अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 4/ मन्त्र 88
ऋषिः - अग्नि
देवता - त्र्यवसाना पथ्यापङ्क्ति
छन्दः - अथर्वा
सूक्तम् - पितृमेध सूक्त
49
आ त्वा॑ग्नइधीमहि द्यु॒मन्तं॑ देवा॒जर॑म्। यद्घ॒ सा ते॒ पनी॑यसी स॒मिद्दी॒दय॑ति॒ द्यवि॑।इषं॑ स्तो॒तृभ्य॒ आ भ॑र ॥
स्वर सहित पद पाठआ । त्वा॒ । अ॒ग्ने॒ । इ॒धी॒म॒हि॒ । द्यु॒ऽमन्त॑म् । दे॒व॒ । अ॒जर॑म् । यत् । घ॒ । सा । ते॒ । पनी॑यसी । स॒म्ऽइत् । दी॒दय॑ति । द्यवि॑ । इष॑म् । स्तो॒तृऽभ्य॑: । आ । भ॒र॒ ॥ ४.८८॥
स्वर रहित मन्त्र
आ त्वाग्नइधीमहि द्युमन्तं देवाजरम्। यद्घ सा ते पनीयसी समिद्दीदयति द्यवि।इषं स्तोतृभ्य आ भर ॥
स्वर रहित पद पाठआ । त्वा । अग्ने । इधीमहि । द्युऽमन्तम् । देव । अजरम् । यत् । घ । सा । ते । पनीयसी । सम्ऽइत् । दीदयति । द्यवि । इषम् । स्तोतृऽभ्य: । आ । भर ॥ ४.८८॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
परमात्मा की उपासना का उपदेश।
पदार्थ
(देव) हे आनन्दप्रद ! (अग्ने) हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! (द्युमन्तम्) प्रकाशयुक्त (अजरम्) अजर [जरारहित, सदा बलवान्] (त्वा) तुझको (आ) सब ओर से [हृदय में] (इधीमहि) हमप्रकाशित करें। (यत्) जो (सा) वह (घ) निश्चय करके (ते) तेरी (पनीयसी) अतिप्रशंसनीय (समित्) चमक (द्यवि) चमकते हुए [सूर्य आदि में] (दीदयति) चमकती है। [उससे] (इषम्) इष्ट पदार्थ को (स्तोतृभ्यः) स्तुति करनेवालों के लिये (आ) सब ओरसे (भर) भर दे ॥८८॥
भावार्थ
जो अजर-अमर जगदीश्वरसूर्य अग्नि आदि प्रकाशक पदार्थों का प्रकाशक है, उस प्रकाशस्वरूप को हृदय मेंधारण करके अपने नेत्रों को दिव्य बनावें और प्रत्येक वस्तु में उसकी ज्योति देखकर प्रत्येक वस्तु से इष्ट मनोरथ सिद्ध करें ॥८८॥यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेदमें है−५।६।४ और सामवेद में पू० ५।४।१। तथा उ० ३।२।२१ ॥
टिप्पणी
८८−(आ) समन्तात् (त्वा)त्वाम् (अग्ने) हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन् (इधीमहि) इन्धेर्लिङि रूपम्। दीपयेम (द्युमन्तम्) दीप्तिमन्तम् (देव) हे सुखप्रद (अजरम्) जरारहितम्। बलवन्तम् (यत्)विभक्तेर्लुक्। या (घ) निश्चयेन (सा) प्रसिद्धा (ते) तव (पनीयसी) पनतिःस्तुतिकर्मा। स्तुत्यतरा (समित्) सम्यग् दीप्तिः (दीदयति) दीप्यते (द्यवि)द्योतमाने सूर्यादौ (इषम्) इष्टं पदार्थम् (स्तोतृभ्यः) स्तावकेभ्यः (आ)समन्तात् (भर) धर ॥
विषय
'द्युमान् अजर' देव की दीप्ति का दर्शन
पदार्थ
