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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 10/ मन्त्र 2
    ऋषिः - अथर्वाचार्यः देवता - विराट् छन्दः - आर्ची त्रिष्टुप् सूक्तम् - विराट् सूक्त
    70

    तस्मा॒द्वन॒स्पती॑नां संवत्स॒रे वृ॒क्णमपि॑ रोहति वृ॒श्चते॒ऽस्याप्रि॑यो॒ भ्रातृ॑व्यो॒ य ए॒वं वेद॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    तस्मा॑त् । वन॒स्पती॑नाम् । स॒म्ऽव॒त्स॒रे । वृ॒क्णम् । अपि॑ । रो॒ह॒ति॒ । वृ॒श्चते॑ । अ॒स्य॒ । अप्रि॑य: । भ्रातृ॑व्य: । य: । ए॒वम् । वेद॑ ॥१२.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    तस्माद्वनस्पतीनां संवत्सरे वृक्णमपि रोहति वृश्चतेऽस्याप्रियो भ्रातृव्यो य एवं वेद ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    तस्मात् । वनस्पतीनाम् । सम्ऽवत्सरे । वृक्णम् । अपि । रोहति । वृश्चते । अस्य । अप्रिय: । भ्रातृव्य: । य: । एवम् । वेद ॥१२.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 8; सूक्त » 10; पर्यायः » 3; मन्त्र » 2
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    हिन्दी (4)

    विषय

    ब्रह्मविद्या का उपदेश।

    पदार्थ

    (तस्मात्) इसीलिये (संवत्सरे) वर्ष भर में (वनस्पतीनाम्) वनस्पतियों का (वृक्णम्) खण्डित अंश (अपि रोहति) भर जाता है, (अस्य) उसका (अप्रियः) अप्रिय (भ्रातृव्यः) भ्रातृ भाव से रहित [शत्रु, मनोदोष] (वृश्चते) कट जाता है, (यः एवम् वेद) जो ऐसा जानता है ॥२॥

    भावार्थ

    ब्रह्मज्ञानी पुरुष अन्न आदि पदार्थों की न्यूनता की पूर्णता वर्ष भर में वृष्टि द्वारा देखकर आत्मिक दोषों के त्याग से ज्ञान की पूर्त्ति द्वारा ईश्वरशक्ति का अनुभव करते हैं ॥२॥

    टिप्पणी

    २−(तस्मात्) कारणात् (वृक्णम्) ओव्रश्चू छेदने-क्त। खण्डितभागः (अपि रोहति) प्रपूर्य्यते (वृश्चते) वृश्च्यते। छिद्यते (अस्य) ब्रह्मवादिनः। (अप्रियः) अहितः (भ्रातृव्ये) व्यन्त्सपत्ने पा० ४।१।१४५। भ्रातृ-व्यन्। भ्रातृभावरहितः। शत्रुः। मनोदोषः। अन्यत् पूर्ववत् ॥

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    विषय

    वनस्पतियों का विराट् को प्राप्त होना

    पदार्थ

    १. (सा) = वह विराटप कामधेनु [विशिष्ट शासन-व्यवस्था] (उदक्रामत्) = उत्क्रान्त हुई। (सा वनस्पतीन् आगच्छत्) = वह वनस्पतियों को पास हुई, (वनस्पतय: तां अघ्नत) = वनस्पतियों ने उसे प्राप्त किया [हन् गती]। (सा) = वह (संवत्सरे) = सम्पूर्ण वर्ष में (समभवत्) = उन वनस्पतियों के साथ हुई-खूब अच्छी फसल हुई। (तस्मात्) = इस कारण से (वनस्पतीनाम्) = वनस्पतियों का (वृक्णम्) = छिन्न भाग (अपि) = भी (संवत्सरे) = वर्षभर में (रोहति) = प्रादुर्भूत हो जाता है। (यः एवं वेद) = जो इस तत्त्व को समझ लेता है कि 'वनस्पतियों का छिन्नभाग भी फिर ठीक हो जाता है, तो हमारा छिन्नभाग भी क्यों न ठीक हो जाएगा'(अस्य) = इसका (अप्रियः भ्रातृव्यः वृश्चते) = अप्रिय शत्रु भी कट जाता हैं।

