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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 4/ मन्त्र 55
    ऋषिः - यम, मन्त्रोक्त देवता - अनुष्टुप् छन्दः - अथर्वा सूक्तम् - पितृमेध सूक्त
    42

    यथा॑ य॒माय॑ह॒र्म्यमव॑प॒न्पञ्च॑ मान॒वाः। ए॒वा व॑पामि ह॒र्म्यं यथा॑ मे॒ भूर॒योऽस॑त॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यथा॑ । य॒माय॑ । ह॒र्म्यम् । अव॑पन् । पञ्च॑ । मा॒न॒वा: । ए॒व । व॒पा॒मि॒ । ह॒र्म्यम्‌ । यथा॑ । मे॒ । भूर॑य: । अस॑त ॥४.५५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यथा यमायहर्म्यमवपन्पञ्च मानवाः। एवा वपामि हर्म्यं यथा मे भूरयोऽसत॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यथा । यमाय । हर्म्यम् । अवपन् । पञ्च । मानवा: । एव । वपामि । हर्म्यम्‌ । यथा । मे । भूरय: । असत ॥४.५५॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 18; सूक्त » 4; मन्त्र » 55
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    मनुष्य को वृद्धि करने का उपदेश।

    पदार्थ

    (यथा) जैसे (यमाय)न्यायकारी राजा के लिये (पञ्च) पाँच [पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश, इन पाँचतत्त्वों] से सम्बन्धवाले (मानवाः) मनुष्यों ने (हर्म्यम्) स्वीकार करने योग्यराजमहल (अवपन्) फैलाकर बनाया है। (एव) वैसे ही मैं (हर्म्यम्) सुन्दर राजमहल (वपामि) फैलाकर बनाता हूँ, (यथा) जिस से (मे) मेरे लिये (भूरयः) बहुत से (असत)तुम होओ ॥५५॥

    भावार्थ

    मनुष्यों को बड़ेपुरुषों के समान अच्छे-अच्छे शिल्पियों द्वारा दृढ़ सुखप्रद गढ़, विद्यालय, न्यायालय, आदि घर बनवाकर सबकी यथायोग्य रक्षा करनी चाहिये ॥५५॥

    टिप्पणी

    ५५−(यथा) सादृश्ये (यमाय) न्यायकारिणे शासकाय (हर्म्यम्) अघ्न्यादयश्च। उ० ४।११२। हृञ्स्वीकारे-यक्, मुडागमः। हर्म्यं गृहनाम-निघ० ३।४। स्वीकरणीयं महिलायोग्यं गृहम्।धनिनां गृहम् (अवपन्) डुवप बीजसन्ताने। बीजवद् विस्तार्य निर्मितवन्तः (पञ्चमानवाः) अ० १२।१।१५। पृथिव्यादिपञ्चभूतसंबन्धिनो मनुष्याः (एव) एवम् (वपामि) संपादयामि। निर्मिमे (हर्म्यम्) राजगृहम् (यथा) येन प्रकारेण (मे)मह्यम् (भूरयः) बहवः (असत) अस्तेर्लेटि, अडागमः। यूयं स्यात् ॥

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    विषय

    प्रभुस्मरण व विश्वबन्धुत्व की भावना

    पदार्थ

    १. (यथा) = जिस प्रकार (पञ्च मानवाः) = पञ्च यज्ञयुक्त मनुष्य-'ब्रह्मयज्ञ-देवयज्ञ-पितयज्ञ अतिथियज्ञ व बलिवैश्वदेवयज्ञ-पाँचों यज्ञों को करनेवाले व्यक्ति (हर्म्यम्) = इस शरीररूप गृह को यमाय उस सर्वनियन्ता प्रभु के लिए (अवपन्) = उत्पन्न करते हैं [beget], इसे प्रभु के लिए एक पवित्र निवासस्थान के रूप में बनाते हैं। (एवा) = इसी प्रकार में भी (हर्म्यम्) = इस शरीररूप गृह को (वपामि) = उस प्रभु के लिए बनाता हूँ-'मेरे शरीर में प्रभु का निवास हो' इसके लिए यत्नशील होता हूँ। २. इस शरीर को प्रभु का निवासस्थान मैं इसलिए बनाता हैं, (यथा) = जिससे (मे) = मेरे लिए (भूरयः असत) = बहुत हों, अर्थात् मेरा परिवार विशाल बने। मैं पृथिवीभर को अपना कुटुम्ब जानें। प्रभु का उपासक सभी को प्रभु का सन्तान जानकर सभी में बन्धुत्व की भावनावाला होता है।

    भावार्थ

    मैं पाँचों यज्ञों को करता हुआ अपनी इस देह को प्रभु का निवासस्थान बनाऊँ। यह प्रभु का निवास मुझे विश्वबन्धुत्व की भावनावाला बनाएगा।

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    भाषार्थ

    (यथा) जैसे (पञ्च मानवाः) पांच प्रकार के मनुष्य मिलकर (यमाय) यम-नियमों के परिपालक आचार्य के लिये (हर्म्यम्) निवासगृह का (अवपन्) निर्माण करते हैं। (एवा) वैसे इन सब के सहयोग द्वारा (मे) मैं अपने (हर्म्यम्) निवासगृह का (वपामि) निर्माण करता हूं, (यथा) ताकि मेरी (भूरयः) प्रभूत सन्तानें (असत) हों।

