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  • अथर्ववेद - काण्ड 8/ सूक्त 10/ मन्त्र 1
    ऋषि: - अथर्वाचार्यः देवता - विराट् छन्दः - द्विपदा विराड्गायत्री सूक्तम् - विराट् सूक्त

    तद्यस्मा॑ ए॒वं वि॒दुषे॒ऽलाबु॑नाभिषि॒ञ्चेत्प्र॒त्याह॑न्यात् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    तत् । यस्मै॑ । ए॒वम् । वि॒दुषे॑ । अ॒लाबु॑ना । अ॒भि॒ऽसि॒ञ्चेत् । प्र॒ति॒ऽआह॑न्यात् ॥१५.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    तद्यस्मा एवं विदुषेऽलाबुनाभिषिञ्चेत्प्रत्याहन्यात् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    तत् । यस्मै । एवम् । विदुषे । अलाबुना । अभिऽसिञ्चेत् । प्रतिऽआहन्यात् ॥१५.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 8; सूक्त » 10; पर्यायः » 6; मन्त्र » 1

    पदार्थ -
    (तत्) विस्तार करनेवाला [ब्रह्म] (एवम्) इस प्रकार (यस्मै विदुषे) जिस विद्वान् को (अलाबुना) न डूबनेवाले कर्म से (अभिषिञ्चेत्) सब प्रकार सींचें, वह [विद्वान्] [विष को] (प्रत्याहन्यात्) हटा देवे ॥१॥

    भावार्थ -
    विद्वान् मनुष्य ब्रह्म को जानकर दोषों का नाश करे। इस मन्त्र में [विष] पद का अनुकर्षण मन्त्र ३ में से है ॥१॥

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