१. हे (अग्ने) = अग्रणी प्रभो! (त्वा आइधीमहि) = आपको हम अपने में सर्वथा दीत करते है आपके प्रकाश को हृदयों में देखने के लिए यत्नशील होते हैं। आप हे (देव) = प्रकाशमय प्रभो! (द्युमन्तम्) = ज्योतिर्मय हैं, (अजरम्) = अजीर्ण शक्तिवाले हैं-आप ज्योति व शक्ति के पुञ्ज हैं। २. (यत्) = जो (घा) = निश्चय से (सः) = वह (ते) = आपकी (समित्) = दीप्ति है, वह (पनीयसी) = अतिशयेन स्तुत्य है। (द्यवि दीदयति) = आपकी दीप्ति सम्पूर्ण धुलोक में दीप्त है-हमारे मस्तिष्करूप द्युलोकों को भी वह दीप्त करती है। हे प्रभो! (स्तोतृभ्यः) = हम स्तोताओं के लिए (इषं आभर) = प्रेरणा प्राप्त कराइए। आपसे प्रेरणा प्राप्त करते हुए हम उत्कृष्ट जीवनवाले हों।
भावार्थ
हम हृदयों में प्रभु को समिद्ध करें। प्रभु की प्रशस्त दीप्ति हमारे मस्तिष्क को उञ्चल करे। हम प्रभु से प्रेरणा प्राप्त करें। सच्चे स्तोता बनकर ही तो हम इसे प्राप्त करेंगे।
भाषार्थ
(अग्ने) हे प्रकाशस्वरूप (देव) देवाधिदेव! (द्युमन्तम्) द्युतिमान् तथा (अजरम्) कभी भी जीर्ण न होनेवाले (त्वा) आपको (आ इधीमहि) हम अपने हृदयों में प्रदीप्त करते हैं, (यत् ते) जो आपकी (पनीयसी) स्तुत्य और प्रशंसनीय (समिद्) प्रदीप्ति (द्यवि) द्युलोक [के सूर्य नक्षत्रों और तारागणों] में (दीदयति) अत्यन्त दीप्त हो रही है। आप (स्तोतृभ्यः) अपने स्तोताओं को (इषम्) बल व अन्न से (आ भर) भरपूर करो।
टिप्पणी
[इधीमहि= इध् दीप्तौ। पनीयसी=पन् स्तुतौ। समिद्= सम्+इध् (दीप्तौ)। अथवा सूर्यरूपी समिधा। द्यवि= आध्यात्मिक दृष्टि में मस्तिष्कस्थ सहस्रारचक्र। अथर्ववेद में सिर को तृतीय लोक कहा है। यथा— “शीर्षलोकं तृतीयकम्” (१९.३९.१०), अर्थात् सिर तीसरा लोक है। आधिदैविक दृष्टि से द्युलोक से द्युलोक भी तीसरा लोक है। वेदों में “दिवं यश्चक्रे मूर्धानम्” (अथर्व १०.७.३२); तथा “शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत” (यजुः० ३१.१३) द्वारा मूर्धा तथा सिर को क्रमशः दिव् तथा द्यौः कहा है।]
विषय
देवयान और पितृयाण।
भावार्थ
हे (अग्ने) अग्ने ! ज्ञानवन् ! हे (देव) देव ! द्योतमान ! प्रकाश स्वरूप ! (द्युमन्तम्) प्रकाशमान् (अजरम्) अविनाशी (त्वा) तेरी (इधीमहि) उपासना करें। (यत्) क्योंकि (ते) तेरी ही (सा) यह जगत् प्रसिद्ध (पनीयसी) अति प्रशंसनीय, स्तुति करने योग्य (समित्) अति देदीप्यमान सूर्यरूप शक्ति (द्यवि) द्यौलोक में (दीदयति) प्रकाशमान है। हे परमेश्वर ! तू (स्तोतृभ्यः) गुण गान करने वाले उपासकों को (इषम्) अन्न और भीतरी मानस प्रेरणा को (आ भर) प्राप्त करा।
टिप्पणी
