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अथर्ववेद के काण्ड - 8 के सूक्त 10 के मन्त्र
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अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 10/ मन्त्र 13
ऋषिः - अथर्वाचार्यः
देवता - विराट्
छन्दः - चतुष्पदोष्णिक्
सूक्तम् - विराट् सूक्त
60
सोद॑क्राम॒त्सा स॑प्तऋ॒षीनाग॑च्छ॒त्तां स॑प्तऋ॒षय॒ उपा॑ह्वयन्त॒ ब्रह्म॑ण्व॒त्येहीति॑।
स्वर सहित पद पाठसा । उत् । अ॒क्रा॒म॒त् । सा । स॒प्त॒ऽऋ॒षीन् । आ । अ॒ग॒च्छ॒त् । ताम् । स॒प्त॒ऽऋ॒षय॑: । उप॑ । अ॒ह्व॒य॒न्त॒ । ब्रह्म॑ण्ऽवति । आ । इ॒हि॒ । इति॑ ॥१३.१३॥
स्वर रहित मन्त्र
सोदक्रामत्सा सप्तऋषीनागच्छत्तां सप्तऋषय उपाह्वयन्त ब्रह्मण्वत्येहीति।
स्वर रहित पद पाठसा । उत् । अक्रामत् । सा । सप्तऽऋषीन् । आ । अगच्छत् । ताम् । सप्तऽऋषय: । उप । अह्वयन्त । ब्रह्मण्ऽवति । आ । इहि । इति ॥१३.१३॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थ
(सा उत् अक्रामत्) वह [विराट्] ऊपर चढ़ी, (सा) वह (सप्तऋषीन्) सात ऋषियों में [व्यापनशील वा दर्शनशील अर्थात् त्वचा, नेत्र, कान, जिह्वा, नाक, मन और बुद्धि में-अ० ४।११।९] (आ अगच्छत्) आयी, (ताम्) उस को (सप्तऋषयः) सात ऋषियों [त्वचा आदि] ने (उप अह्वयन्त) पास बुलाया, “(ब्रह्मण्वति) हे वेदवती ! (आ इहि) तू आ, (इति) बस” ॥१३॥
भावार्थ
मनुष्य इन्द्रियों द्वारा ईश्वरशक्ति का अनुभव करके ब्रह्मविद्या प्राप्त करते हैं ॥१३॥
टिप्पणी
१३−(सप्तऋषीन्) अ० ४।११।९। सप्त ऋषयः षडिन्द्रियाणि विद्या सप्तमी-निरु० १२।३७। त्वक्चक्षुःश्रवणरसनाघ्राणमनोबुद्धीः (सप्तऋषयः) पूर्वोक्ताः त्वक्चक्षुरादयः (ब्रह्मण्वति) अ० ६।१०८।२। हे वेदवति। अन्यत् पूर्ववत् ॥
विषय
सप्तर्षियों द्वारा ब्रह्म व तप का दोहन
पदार्थ
१. (सा) = वह विराट् (उदक्रामत्) = उत्क्रान्त हुई। (सा) = वह (सम ऋषीन्) = सात ऋषियों को प्राप्त हुई। मनुष्य के जीवन में ('सप्त ऋषयः प्रतिहिताः शरीरे') = सप्त ऋषि 'दो कान, दो नासिका छिद्र, दो आँखें व मुख' प्रभु द्वारा स्थापित किये गये हैं। इन (सप्तऋषय:) = सात ऋषियों ने (ताम्) = उस विराट् को (उपाह्वयन्त) = पुकारा कि हे (ब्रह्मण्यति एहि इति) = ज्ञानवाली वेदवाणि! तू आ तो। (तस्या:) = उस विराट का (वत्स:) = प्रिय यह व्यक्ति (सोमः) = सौम्य स्वभाव का तथा राजा-व्यवस्थित जीवनवाला (आसीत्) = हुआ। (छन्द:) = वेदवाणी के छन्द ही उसके (पात्रम्) = रक्षासाधन बनें। २. (ताम्) = उस विराट् को (आङ्गिरस:) = अङ्ग-प्रत्यङ्ग में रसवाले (बृहस्पति:) = ज्ञानी पुरुष ने (अधोक्) = दुहा। (ताम्) = उससे (ब्रह्म च तपः च अधोक) = ज्ञान और तप का ही दोहन किया। (सप्तऋषय:) = ये शरीरस्थ सप्तर्षि (तत्) = उस (ब्रह्म च तप: च) = ब्रह्म और तप को ही (उपजीवन्ति) = जीवन का आधार बनाते हैं। (यः एवं वेद) = जो इसप्रकार ब्रह्म और तप के महत्व को समझ लेता है, वह ब्रह्मवर्चसी ब्रह्मवर्चस्वाला व (उपजीवनीयः भवति) = जीवन-यात्रा में औरों को सहायता देनेवाला होता है।
भावार्थ
राष्ट्र में शासन-व्यवस्था के ठीक होने पर शरीरस्थ सप्तर्षि वेदवाणी के द्वारा ज्ञान व तप का जीवन बनानेवाले होते हैं। यह ज्ञानी व तपस्वी व्यक्ति ब्रह्मवर्चस् प्राप्त करके औरों की जीवनयात्रा में सहायक होते हैं।
भाषार्थ
(सा) वह विराट् (उदक्रामत्) उत्क्रान्त हुई (सा) वह (सप्तऋषीन्) सात ऋषियों को (आगच्छत्) प्राप्त हुई, (ताम्) उस को (सप्त ऋषयः) सात ऋषियों ने (उप अह्वयन्त) अपने समीप बुलाया कि (ब्रह्मण्वति१) हे ब्रह्मवाली ! (एहि) तू आ (इति) इस प्रकार।
टिप्पणी
