प्याययामि) मैंपूरा करता हूँ, (साङ्गाः) पूरे अङ्गवाले (पितरः) पालक ज्ञानी होकर तुम (स्वर्गे)सुख पहुँचानेवाले पद पर (मादयध्वम्) आनन्द पाओ ॥६४॥

    भावार्थ

    यदि विद्वान् पिता आदिबड़ों के अङ्ग में थकान आदि से कुछ हानि होवे, गृहस्थ सुसन्तान आदि उसका प्रतिकारकरके उन्हें प्रसन्न करें ॥६४॥

    टिप्पणी

    ६४−(यत्) (वः) युष्माकम् (अग्निः) शारीरिकपराक्रमः (अजहात्) ओहाक् त्यागे। त्यक्तवान् (अङ्गम्) अवयवम् (पितृलोकम्) विदुषां समाजम् (गमयन्) प्रापयन् (जातवेदाः) जातान्युत्पन्नानि वेदांसि धनानि यस्मात्सः (तत्)अङ्गम् (वः) युष्माकम् (एतत्) इदानीम् (पुनः) निश्चयेन (आ) समन्तात् (प्याययामि)वर्धयामि। पूरयामि (साङ्गाः) सम्पूर्णावयवाः (स्वर्गे) ...... ॥

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    विषय

    पितरों को स्वस्थ बनाना

    पदार्थ

    १. वानप्रस्थाश्रम ही पितृलोक है। (पितृलोकं गमयन्) = पितृलोक में प्राप्त कराता हुआ यह (जातवेदाः अग्नि:) = अंग-प्रत्यंग में विद्यमान अग्नितत्त्व (यत्) = यदि हे पितरो! (व:) = तुम्हारे (एकम् अंगम् अजहात्) = एक अंग को छोड़ गया है तो (व:) = तुम्हारे (तत् एतत्) = उस इस अंग को पुन: (अप्याययामि) = फिर से आप्यायित करता हूँ। आपको शक्तिशाली बनाता है। यदि अकस्मात् पितरों का कोई एक अंग अग्नितत्त्व की कमी के कारण शिथिल हो गया है तो उसे उचित औषधोपचार द्वारा सशक्त करना आवश्यक है। २. अंगों के सशक्त बनने पर हे (पितरः) = पितरो! (साडा:) = सब अंगों से स्वस्थ होते हुए आप (स्वर्गे) = नित्य स्वाध्याय द्वारा प्रकाशमय लोक में (मादयध्वम्) = आनन्दित होओ।

    भावार्थ

    यदि पितरों का कोई अंग निर्बल हो जाए तो उसे उचित औषधोपचार द्वारा स्वस्थ करके उन्हें वानप्रस्थ में आनन्दमय जीवनवाला बनाया जाए।

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    भाषार्थ

    हे पितरो! (जातवेदाः अग्निः) जातवेदा अग्नि ने (पितृलोकं गमयन्) पितृलोक की ओर गमन कराते हुए (वः) तुम्हारे (यद्) जिस (एकम् अङ्गम्) एकाध-कर्माङ्ग को (अजहात्) पूर्ण नहीं किया था, (वः) आपके (तत्) उस कर्माङ्ग को (एतत्) यह सब मैं [आपका पुत्र] (पुनः) फिर (आ प्याययामि) पूर्ण करता हूँ। ताकि (पितरः) हे पितरो! (साङ्गाः) अपने कर्त्तव्यों में सम्पूर्णाङ्ग होकर आप (स्वर्गे) विशेष सुखभोग और उसकी सामग्री से सम्पन्न लोक में (मादयध्वम्) प्रसन्न तथा तृप्त रहें।

    टिप्पणी

    [वानप्रस्थाश्रम ग्रहण करने पर अग्निहोत्र की सामग्री सहित लेकर अरण्यवास अर्थात् वनवास करना होता है। यथा— “अग्निहोत्रं समादाय गृह्यं चाग्निपरिच्छदम्। ग्रामादरण्यं निःसृत्य निवसेन्नियतेन्द्रियः” (मनु० ६.४)। परन्तु संन्यासाश्रमग्रहण करने पर अग्निहोत्र और उसकी सामग्री को साथ नहीं ले जाना होता। इस निमित्त प्रजापति परमात्मा की प्राप्ति के लिए प्राजापत्येष्टि, जिसमें कि यज्ञोपवीत और शिखा का भी त्याग किया जाता है, कर आहवनीय गार्हपत्य और दाक्षिणात्यसंज्ञक अग्नियों को आत्मा में समारोपित कर ब्राह्मण विद्वान् संन्यास लेता है। यथा—“प्राजापत्यां निरूप्येष्टिं सर्ववेदसदक्षिणाम्। आत्मन्यग्नीन् समारोप्य ब्राह्मणः प्रव्रजेद् गृहात्” (मनु० ६.३८), तथा संस्कारविधि का संन्यासप्रकरण (दयानन्द)। जातवेदाः अग्निः=आहवनीय गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि—ये तीनों अग्नियाँ जातवेदाः हैं। संन्यास के लिए आश्रमानुक्रम का नियम नहीं। किसी भी आश्रम से संन्यास ग्रहण किया जा सकता है। और जिस दिन भी सच्चा वैराग्य हो जाए, संन्यास ग्रहण किया जा सकता है। ऐसी परिस्थिति में संन्यासेच्छुक के कई धार्मिक और सांसारिक कर्त्तव्य अपूर्ण रह सकते हैं। उन सब कर्त्तव्य-शेषाङ्गों की पूर्ति करने का आश्वासन पिता को पुत्र देता है। मनु के श्लोक में ब्राह्मण का अभिप्राय है वह व्यक्ति, जो कि ब्रह्मसाक्षात्कार का अभिलाषी है। पितृलोकम्=माता-पिता आदि बुजुर्गों का लोक, अर्थात् निवास-स्थान या आश्रम। स्वर्गे लोकम्=दर्शनीय अत्यन्त सुख को (संस्कारविधि, संन्यासप्रकरण, अथर्व० कां॰ ९। अनु० ३। सू० ६ (२) की व्याख्या में। लोकम्=लोकृ दर्शने; दर्शनीय।]