‘आते अग्न’ (वृ०) ‘यद्ध स्याते’ इति ऋ०। ऋग्वेदे वसुश्रुत आत्रेय ऋषिः।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वा ऋषिः। यमः, मन्त्रोक्ताः बहवश्च देवताः (८१ पितरो देवताः ८८ अग्निः, ८९ चन्द्रमाः) १, ४, ७, १४, ३६, ६०, भुरिजः, २, ५,११,२९,५०, ५१,५८ जगत्यः। ३ पश्चपदा भुरिगतिजगती, ६, ९, १३, पञ्चपदा शक्वरी (९ भुरिक्, १३ त्र्यवसाना), ८ पश्चपदा बृहती (२६ विराट्) २७ याजुषी गायत्री [ २५ ], ३१, ३२, ३८, ४१, ४२, ५५-५७,५९,६१ अनुष्टुप् (५६ ककुम्मती)। ३६,६२, ६३ आस्तारपंक्तिः (३९ पुरोविराड्, ६२ भुरिक्, ६३ स्वराड्), ६७ द्विपदा आर्ची अनुष्टुप्, ६८, ७१ आसुरी अनुष्टुप, ७२, ७४,७९ आसुरीपंक्तिः, ७५ आसुरीगायत्री, ७६ आसुरीउष्णिक्, ७७ दैवी जगती, ७८ आसुरीत्रिष्टुप्, ८० आसुरी जगती, ८१ प्राजापत्यानुष्टुप्, ८२ साम्नी बृहती, ८३, ८४ साम्नीत्रिष्टुभौ, ८५ आसुरी बृहती, (६७-६८,७१, (८६ एकावसाना), ८६, ८७, चतुष्पदा उष्णिक्, (८६ ककुम्मती, ८७ शंकुमती), ८८ त्र्यवसाना पथ्यापंक्तिः, ८९ पञ्चपदा पथ्यापंक्तिः, शेषा स्त्रिष्टुभः। एकोननवत्यृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Victory, Freedom and Security
Meaning
O light and fire divine of cosmic yajna, may we kindle and raise you here on earth and in the heart, bright, radiant, unaging and generous. And may that admirable fuel fire of yours, wondrous more and ever more, that shines and blazes in heaven as the sun, bring us food, energy and enlightenment to the celebrants.
Subject
Agni
Translation
Thee, O Agni, would we kindle, full of light, O god, unwasting; as that very wondrous fuel of thine shall shine in the sky, bring thou food for thy praisers.
Translation
The moon, full of nice rays, abiding in the sky moves in the vast space. The lightning possessing the ends or cores like shining gold do not find the end of this twain of the heaven and earth. These two know about this sad plight of mine (the soul in bondage).
Translation
O Radiant and Omniscient God, we worship Thee, the Effulgent, Imperishable one, as verily Thy Praiseworthy, Glorious Power shines forth in the heavens. Mayst Thou infuse the desired emotion and vigor in thy worshippers.
Footnote
Rig, 5.6.4
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
८८−(आ) समन्तात् (त्वा)त्वाम् (अग्ने) हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन् (इधीमहि) इन्धेर्लिङि रूपम्। दीपयेम (द्युमन्तम्) दीप्तिमन्तम् (देव) हे सुखप्रद (अजरम्) जरारहितम्। बलवन्तम् (यत्)विभक्तेर्लुक्। या (घ) निश्चयेन (सा) प्रसिद्धा (ते) तव (पनीयसी) पनतिःस्तुतिकर्मा। स्तुत्यतरा (समित्) सम्यग् दीप्तिः (दीदयति) दीप्यते (द्यवि)द्योतमाने सूर्यादौ (इषम्) इष्टं पदार्थम् (स्तोतृभ्यः) स्तावकेभ्यः (आ)समन्तात् (भर) धर ॥
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