    भावार्थ

    शासन-व्यवस्था के ठीक होने पर राष्ट्र में वृक्ण वृक्षों का रोहण होता है। जैसे वर्षभर में ये वृक्ष पुन: प्रादुर्भूत हो जाते हैं, इसी प्रकार इस राष्ट्र में लोग शत्रुओं से शत्रुता को भी समाप्त कर लेते हैं।

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    भाषार्थ

    (तस्मात्) इसलिये (वनस्पतीनाम्) वनस्पतियों का (वृक्णम्) कटा अंश (अपि) भी (संवत्सरे) नया संवत्सरकाल प्राप्त होने पर (रोहति) प्ररोहित हो जाता है। (य) जो (एवम्) इस तथ्य को (वेद) जानता है (अस्य) इसका (अप्रियः) अप्रिय (भ्रातृव्यः) भ्रातृव्य (वृश्चते) कट जाता है, नष्ट हो जाता है।

    टिप्पणी

    [जो व्यक्ति यह जानता है कि संवत्सर-काल प्राप्त होने पर वनस्पतियों के कटे अंश भी प्ररोहित हो जाते हैं तो वह भी निज मनोभावनाओं के कटु अंशों में सुधार करता है, और उस के मन का मालिन्य अर्थात् पाप भी कट जाता है। "भ्रातृव्य" पद मनोगत "पाप" को सूचित करता है। यथा "पाप्मना भ्रातृव्येण" में पाप को भ्रातृव्य कहा है। "पाप्मना भ्रातृव्ये णेति तूपचारात्" (भट्टोजदीक्षित कौमुदी, अष्टा० ४।१।१४५)। अभिप्राय यह कि ज्ञानी व्यक्ति प्राकृतिक घटनाओं से भी शिक्षा प्राप्त कर निज जीवन को समुन्नत करता रहता है]।

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    विषय

    विराड् के ४ रूप, वनस्पति, पितृ, देव और मनुष्यों के बीच में क्रम से रस, वेतन, तेज और अन्न।

    भावार्थ

    (तस्मात्) इसी कारण से (वनस्पतीनां) वनस्पतियों में वर्ष भर में (वृक्णम् अपि) काटा हुआ भी (रोहति) पुनः अपनी नई शाखायें उत्पन्न करता है। (यः एवं वेद) जो इस रहस्य को जानता है (अस्य यः भ्रातृव्यः) इसका जो शत्रु है वह भी (वृश्ते) कट जाता है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वाचार्य ऋषिः। विराड् देवता। १ चतुष्पदा विराड् अनुष्टुपू। २ आर्ची त्रिष्टुप्। ३,५,७ चतुष्पदः प्राजापत्याः पंक्तयः। ४, ६, ८ आर्चीबृहती।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Virat

    Meaning

    For that reason, that of the herbs which is pruned or cut regrows in the year with new life. One who knows this process of nature grows and progresses in time afresh and his lovelessness and jealous rivalries are pruned off.

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    Translation

    Therefore, even the cuttings of forest trees grow out in a year (samvatsara). He, who knows it thus, his hated enemy is hacked down.

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    Translation

    It is why the wound of trees heals over in a year. He who knows this finds his rival enemy wounded.

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    Translation

    Hence in a year the trimmed twigs of trees grow again. He who knows this secret gets his mental frailty cured.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २−(तस्मात्) कारणात् (वृक्णम्) ओव्रश्चू छेदने-क्त। खण्डितभागः (अपि रोहति) प्रपूर्य्यते (वृश्चते) वृश्च्यते। छिद्यते (अस्य) ब्रह्मवादिनः। (अप्रियः) अहितः (भ्रातृव्ये) व्यन्त्सपत्ने पा० ४।१।१४५। भ्रातृ-व्यन्। भ्रातृभावरहितः। शत्रुः। मनोदोषः। अन्यत् पूर्ववत् ॥

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