अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 4/ मन्त्र 80
ऋषिः - यम, मन्त्रोक्त
देवता - आसुरी जगती
छन्दः - अथर्वा
सूक्तम् - पितृमेध सूक्त
41
स्व॒धापि॒तृभ्यो॑ दिवि॒षद्भ्यः॑ ॥
स्वर सहित पद पाठस्व॒धा । पि॒तृऽभ्य॑:। दि॒वि॒सत्ऽभ्य॑: ॥४.८०॥
स्वर रहित मन्त्र
स्वधापितृभ्यो दिविषद्भ्यः ॥
स्वर रहित पद पाठस्वधा । पितृऽभ्य:। दिविसत्ऽभ्य: ॥४.८०॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
पितरों के सन्मान का उपदेश।
पदार्थ
(दिविषद्भ्यः) प्रकाशविद्या में गतिवाले (पितृभ्यः) पितरों [पालक ज्ञानियों] को (स्वधा) अन्न हो॥८०॥
भावार्थ
जो पितर पण्डित लोगपृथिवी अर्थात् राज्यविद्या, भूगर्भविद्या आदि में चतुर हों, जो ज्योतिषी आकाशविद्याअर्थात् सौरमण्डल, तारामण्डल, वायुमण्डल आदि विद्या में दक्ष हों और जोमहापुरुष अन्य व्यवहारों अर्थात् संग्रामविद्या, धर्मशिक्षा आदि विद्या मेंगुणी होवें, सब मनुष्य ऐसे महात्माओं का सदा आदर करते रहें॥७८-८०॥७८-८० इन मन्त्रों का मिलान करो यजु० ९।२ ॥
टिप्पणी
८०−(दिविषद्भ्यः) सप्तम्या अलुक्। प्रकाशविद्यायां गतिशीलेभ्यः। अन्यत्पूर्ववत् ॥
विषय
'पृथिवी, अन्तरिक्ष व धुलोक' स्थ पितर
पदार्थ
१. (पृथिविषद्भ्य:) = पृथिवीस्थ अग्नि आदि देवों की विद्या में निपुण (पितृभ्यः) = इन ज्ञानप्रद पितरों के लिए (स्वधा) = हम आत्मधारण के लिए पर्यास अन्न प्राप्त कराएँ। २. इसी प्रकार (अन्तरिक्षसभ्यः) = अन्तरिक्षस्थ वायु आदि देवों की विद्या में निपुण (पितृभ्यः) = ज्ञानप्रद पितरों के लिए (स्वधा:) = अन्न प्राप्त कराया जाए और (दिविषद्भ्यः) = लोकस्थ सूर्यादि देवों के ज्ञाता (पितृभ्य:) = पितरों के लिए (स्वधा) = अन्न हो।
भावार्थ
हम 'पृथिवी, अन्तरिक्ष व धुलोकस्थ''अग्नि, वायु व सूर्य' आदि देवों की विद्या में निपुण ज्ञानप्रदाता पितरों के लिए उचित अन्न प्राप्त कराते हुए उनका आदर करें।
भाषार्थ
(दिविषद्भ्यः) दिव् अर्थात् सिर में स्थित सहस्रारचक्र में ध्यानावस्थित (पितृभ्यः) पितरों के लिए (स्वधा) आत्म-धारण-पोषणकारी सात्त्विक अन्न होना चाहिये।
टिप्पणी
[दिवि=“दिवं यश्चक्रे मूर्धानम्” (अथर्व० १०.७.३२); तथा “शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत” (यजुः० ३१.१३)। अतः दिव्=मूर्धा, सिर। सहस्रारचक्र में ध्यानावस्थित हो जाने पर योगी मोक्षसिद्धि का लाभ करता है। सहस्रारचक्र में ध्यानावस्थित योगियों को “दिविषद्” पितर कहा है। तथा—४(७८-८०)=पृथिवीषदः=जो पितर कि पृथिवी पर विचरते हैं, जिन्हें अन्तरिक्ष-गमन की सिद्धि अभी प्राप्त नहीं हुई, परन्तु अभ्यासमार्ग में प्रवृत्त हैं। अन्तरिक्षसदः= योगाभ्यास के उत्कर्ष द्वारा जिन्हें अन्तरिक्षगमन अर्थात् आकाशगमन की सिद्धि प्राप्त हो चुकी है। इस विभूति का वर्णन योगदर्शन में किया है। यथा—“कायाकाशयोः सम्बन्धसंयमाल्लघुतूलसमापत्तेश्चाकाशगमनम्” (३.४२)। ऋग्वेद में भी आकाशगमन तथा वायु में जाकर स्थित हो जाने की सिद्धि का वर्णन हुआ है। यथा—“मुनयो वातरशनाः” (ऋ० १०.१३६.२); अर्थात् मुनि लोग “वायु की रस्सी” द्वारा अन्तरिक्ष में आरूढ़ हो जाते हैं। “वातस्यानु ध्राजिं यन्ति” (ऋ० १०.१३६.२)=मुनिलोग बहती वायु के अनुकूल अन्तरिक्ष में गति करते हैं। “उन्मदिता मौनेयेन वाताँ आ तस्थिमा वयम्” (ऋ० १०.१३६.३)=मुनिभाव द्वारा मस्त हुए हम वायुओं में आकर स्थित हो गये हैं। “अन्तरिक्षेण पतति विश्वा रूपावचाकशत्” (ऋ० १०.