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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 4/ मन्त्र 35
    ऋषिः - यम, मन्त्रोक्त देवता - त्रिष्टुप् छन्दः - अथर्वा सूक्तम् - पितृमेध सूक्त
    76

    वै॑श्वान॒रेह॒विरि॒दं जु॑होमि साह॒स्रं श॒तधा॑र॒मुत्स॑म्। स बि॑भर्ति पि॒तरं॑पिताम॒हान्प्र॑पिताम॒हान्बि॑भर्ति॒ पिन्व॑मानः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    वै॒श्वा॒न॒रे । ह॒वि: । इ॒दम् । जु॒हो॒मि॒ । सा॒ह॒स्रम् । श॒तऽधा॑रम् । उत्स॑म् । स: । बि॒भ॒र्ति॒ । पि॒तर॑म् । पि॒ता॒म॒हान् । प्र॒ऽपि॒ता॒म॒हान् । बि॒भ॒र्ति॒ । पिन्व॑मान: ॥४.३५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    वैश्वानरेहविरिदं जुहोमि साहस्रं शतधारमुत्सम्। स बिभर्ति पितरंपितामहान्प्रपितामहान्बिभर्ति पिन्वमानः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    वैश्वानरे । हवि: । इदम् । जुहोमि । साहस्रम् । शतऽधारम् । उत्सम् । स: । बिभर्ति । पितरम् । पितामहान् । प्रऽपितामहान् । बिभर्ति । पिन्वमान: ॥४.३५॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 18; सूक्त » 4; मन्त्र » 35
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    गोरक्षा का उपदेश।

    पदार्थ

    (वैश्वानरे) सब नरोंके हितकारी पुरुष के निमित्त (इदम्) इस (हविः) ग्रहण करने योग्य वस्तु, (साहस्रम्) सहस्रों उपकारवाले, (शतधारम्) सैकड़ों दूध के धाराओंवाले (उत्सम्)स्रोते [अर्थात् गौ रूप पदार्थ] को (जुहोमि) मैं देता हूँ। (सः) वह (पिन्वमानः)सेवा किया हुआ [गौ रूप पदार्थ] (पितरम्) पिता [पिता आदि बड़ों] को (पितामहान्)दादे आदि मान्य जनों को (बिभर्ति) पुष्ट करता है, और (प्रपितामहान्) परदादे आदिमहामान्य पुरुषों को (बिभर्ति) पुष्ट करता है ॥३५॥

    भावार्थ

    हे मनुष्यो ! गौ कोप्राप्त करके उसकी पूरी सेवा करो, उसके पालने से खेती आदि के लिये उत्तम बैल तथादूध घी आदि उत्तम पदार्थ मिलने से तुम्हारे कुटुम्बी और सब बड़े-बूढ़े बलवान् औरपुष्ट रहेंगे ॥३५॥

    टिप्पणी

    ३५−(वैश्वानरे) निमित्ते सप्तमी। सर्वनरहितपुरुषस्य निमित्ते (हविः) ग्राह्यं वस्तु गोरूपम् (जुहोमि) ददामि (साहस्रम्) बहूपकारक्षमम् (शतधारम्) बहुदुग्धधारायुक्तम् (उत्सम्) उन्दी क्लेदने-स प्रत्ययः। स्रवज्जलस्यपातसदृशं गोरूपदार्थम् (सः) गोरूपपदार्थः (बिभर्ति) पुष्णाति (पितरम्)बहुवचनस्यैकवचनम्। पितॄन्। पित्रादिमाननीयान् (पितामहान्) पितामहादीन्सत्करणीयान् (प्रपितामहान्) प्रपितादीन् महामान्यान् (बिभर्ति) (पिन्वमानः) पिविसेचने, सेवने च−चानश्। सेव्यमानः ॥

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    विषय

    यज्ञ'शतधार साहस्त्र उत्स'

