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अथर्ववेद के काण्ड - 8 के सूक्त 10 के मन्त्र
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मन्त्र चुनें
अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 10/ मन्त्र 6
ऋषिः - अथर्वाचार्यः
देवता - विराट्
छन्दः - याजुषी जगती
सूक्तम् - विराट् सूक्त
64
सोद॑क्राम॒त्सा द॑क्षिणा॒ग्नौ न्यक्रामत्।
स्वर सहित पद पाठसा । उत् । अ॒क्रा॒म॒त् । सा । द॒क्षि॒ण॒ऽअ॒ग्नौ । नि । अ॒क्रा॒म॒त् ॥१०.६॥
स्वर रहित मन्त्र
सोदक्रामत्सा दक्षिणाग्नौ न्यक्रामत्।
स्वर रहित पद पाठसा । उत् । अक्रामत् । सा । दक्षिणऽअग्नौ । नि । अक्रामत् ॥१०.६॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
ब्रह्म विद्या का उपदेश।
पदार्थ
(सा) वह [विराट्] (उत् अक्रामत्) ऊपर चढ़ी, (सा) वह [सूर्य वा यज्ञ की] (दक्षिणाग्नौ) बढ़ी हुयी अग्नि में (नि अक्रामत्) नीचे उतरी ॥६॥
भावार्थ
परमेश्वर की महिमा सूर्यादि तेजों और शिल्प आदि व्यवहारों में प्रकट है ॥६॥
टिप्पणी
६−(दक्षिणाग्नौ) द्रुदक्षिभ्यामिनन्। उ० २।५०। दक्ष वृद्धौ-इनन्। प्रवृद्धे पावके सूर्यस्य यज्ञस्य वा। अन्यत् पूर्ववत् ॥
विषय
दक्षिणाग्नि
पदार्थ
१. अब एक ग्राम के घरों में तो अराजकता की स्थिति समाप्त हो गई, 'परन्तु दो ग्रामों में कोई संघर्ष उपस्थित हो जाने पर क्या किया जाए', यह समस्या विचारणीय हो गई। परिणामतः (सा उदक्रामत्) = वह विराट् अवस्था और उत्क्रान्त हुई तथा (सा) = वह (दक्षिणाग्नौ न्यक्रामत्) = दक्षिणाग्नि में स्थित हुई। प्रत्येक ग्राम का दक्षिण [कुशल] अग्नि [नेता] इस सभा में उपस्थित होता है। इससे सभा का नाम ही दक्षिणाग्नि हो गया है। २. (यः एवं वेद) = जो इस 'दक्षिणाग्नि' संगठन के महत्व को समझ लेता है वह (यजऋत:) = संगठन में गतिवाला, (दक्षिणीय:) = [दक्षिण fame] यशस्वी व (वासतेयः) = लोगों को उत्तमता से बसानेवाला (भवति) = होता है। साथ ही 'दक्षिणानि' के सभ्यों को कुछ दक्षिणा भी दी जाती है तथा निवासस्थान भी दिया जाता है। ये दक्षिणाग्नि के सभ्य दक्षिणीय व बासतेय हैं। इन्हें अपने ग्राम से दूर आना पड़ता है, अत: यह व्यवस्था आवश्यक हो जाती है।
भावार्थ
ग्रामों के पारस्परिक कलहों को निपटाने के लिए ग्रामों के कुशल नेताओं की जो सभा बनती है, वह 'दक्षिणाग्नि' कहलाती है। जो कुशल नेता इस संगठन में उपस्थित होते हैं, वे 'दक्षिणीय व बासतेय' होते हैं।
भाषार्थ
(सा) वह आहवनीय अवस्था की विराट् (उदक्रामत्) उत्क्रान्त हुई (सा) वह (दक्षिणाग्नौ) दक्षिणाग्नि में (न्यक्रामत्) अवतीर्ण हुई।
टिप्पणी
[उदक्रामत्= उत् + क्रामत् (क्रमु पादविक्षेपे)। न्यक्रामत्= नि (नीचे की ओर) क्रामत् (क्रमु पादविदक्षेपे)। दक्षिणाग्नि= दक्षिण (Able, skilful, competent आप्टे) + अग्निः= अग्रणीभवति (निरुक्त ७।४।१४)। अतः दक्षिणाग्नि=योग्य होशियार नेता। ग्रामणियों के योग्य अग्रणी। इन की संस्था को दक्षिणाग्नि संस्था कहा है। अर्थात ग्रामणियों के योग्य व्यक्तियों के परस्पर मेल द्वारा रचितसंस्था। यह जिला-संस्था का रूप है]।
विषय
‘विराड्’ के ६ स्वरूप गार्हपत्य, आहवनीय, दक्षिणाग्नि, सभा, समिति और आमन्त्रण।
भावार्थ
(सा) वह विराट (उत् अक्रामत्) ऊपर को उठी अर्थात् प्रकट हुई और (दक्षिणाग्नौ नि अक्रमात्) दक्षिणाग्नि रूप में उत्तर आई। (य एवं वेद) जो पुरुष इस रहस्य को जानता है वह (यज्ञर्तः) यज्ञ में पूजनीय (वासतेयः) वसति=गृह में बसने योग्य उत्तम अतिथि (भवति) होता है। वह (दक्षिणीयः) दक्षिणा प्राप्त करने योग्य, कुशल (भवति) हो जाता है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वाचार्य ऋषिः विराड् देवता। १ त्रिपदार्ची पंक्तिः। २,७ याजुष्यो जगत्यः। ३,९ सामन्यनुष्टुभौ। ५ आर्ची अनुष्टुप्। ७,१३ विराट् गायत्र्यौ। ११ साम्नी बृहती। त्रयोदशर्चं पर्यायसूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Virat
Meaning
She, Virat Spirit of divinity, evolved further, took another step and settled in Dakshinagni, the sacred fire of social expansion and cohesion.
Translation
She moved up. She entered the Daksinagni (the southern sacrificial fire).
Translation
This rose and this entered in the Dakshinagni.
Translation
That glory of God manifested itself, and appeared in the shape of the blazing fire of the Sun.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
६−(दक्षिणाग्नौ) द्रुदक्षिभ्यामिनन्। उ० २।५०। दक्ष वृद्धौ-इनन्। प्रवृद्धे पावके सूर्यस्य यज्ञस्य वा। अन्यत् पूर्ववत् ॥
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