अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 4/ मन्त्र 53
ऋषिः - यम, मन्त्रोक्त
देवता - पुरोविराट सतः पङ्क्ति
छन्दः - अथर्वा
सूक्तम् - पितृमेध सूक्त
37
प॒र्णोराजा॑पि॒धानं॑ चरू॒णामू॒र्जो बलं॒ सह॒ ओजो॑ न॒ आग॑न्। आयु॑र्जी॒वेभ्यो॒विद॑धद्दीर्घायु॒त्वाय॑ श॒तशा॑रदाय ॥
स्वर सहित पद पाठप॒र्ण: । राजा॑ । अ॒पि॒ऽधान॑म् । च॒रू॒णाम् । ऊ॒र्ज: । बल॑म् । सह॑ । ओज॑: । न॒: । आ । अ॒ग॒न् । आयु॑: । जी॒वेभ्य॑: । विऽद॑धत् । दी॒र्घा॒यु॒ऽत्वाय॑ । श॒तऽशा॑रदाय ॥४.५३॥
स्वर रहित मन्त्र
पर्णोराजापिधानं चरूणामूर्जो बलं सह ओजो न आगन्। आयुर्जीवेभ्योविदधद्दीर्घायुत्वाय शतशारदाय ॥
स्वर रहित पद पाठपर्ण: । राजा । अपिऽधानम् । चरूणाम् । ऊर्ज: । बलम् । सह । ओज: । न: । आ । अगन् । आयु: । जीवेभ्य: । विऽदधत् । दीर्घायुऽत्वाय । शतऽशारदाय ॥४.५३॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
परमात्मा की भक्ति के फल का उपदेश।
पदार्थ
(पर्णः) पालन करनेवाला (राजा) राजा [सर्वशासक परमात्मा] (चरूणाम्) पात्र [समान लोकों] का (अपिधानम्)ढक्कन है, [उससे] (ऊर्जः) पराक्रम, (बलम्) बल, (सहः) उत्साह और (ओजः) प्रभाव [यहचार] (नः) हम को (आ अगन्) प्राप्त हुआ है। वह (जीवेभ्यः) जीवते हुए पुरुषों को (शतशारदाय) सौ वर्षवाले (दीर्घायुत्वाय) दीर्घ आयु के लिये (आयुः) जीवन (विदधत्)विशेष कर के देवे ॥५३॥
भावार्थ
सर्वनियन्तासर्वव्यापक जगदीश्वर अपनी न्यायव्यवस्था से मनुष्यों को धर्म, अर्थ, काम, मोक्षचार प्रकार के बल देता है, और वही जीवते हुए पुरुषार्थी का जीवन दीर्घ करता है॥५३॥
टिप्पणी
५३−(पर्णः) धापॄवस्यज्यतिभ्यो नः। उ० ३।६। पॄ पालनपूरणयोः-न। पालकः (राजा)सर्वशासकः परमात्मा (अपिधानम्) आच्छादनसाधनं यथा (चरूणाम्) पात्ररूपाणांलोकानाम् (ऊर्जः) ऊर्ज बलप्राणनयोः-पचाद्यच्। पराक्रमः (बलम्) सामर्थ्यम् (सहः)उत्साहः (ओजः) प्रभावः-इति धर्मार्थकाममोक्षचतुर्वर्गः (नः) अस्मान् (आ अगन्)आगमत्। प्राप्तवान् (आयुः) जीवनम् (जीवेभ्यः) जीवितेभ्यः पुरुषार्थिभ्यः (विदधत्) दधातेर्लेटि, अडागमः। विशेषेण दध्यात्। प्रयच्छेत् (दीर्घायुत्वाय) अ०१।३५।१। चिरकालजीवनाय (शतशारदाय) अ० १।३५।१। शतसंवत्सरयुक्ताय ॥
विषय
'पर्णः राजा' प्रभु
पदार्थ
१. (पर्ण:) = वह सबका पालन करनेवाला प्रभु ही (राजा) = इस ब्रह्माण्ड का शासक है। वही (चरूणाम् अपिधानाम्) = चरणशील-क्रियाशील प्रजाओं को अपनी गोद में धारण करनेवाला है। 'कुर्वन्नेवेह कर्माणि' यही तो उसका हमारे लिए उपदेश है। इस प्रभु के द्वारा धारण किये जाने से (न:) = हमें (ऊर्ज:) = प्राणशक्तियाँ, (बलम्) = बल, (सहः) = शत्रुमर्षणसामर्थ्य तथा (ओज:) = कान्ति [ओजस्विता] (आगन्) = प्राप्त होती है। २. ये प्रभु ही (जीवेभ्य:) = हम जीवों के लिए (शतकापाय) = या वर्षों तक चलनेवाले (दीर्घायुत्वा) = दीर्घ-जीवन के लिए (आयुः पिदयात) = आयष्य का सम्पाटन करते हैं। प्रभुरमरण से-प्रभु की गोद में आसान होने से हम दीर्घजीवी बनते हैं।