    पदार्थ

    १. मैं (वैश्वानरे) = घृत व हवि को सूक्ष्म कणों में विभक्त करके सर्वत्र फैलाने के द्वारा सबका हित करनेवाले इस अग्नि में (इदम्) = इस (हविः) = घृत व हविर्द्रव्य को (जुहोमि) = आहुत करता हूँ। यह हवि (साहस्त्रम्) = हज़ारों का हित करनेवाला (शतधारम्) = शतवर्षपर्यन्त हमारा धारण करनेवाला एक (उत्सम) = स्रोत [चश्मा] ही है। यज्ञ एक धारणात्मक तत्वों के प्रवाहवाला स्रोत है। २. (स:) = वह अग्नि (पिन्वमान:) = हविर्द्रव्यों से प्रीणित किया जाता हुआ हमारे (पितरम्) = पिताओं को भी (बिभर्ति) = धारण करता है, (पितामहान्) = पितामहों का तथा (प्रपितामहान्) = प्रपिताओं का भी बिभर्ति पोषण करता है। यह हमारे बड़ों के भी स्वास्थ्य का साधन बनता है।

    भावार्थ

    मैं यज्ञाग्नि में घृत आदि हविर्द्रव्यों की आहुति देता हूँ। यज्ञाग्नि में डाली गई यह हवि हज़ारों प्रकार से शतवर्षपर्यन्त हमारा धारण करनेवाली है। ये हमारे 'पिता, पितामह व प्रपितामह' आदि को भी धारण करनेवाली होती है।

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    भाषार्थ

    (साहस्रम्) हजारों का पालन-पोषण करने वाले, (शतधारम्) सैकड़ों दुग्धधाराओं वाले, (उत्सम्) दुग्ध के कूपरूप (इदम्) इस गोधन को, (वैश्वानरे) सब नरनारियों के हितैषी परमेश्वर के प्रसादन के निमित्त, मैं (हविः) हविरूप में (जुहोमि) समर्पित करता हूँ। क्योंकि (सः) वही वैश्वानर (पिन्वमानः) प्रसन्न होकर (पितरं पितामहान्) मेरे पिता और पितामहों का (बिभर्ति) भरण-पोषण करता है, और (प्रपितामहान्) प्रपितामहों का (बिभर्ति) भरण-पोषण करता है।

    टिप्पणी

    [साहस्रम्= एक एक गौ हजारों का पालन-पोषण किस प्रकार करती है, इसके लिए देखो—“गोकरुणानिधि” (दयानन्द)। जो परमेश्वर मेरे वनस्थ तथा संन्यस्त पिता आदि का, तथा विश्व का पालन-पोषण करता है, उसी के प्रसादन के निमित्त गोधन को समर्पित कर, तद् द्वारा सबका पालन दूध, घृत, दधि, लस्सी आदि से करना चाहिए। उत्सः=कूपः (निघं० ३.२३)। पिन्वमानः=पिवि सेचने। दुग्धाहुतियों द्वारा सिंचित होकर प्रसन्न हुआ परमेश्वर।]

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    विषय

    देवयान और पितृयाण।

    भावार्थ

    (वैश्वानरे) समस्त मनुष्यों के हितकारी देव के निमत्त मैं (इदं हविः) इस अन्न आदि त्याग करने योग्य पदार्थ की (जुहोमि) आहुति करता हूँ। यह (साहस्रं) सहस्रों फलों को देने वाला (शतधारम्) सैकड़ों धाराओं वाला (उत्सम्), स्रोत है। (सः) वह समस्त हितकारी, परम देव (पिश्वमानः) स्वयं प्रसन्न होकर (पितरं) पालक पिताको (पितामहान् प्रपितामहान्) पितामह और प्रपितामह आदि वृद्ध पूजनीय पुरुषों का (बिभर्ति) पालन पोषण करता है।