[सप्त ऋषयः= सात ऋषि हैं, शरीरस्य। यथा "सप्त ऋषयः प्रतिहिताः शरीरे" (यजु० ३४।५५)। ये सात ऋषि हैं "षडिन्द्रियाणि विद्या सप्तमी" (निरुक्त १२।४।३७), अर्थात् ५ ज्ञानेन्द्रियां, १ मन, और विद्या अर्थात् बुद्धि। मनुष्य के निःश्रेयस के लिये ये सात "ऋषिकोटि" के होने चाहिये। इस भावना को अभिव्यक्त करने के लिये इन सात को ऋषि कहा है। वैदिक साहित्य में आध्यात्मिक और आधिभौतिक तथा आधिदैविक तत्वों में समता कही है। इसलिये आधिभौतिक शासन में भी सात ऋषियों२ द्वारा शासन का कथन हुआ है। शासन में राजा तो क्षात्रशक्ति सम्पन्न होना चाहिये, परन्तु "ब्राह्मजीवन" के उद्देश्य से मन्त्रिवर्ग सात ऋषियों का होना चाहिये। इसी प्रकार आधिदैविक अर्थ में सात ऋषि स्थानापन्न सूर्य की सात रश्मियां हैं (निरुक्त १२।४।३७)]। [१. ऋषियों ने विराट् को ब्रह्मज्ञानप्रदात्रीरूप में बुलाया। (मन्त्र १५) में इस का स्पष्टीकरण हुआ है। २. मनु ने भी सात या आठ सचिवों का कथन किया है। यथा “सचिवान् सप्त चाष्टौ वा प्रकुर्वीत परीक्षितान्” (मनु ७।५४)।]
विषय
विराट् गौ से माया, स्वधा, कृषि, सस्य, ब्रह्म और तपका दोहन।
भावार्थ
(सा उद् अक्रामत्) वह उपर उठी। (सा सप्तऋषीन् आगच्छत्) वह सात ऋषियों के पास आई। (तां सप्त ऋषयः उपाह्वयन्त ब्रह्मण्वति एहि इति) उन सात ऋषियों ने हे ब्रह्मण्वति ! आओ इस प्रकार आदरपूर्वक बुलाया। (तस्याः सोमः राजा वत्सः आसीत्) उसका सोम राजा वत्स था। (छन्दः पानम्) छन्दस् पात्र था। (तां बृहस्पतिः आंगिरसः अधोक्) उसको आंगिरस बृहस्पति ने दोहन किया। (तां ब्रह्म च तपः च अधोक्) उसने ब्रह्मज्ञान, वेद और तपश्चर्या का दोहन किया। (तत्) उस (ब्रह्म च तपः च) ब्रह्मज्ञान और तप के आधार पर (सप्त ऋषयः उपजीवन्ति) सात ऋषिगण प्राण धारण करते हैं। (य एवं वेद) जो इस रहस्य को जानता है वह (ब्रह्मवर्चसी उपजीवनीयः भवति) ब्रह्मवर्चस्वी और अन्यों को जीविका देने में समर्थ होता है। विराट्=ब्रह्मण्वती अर्थात् ब्रह्मज्ञानमयी होकर ऋषियों को प्राप्त हुई उस का सोम राजा ज्ञानपिपासु वत्स के समान है। वेदवक्ता ब्रह्मणस्पति या बृहस्पति उसका दोहन करता है। ब्रह्मज्ञान, वेद और तप उसका दोहन का सार है। ऋषि उसी पर जीते हैं, दोहन का पात्र ‘छन्द’ वेद है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वाचार्य ऋषिः। विराड् देवता। १, ५ साम्नां जगत्यौ। २,६,१० साम्नां बृहत्यौ। ३, ४, ८ आर्च्यनुष्टुभः। ९, १३ चतुष्पाद् उष्णिहौ। ७ आसुरी गायत्री। ११ प्राजापत्यानुष्टुप्। १२, १६ आर्ची त्रिष्टुभौ। १४, १५ विराङ्गायत्र्यौ। षोडशर्चं पर्यायसूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Virat
Meaning
She, Virat, proceeded, came to the seven sages, the seven addressed her at the closest: Come, harbinger of Brahman, knowledge and wisdom of Divinity, the very vision of the Supreme Soul.
Translation
She moved up. She came to the, seven seers (saptarsin). The seven seers called to her : "O you, one full of Spiritual knowledge (brahamanawati), come here,"
Translation
This virat mounted up and this approached seven organs of cognition (five cognitive senses, mind and intellect). They cried Come O Brahmanvati! come hither. (Brahmanvati here stands to mean Vedic speech which is stored with the treasure of Knowledge).
Translation
The glory of God arose. She approached the seven Rishis. They called her, O rich in knowledge, come hither!
Footnote
Seven Rishis: Skin, Eye, Nose, Ear, Tongue, Mind, Intellect. Griffith interprets these Rishis as Bhardwaj, Kasyapa, Gotama, Atri, Vasishtha, Visvamitra and Jamadagni. This interpretation is unacceptable as there is no history in the Vedas.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
१३−(सप्तऋषीन्) अ० ४।११।९। सप्त ऋषयः षडिन्द्रियाणि विद्या सप्तमी-निरु० १२।३७। त्वक्चक्षुःश्रवणरसनाघ्राणमनोबुद्धीः (सप्तऋषयः) पूर्वोक्ताः त्वक्चक्षुरादयः (ब्रह्मण्वति) अ० ६।१०८।२। हे वेदवति। अन्यत् पूर्ववत् ॥
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