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  • अथर्ववेद - काण्ड 8/ सूक्त 10/ पर्यायः 1/ मन्त्र 1
    ऋषि: - अथर्वाचार्यः देवता - विराट् छन्दः - त्रिपदार्ची पङ्क्तिः सूक्तम् - विराट् सूक्त
    पदार्थ -

    (विराट्) विराट् [विविध ईश्वरी, ईश्वरशक्ति] (वै) ही (अग्रे) पहिले ही पहिले (इदम्) यह [जगत्] (आसीत्) थी, (तस्याः जातायाः) उस प्रकट हुई से (सर्वम्) सबका सब (अबिभेत्) डरने लगा, “(इति) बस, (इयम् एव) यही (इदम्) यह [जगत्] (भविष्यति) हो जायगी” ॥१॥

    भावार्थ -

    सृष्टि से पहिले एक ईश्वरशक्ति थी, जिससे ही होनहार सृष्टि उत्पन्न होने के लिये अनुभव होती थी, उसी का वर्णन अगले मन्त्रों में है ॥१॥

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