भावार्थ
प्रभु ही हमारा पालन करनेवाला प शासक है। वे हा क्रियाशील पुरुषों का धारण करते हैं। प्रभुकृपा से हमें बल व प्राणशक्ति प्राप्त होती है-परिणामतः हम दीर्घजीवन को धारण करते हैं।
भाषार्थ
(राजा) राष्ट्र का राजा (पर्णः) प्रजा की पालना करता, और उसे सुख-सामग्री द्वारा परिपूर्ण करता है। वह (चरूणाम्) खान-पान की सामग्री का (पिधानम्) भी निधान है, निधिरूप है। उसके कारण (नः) हम आश्रमवासियों को (ऊर्जः) अन्न (बलम्) बल (सहः) साहस और (ओजः) ओज (आगन्) प्राप्त हुआ है। वह राजा (जीवेभ्यः) राष्ट्र के जीवित सब प्राणियों के लिये (आयुः) अन्न का (विदधत्) विधान करता हुआ (दीर्घायुत्वाय) दीर्घ आयु और (शतशारदाय) १०० वर्षों की औसतन आयु का विधान करता है।
टिप्पणी
[पर्णः= पृ पालनपूरणयोः। पिधानम् = अपि + धानम् (निधानम्, निधिः); A place where anything is placed, a receptacle, reservoir, store (आप्टे)। ऊर्जः = ऊर्क = अन्न (निघं० २।७)। आयुः = अन्न (निघं० २|७)| पर्णः= पिपर्ति पालयति पूरयति वा (उणा० ३।६) दयानन्द भाष्य।]
विषय
देवयान और पितृयाण।
भावार्थ
प्रजा के रक्षक राजा का स्वरूप बतलाते हैं। (चरूणाम्) जिस प्रकार भात जो डेगची में पकते हैं उनको सुरक्षित रखने के लिये (पर्णम् अपिधानम्) पत्ते का ढक्कन धर दिया जाता है उसी प्रकार (चरूणाम्) संचरण करने वाले प्रजाओं, जीवों को (अपिधानम्) ढ़ककर धरने वाला पुरुष (पर्णः) उनको पालन और पूरण करने वाला पुरुष ही उनका रक्षक है। वह ही (ऊर्जः) राष्ट्रका बल और प्राणरूप, (सहः) शत्रुओं को पराजय करता (ओजः) देह में कान्ति, वर्णकारी ओज के समान राष्ट्र में तेजः स्वरूप होकर (नः) हमें (आ अगन्) प्राप्त होता है। वह (शतशारदाय) सौ बरस तक के (दीर्घायुत्वाय) दीर्घ जीवन के प्राप्त करने के लिये (जीवेभ्यः) समस्त राष्ट्र के मनुष्य प्रजाओं का (आयुः) जीवन (विदधत्) प्रदान करता है। उत्तम सुरक्षक राजा के राज्य में प्रजाएं दीर्घायु होती हैं।
टिप्पणी
ऊर्ज बलप्राणनयोरेतस्माणणयन्तात् पचाद्यच्। ऊर्जः।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वा ऋषिः। यमः, मन्त्रोक्ताः बहवश्च देवताः (८१ पितरो देवताः ८८ अग्निः, ८९ चन्द्रमाः) १, ४, ७, १४, ३६, ६०, भुरिजः, २, ५,११,२९,५०, ५१,५८ जगत्यः। ३ पश्चपदा भुरिगतिजगती, ६, ९, १३, पञ्चपदा शक्वरी (९ भुरिक्, १३ त्र्यवसाना), ८ पश्चपदा बृहती (२६ विराट्) २७ याजुषी गायत्री [ २५ ], ३१, ३२, ३८, ४१, ४२, ५५-५७,५९,६१ अनुष्टुप् (५६ ककुम्मती)। ३६,६२, ६३ आस्तारपंक्तिः (३९ पुरोविराड्, ६२ भुरिक्, ६३ स्वराड्), ६७ द्विपदा आर्ची अनुष्टुप्, ६८, ७१ आसुरी अनुष्टुप, ७२, ७४,७९ आसुरीपंक्तिः, ७५ आसुरीगायत्री, ७६ आसुरीउष्णिक्, ७७ दैवी जगती, ७८ आसुरीत्रिष्टुप्, ८० आसुरी जगती, ८१ प्राजापत्यानुष्टुप्, ८२ साम्नी बृहती, ८३, ८४ साम्नीत्रिष्टुभौ, ८५ आसुरी बृहती, (६७-६८,७१, (८६ एकावसाना), ८६, ८७, चतुष्पदा उष्णिक्, (८६ ककुम्मती, ८७ शंकुमती), ८८ त्र्यवसाना पथ्यापंक्तिः, ८९ पञ्चपदा पथ्यापंक्तिः, शेषा स्त्रिष्टुभः। एकोननवत्यृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Victory, Freedom and Security
Meaning
Self-refulgent ruling lord of the universe is the ultimate treasure-hold of the sustenance and security of the regions of life (which is nothing short of the cosmic yajna). From there strength and energy, courage and lustre comes to us. May the lord bring us health and vitality for all living people for a long and healthy life of full hundred years.
Translation
King leaf is the cover of the dishes; the strength of refreshment, the power, vigor, hath come to us, dispensing life-time to the living, in order to length of life for a hundred autumns.
Translation
The brilliant Prana, Soma is the cover over all the oblations. Let nourishment, power and might and vigor come to us. Let it give long life for the people for a long existence through a hundred autumns.
Translation
Just the cooked rice has a covering of leaf and gives us vigor, velour and splendor, so does a king provide a protective cover for his mobile populace with vigor, courage and glory. He gives a long lease of life to his subjects for hundred long, long years.
Footnote
In the regime of a good administrator, people enjoy long life hundred years.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
५३−(पर्णः) धापॄवस्यज्यतिभ्यो नः। उ० ३।६। पॄ पालनपूरणयोः-न। पालकः (राजा)सर्वशासकः परमात्मा (अपिधानम्) आच्छादनसाधनं यथा (चरूणाम्) पात्ररूपाणांलोकानाम् (ऊर्जः) ऊर्ज बलप्राणनयोः-पचाद्यच्। पराक्रमः (बलम्) सामर्थ्यम् (सहः)उत्साहः (ओजः) प्रभावः-इति धर्मार्थकाममोक्षचतुर्वर्गः (नः) अस्मान् (आ अगन्)आगमत्। प्राप्तवान् (आयुः) जीवनम् (जीवेभ्यः) जीवितेभ्यः पुरुषार्थिभ्यः (विदधत्) दधातेर्लेटि, अडागमः। विशेषेण दध्यात्। प्रयच्छेत् (दीर्घायुत्वाय) अ०१।३५।१। चिरकालजीवनाय (शतशारदाय) अ० १।३५।१। शतसंवत्सरयुक्ताय ॥
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