    टिप्पणी

    [पञ्च= ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा निषाद। इनमें से कोई तो शुभाशीर्वाद द्वारा, कोई सुरक्षा प्रदान द्वारा, कोई धन की सहायता द्वारा, तथा कोई श्रमदान द्वारा गृह-निर्माण में सहायक होते हैं। अभिप्राय यह है कि ग्रामों और नगरों के बाहर सुरम्य स्थानों में ग्राम तथा नगर के वासियों को निवासगृह बनवाने चाहियें, जिन में कि वानप्रस्थी आचार्य= ग्रामों और नगरों के विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान कर सकें। ये निवासगृह ग्राम तथा नगरवासियों के सहोद्योगों द्वारा निर्मित होने चाहियें। वैयक्तिक निवासगृहों के निर्माण के लिये भी सहोद्योग होना चाहिये, ताकि प्रत्येक परिवार को निवासगृह मिल सके।]

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    विषय

    देवयान और पितृयाण।

    भावार्थ

    (यथा) जिस प्रकार (पञ्च मानवाः) पांच प्रकार के मनुष्य (यमाय) सर्व नियन्ता राजा के लिये (हर्म्यम्) हर्म्य, राजमहल (अव पन्) खड़ी कर देते हैं (एवा) उसी प्रकार मैं (हर्म्यम्) बड़ा महल अपने लिये भी (वपामि) खड़ा करूं (यथा) जिससे (मे) मेरे अधीन (भूरयः) बहुत से मिलने जुलने वाले मित्र, भृत्य आदि (असत) रहें। सायण के अनुसार इस मन्त्र में समाधि या कबरें बनाने परक अर्थ निकलता है।

    टिप्पणी

    (प्र० तृ०) ‘हार्म्यं’ (तृ०) ‘एवं’ (च०) ‘यथासां जीवलोके भूरयोसत’ इति तै० आ०। (च०) ‘असतः’ इति क्वचित्।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। यमः, मन्त्रोक्ताः बहवश्च देवताः (८१ पितरो देवताः ८८ अग्निः, ८९ चन्द्रमाः) १, ४, ७, १४, ३६, ६०, भुरिजः, २, ५,११,२९,५०, ५१,५८ जगत्यः। ३ पश्चपदा भुरिगतिजगती, ६, ९, १३, पञ्चपदा शक्वरी (९ भुरिक्, १३ त्र्यवसाना), ८ पश्चपदा बृहती (२६ विराट्) २७ याजुषी गायत्री [ २५ ], ३१, ३२, ३८, ४१, ४२, ५५-५७,५९,६१ अनुष्टुप् (५६ ककुम्मती)। ३६,६२, ६३ आस्तारपंक्तिः (३९ पुरोविराड्, ६२ भुरिक्, ६३ स्वराड्), ६७ द्विपदा आर्ची अनुष्टुप्, ६८, ७१ आसुरी अनुष्टुप, ७२, ७४,७९ आसुरीपंक्तिः, ७५ आसुरीगायत्री, ७६ आसुरीउष्णिक्, ७७ दैवी जगती, ७८ आसुरीत्रिष्टुप्, ८० आसुरी जगती, ८१ प्राजापत्यानुष्टुप्, ८२ साम्नी बृहती, ८३, ८४ साम्नीत्रिष्टुभौ, ८५ आसुरी बृहती, (६७-६८,७१, (८६ एकावसाना), ८६, ८७, चतुष्पदा उष्णिक्, (८६ ककुम्मती, ८७ शंकुमती), ८८ त्र्यवसाना पथ्यापंक्तिः, ८९ पञ्चपदा पथ्यापंक्तिः, शेषा स्त्रिष्टुभः। एकोननवत्यृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Victory, Freedom and Security

    Meaning

    As all five classes of people over the world join, form and found the house of Yama, lord of time, life and age, so do I found the house for the family so that there may be plenty and prosperity for us.

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    Translation

    As the five clans scattered a dwelling for Yama, so do I scatter a dwelling, that there may be many of me.

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    Translation

    As the five classes of men (the four Varnas and one avarna) build the house for Yama, the fire of Yajna so I build house that greater number of children be mine.

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    Translation

    Just as five kinds of people erect a palace for the controller of the people (i.e., king), similarly do I build a mansion for myself so that many members of my family may live therein.

    Footnote

    Five: Brahman, Kshatriya, Vaishya, Shudra and Nishad. I: a householder. The verse gives equal right to an ordinary person to have as stately a house as a king may possess. There is no invidious distinction between the high and the low in the eyes of God.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ५५−(यथा) सादृश्ये (यमाय) न्यायकारिणे शासकाय (हर्म्यम्) अघ्न्यादयश्च। उ० ४।११२। हृञ्स्वीकारे-यक्, मुडागमः। हर्म्यं गृहनाम-निघ० ३।४। स्वीकरणीयं महिलायोग्यं गृहम्।धनिनां गृहम् (अवपन्) डुवप बीजसन्ताने। बीजवद् विस्तार्य निर्मितवन्तः (पञ्चमानवाः) अ० १२।१।१५। पृथिव्यादिपञ्चभूतसंबन्धिनो मनुष्याः (एव) एवम् (वपामि) संपादयामि। निर्मिमे (हर्म्यम्) राजगृहम् (यथा) येन प्रकारेण (मे)मह्यम् (भूरयः) बहवः (असत) अस्तेर्लेटि, अडागमः। यूयं स्यात् ॥

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