१३६.४)=मुनि अन्तरिक्ष द्वारा उड़ता है, और स्थान-स्थान के विविध रूपों को देखता है। “वातस्याश्वः” (ऋ० १०.१३६.५)=मुनि का अश्व है वायु। “उभौ समुद्रा वा क्षेति यश्च पूर्व उतापरः” (ऋ० १०.१३६.५); मुनि दोनों समुद्रों की सैर करता है, पूर्व समुद्र की और पश्चिम समुद्र की भी, या आकाशीय समुद्र की भी और पार्थिव समुद्र की भी। इस उपर्युक्त योग्यता वाले योगी अन्तरिक्षसद् पितर हैं। तथा अन्तरिक्ष से भी ऊपर महाकाशगामी योगी दिविषद् पितर हैं। जैसे कि वर्तमान में space craft द्वारा चन्द्रलोक आदि में गमन करते हैं, और वहाँ जा स्थित होते हैं। सद्=गतौ अवसादने च। तथा—पृथिवी में रह कर लोकोपकार करने वाले वानप्रस्थी, संन्यासी, आचार्यवर्ग, माता-पिता आदि पृथिवीषद् पितर हैं। वायुयानों द्वारा अन्तरिक्ष में गमन करने वाले वैमानिक (pilots) अन्तरिक्षसद् पितर हैं। तथा space-ships द्वारा चन्द्र आदि तक पहुँचने वाले दिविषद् पितर हैं। वेदों में उत्कृष्ट विमानों का यत्र तत्र वर्णन है। देखो—ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका (दयानन्द)।]
विषय
देवयान और पितृयाण।
भावार्थ
(पृथिविषद्भ्यः पितृभ्यः) पृथिवी पर विराजनेवाले पालक माता पिता आदि पूजनीय पुरुषों को (स्वधा) अन्न आदि पुष्टिकारक पदार्थ प्राप्त हो। (अन्तरिक्षसद्भ्यः स्वधा) अन्तरिक्ष में विराजने वाले पालक पुरुषों का अन्नादि पदार्थ प्राप्त हों। (दिविसद्भ्यः पितृभ्यः स्वधा) द्यौ, आकाश या तेजोमय मोक्ष मार्ग में विराजमान पूज्य गुरु जनों को ‘स्वधा’ अर्थात् आत्म पोषक बल आदि प्राप्त हो।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वा ऋषिः। यमः, मन्त्रोक्ताः बहवश्च देवताः (८१ पितरो देवताः ८८ अग्निः, ८९ चन्द्रमाः) १, ४, ७, १४, ३६, ६०, भुरिजः, २, ५,११,२९,५०, ५१,५८ जगत्यः। ३ पश्चपदा भुरिगतिजगती, ६, ९, १३, पञ्चपदा शक्वरी (९ भुरिक्, १३ त्र्यवसाना), ८ पश्चपदा बृहती (२६ विराट्) २७ याजुषी गायत्री [ २५ ], ३१, ३२, ३८, ४१, ४२, ५५-५७,५९,६१ अनुष्टुप् (५६ ककुम्मती)। ३६,६२, ६३ आस्तारपंक्तिः (३९ पुरोविराड्, ६२ भुरिक्, ६३ स्वराड्), ६७ द्विपदा आर्ची अनुष्टुप्, ६८, ७१ आसुरी अनुष्टुप, ७२, ७४,७९ आसुरीपंक्तिः, ७५ आसुरीगायत्री, ७६ आसुरीउष्णिक्, ७७ दैवी जगती, ७८ आसुरीत्रिष्टुप्, ८० आसुरी जगती, ८१ प्राजापत्यानुष्टुप्, ८२ साम्नी बृहती, ८३, ८४ साम्नीत्रिष्टुभौ, ८५ आसुरी बृहती, (६७-६८,७१, (८६ एकावसाना), ८६, ८७, चतुष्पदा उष्णिक्, (८६ ककुम्मती, ८७ शंकुमती), ८८ त्र्यवसाना पथ्यापंक्तिः, ८९ पञ्चपदा पथ्यापंक्तिः, शेषा स्त्रिष्टुभः। एकोननवत्यृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Victory, Freedom and Security
Meaning
Homage of food and reverence, to parents and parental veterans, sojourners of the light of heaven and the solar system.
Translation
Let food etc, be offered to those who occupy their places in happiness and enlightenment,
Translation
Vitalising food to the elders, who have settled higher up in the celestial regions.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
८०−(दिविषद्भ्यः) सप्तम्या अलुक्। प्रकाशविद्यायां गतिशीलेभ्यः। अन्यत्पूर्ववत् ॥
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