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    विषय

    देवयान और पितृयाण।

    भावार्थ

    हे पूज्य पितृपुरुष ! (यद्) यदि (जातवेदाः अग्निः) सर्वज्ञ ज्ञानवान् प्रभु राजा (वः) आपलोगों को (पितृलोकम्) पिता माता के पद तक (गमयन्) पहुंचाता हुआ (एकम् अङ्गम्) तुम्हारे एक अंग, स्त्री आदि सम्बन्धी को (अजहात्) त्याग करा दे, पीछे छोड़ दे (तद्) तो (वः) तुम्हारे (एतत्) उस अंगको मैं (पुनः आप्याययामि) पुनः पूर्ण करूं, जिससे आप लोग, हे (पितरः) पितृपद पर विराजमान पुरुषो ! आपलोग (सांगाः) सम्पूर्ण अंगो सहित (स्वर्गे) सुखमय लोक में (मादयध्वम्) हर्ष आनन्द का लाभ करें।

    टिप्पणी

    ‘यद् वः क्रव्यादङ्ग दहल्लोका नयं प्रणयन् जातवेदः। तद्वोह पुनरावेशयाम्यरिष्टः सर्वैरङ्गः संभवत पितरः’ इति हि० गृ० सू०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। यमः, मन्त्रोक्ताः बहवश्च देवताः (८१ पितरो देवताः ८८ अग्निः, ८९ चन्द्रमाः) १, ४, ७, १४, ३६, ६०, भुरिजः, २, ५,११,२९,५०, ५१,५८ जगत्यः। ३ पश्चपदा भुरिगतिजगती, ६, ९, १३, पञ्चपदा शक्वरी (९ भुरिक्, १३ त्र्यवसाना), ८ पश्चपदा बृहती (२६ विराट्) २७ याजुषी गायत्री [ २५ ], ३१, ३२, ३८, ४१, ४२, ५५-५७,५९,६१ अनुष्टुप् (५६ ककुम्मती)। ३६,६२, ६३ आस्तारपंक्तिः (३९ पुरोविराड्, ६२ भुरिक्, ६३ स्वराड्), ६७ द्विपदा आर्ची अनुष्टुप्, ६८, ७१ आसुरी अनुष्टुप, ७२, ७४,७९ आसुरीपंक्तिः, ७५ आसुरीगायत्री, ७६ आसुरीउष्णिक्, ७७ दैवी जगती, ७८ आसुरीत्रिष्टुप्, ८० आसुरी जगती, ८१ प्राजापत्यानुष्टुप्, ८२ साम्नी बृहती, ८३, ८४ साम्नीत्रिष्टुभौ, ८५ आसुरी बृहती, (६७-६८,७१, (८६ एकावसाना), ८६, ८७, चतुष्पदा उष्णिक्, (८६ ककुम्मती, ८७ शंकुमती), ८८ त्र्यवसाना पथ्यापंक्तिः, ८९ पञ्चपदा पथ्यापंक्तिः, शेषा स्त्रिष्टुभः। एकोननवत्यृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Victory, Freedom and Security

    Meaning

    O pitaras, if Jataveda Agni, leading light of life and duty, while leading you to the stage of retirement, i.e., Vanaprastha or Sanyasa, left over some part of your obligations towards the seniors and sages, unaccomplished, I would complete and fulfil those for you so that you be happy at peace at your full and best in that state of life leading you to heavenly joy.

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    Translation

    What one limb of you Agni Jatavedas left when making you go to the Father's world, that same for you I fill up again; revel ye, O Fathers, in heaven with (all) your limbs.

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    Translation

    O living forefathers, if Agni, the heat present in all objects making you attain the state of elders and fore-fathers has left any limb of yours, I make it fit again and you with all your limbs enjoy the pleasure in the state of happiness. [N.B. : Here in the 64th verse it has been described that if heat leaves any limb of old father and mother (causing paralysis) the physician should make that limb fit by treatment.]

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    Translation

    O elders, the well-enlightened king forces you to leave behind a partner of yours, while you are going to the abode of the elders (the forest for Banprasthies) I restore the same to you, so that you live in happiness there. (4496)3

    Footnote

    "It is meaningless to think that a part of the body of the dead is left behind and is later on supplied to them by the surviving offspring by Pind-dan. The verse conveys that the son enables the mother, too, to join the father in the Ban-Prasth-Ashram, if she was prevented by some order of the king before.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ६४−(यत्) (वः) युष्माकम् (अग्निः) शारीरिकपराक्रमः (अजहात्) ओहाक् त्यागे। त्यक्तवान् (अङ्गम्) अवयवम् (पितृलोकम्) विदुषां समाजम् (गमयन्) प्रापयन् (जातवेदाः) जातान्युत्पन्नानि वेदांसि धनानि यस्मात्सः (तत्)अङ्गम् (वः) युष्माकम् (एतत्) इदानीम् (पुनः) निश्चयेन (आ) समन्तात् (प्याययामि)वर्धयामि। पूरयामि (साङ्गाः) सम्पूर्णावयवाः (स्वर्गे) ...... ॥

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