    टिप्पणी

    (द्वि०) ‘सहस्रमुत्सं शतधारमेतम् (तृ० च०) ‘तस्मिन्नेव पितरं पितामहं प्रपितामहं बिभरत् पिन्वमाने’ इति तै० आ०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। यमः, मन्त्रोक्ताः बहवश्च देवताः (८१ पितरो देवताः ८८ अग्निः, ८९ चन्द्रमाः) १, ४, ७, १४, ३६, ६०, भुरिजः, २, ५,११,२९,५०, ५१,५८ जगत्यः। ३ पश्चपदा भुरिगतिजगती, ६, ९, १३, पञ्चपदा शक्वरी (९ भुरिक्, १३ त्र्यवसाना), ८ पश्चपदा बृहती (२६ विराट्) २७ याजुषी गायत्री [ २५ ], ३१, ३२, ३८, ४१, ४२, ५५-५७,५९,६१ अनुष्टुप् (५६ ककुम्मती)। ३६,६२, ६३ आस्तारपंक्तिः (३९ पुरोविराड्, ६२ भुरिक्, ६३ स्वराड्), ६७ द्विपदा आर्ची अनुष्टुप्, ६८, ७१ आसुरी अनुष्टुप, ७२, ७४,७९ आसुरीपंक्तिः, ७५ आसुरीगायत्री, ७६ आसुरीउष्णिक्, ७७ दैवी जगती, ७८ आसुरीत्रिष्टुप्, ८० आसुरी जगती, ८१ प्राजापत्यानुष्टुप्, ८२ साम्नी बृहती, ८३, ८४ साम्नीत्रिष्टुभौ, ८५ आसुरी बृहती, (६७-६८,७१, (८६ एकावसाना), ८६, ८७, चतुष्पदा उष्णिक्, (८६ ककुम्मती, ८७ शंकुमती), ८८ त्र्यवसाना पथ्यापंक्तिः, ८९ पञ्चपदा पथ्यापंक्तिः, शेषा स्त्रिष्टुभः। एकोननवत्यृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Victory, Freedom and Security

    Meaning

    I raise and offer this havi, sacred milk and the wealth of cows and their milky treasure of a hundred and thousandfold streams of energy and nourishment in the service of Vaishvanara, divine heat and vitality of the life of world humanity. This Vaishvanara, waxing and rising strong by the inputs of milk, protects and sustains our parents and grand parents and it protects and sustains our great grand parents.

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    Translation

    In Vaisvanara I offer this oblation, a thousand fold, hundred streamed fountain; it supports (our) father, grandfathers; (our) great-grandfathers it supports, swelling.

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    Translation

    I, the performer of Yajna offer in the fire this oblation which is like the spring having hundred and thousand streams. This fire possessed of oblatory pours protects our living father, grand fathers and also protects our grand-father's fathers.

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    Translation

    I (man) offer this oblation to the Benefactor of all, the fountain-head of hundreds and thousands of streams of material objects and spiritual benefits. He (God), being thus pleased, nourishes the fathers, grandfathers and great-grandfathers.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३५−(वैश्वानरे) निमित्ते सप्तमी। सर्वनरहितपुरुषस्य निमित्ते (हविः) ग्राह्यं वस्तु गोरूपम् (जुहोमि) ददामि (साहस्रम्) बहूपकारक्षमम् (शतधारम्) बहुदुग्धधारायुक्तम् (उत्सम्) उन्दी क्लेदने-स प्रत्ययः। स्रवज्जलस्यपातसदृशं गोरूपदार्थम् (सः) गोरूपपदार्थः (बिभर्ति) पुष्णाति (पितरम्)बहुवचनस्यैकवचनम्। पितॄन्। पित्रादिमाननीयान् (पितामहान्) पितामहादीन्सत्करणीयान् (प्रपितामहान्) प्रपितादीन् महामान्यान् (बिभर्ति) (पिन्वमानः) पिविसेचने, सेवने च−चानश्। सेव्यमानः ॥

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