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  • अथर्ववेद - काण्ड 8/ सूक्त 10/ पर्यायः 6/ मन्त्र 1
    ऋषि: - अथर्वाचार्यः देवता - विराट् छन्दः - द्विपदा विराड्गायत्री सूक्तम् - विराट् सूक्त
    पदार्थ -

    (तत्) विस्तार करनेवाला [ब्रह्म] (एवम्) इस प्रकार (यस्मै विदुषे) जिस विद्वान् को (अलाबुना) न डूबनेवाले कर्म से (अभिषिञ्चेत्) सब प्रकार सींचें, वह [विद्वान्] [विष को] (प्रत्याहन्यात्) हटा देवे ॥१॥

    भावार्थ -

    विद्वान् मनुष्य ब्रह्म को जानकर दोषों का नाश करे। इस मन्त्र में [विष] पद का अनुकर्षण मन्त्र ३ में से है ॥१॥

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