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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 10/ मन्त्र 14
    ऋषिः - अथर्वाचार्यः देवता - विराट् छन्दः - साम्न्युष्णिक् सूक्तम् - विराट् सूक्त
    58

    तस्याः॒ सोमो॒ राजा॑ व॒त्स आसी॒च्छन्दः॒ पात्र॑म्।

    स्वर सहित पद पाठ

    तस्या॑: । सोम॑: । राजा॑ । व॒त्स: । आसी॑त् । छन्द॑: । पात्र॑म् ॥१३.१४॥


    स्वर रहित मन्त्र

    तस्याः सोमो राजा वत्स आसीच्छन्दः पात्रम्।

    स्वर रहित पद पाठ

    तस्या: । सोम: । राजा । वत्स: । आसीत् । छन्द: । पात्रम् ॥१३.१४॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 8; सूक्त » 10; पर्यायः » 4; मन्त्र » 14
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    ब्रह्मविद्या का उपदेश।

    पदार्थ

    (राजा) राजा (सोमः) सुख उत्पन्न करने हारा [जीवात्मा] (तस्याः) उस [विराट्] का (वत्सः) उपदेष्टा और (छन्दः) स्वतन्त्रता [रूप ब्रह्म] (पात्रम्) रक्षासाधन (आसीत्) था ॥१४॥

    भावार्थ

    यह जीवात्मा परमेश्वर की स्वतन्त्रता में अनन्त शक्ति साक्षात् करके आनन्द पाता है ॥१४॥

    टिप्पणी

    १४−(सोमः) सोमः सूर्यः प्रसवनात्, सोम आत्माप्येतस्मादेव-निरु० १४।१२। सुखोत्पादको जीवात्मा (राजा) ऐश्वर्यवान् (छन्दः) स्वातन्त्र्यम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥

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    विषय

    सप्तर्षियों द्वारा ब्रह्म व तप का दोहन

    पदार्थ

    १. (सा) = वह विराट् (उदक्रामत्) = उत्क्रान्त हुई। (सा) = वह (सम ऋषीन्) = सात ऋषियों को प्राप्त हुई। मनुष्य के जीवन में ('सप्त ऋषयः प्रतिहिताः शरीरे') = सप्त ऋषि 'दो कान, दो नासिका छिद्र, दो आँखें व मुख' प्रभु द्वारा स्थापित किये गये हैं। इन (सप्तऋषय:) = सात ऋषियों ने (ताम्) = उस विराट् को (उपाह्वयन्त) = पुकारा कि हे (ब्रह्मण्यति एहि इति) = ज्ञानवाली वेदवाणि! तू आ तो। (तस्या:) = उस विराट का (वत्स:) = प्रिय यह व्यक्ति (सोमः) = सौम्य स्वभाव का तथा राजा-व्यवस्थित जीवनवाला (आसीत्) = हुआ। (छन्द:) = वेदवाणी के छन्द ही उसके (पात्रम्) = रक्षासाधन बनें। २. (ताम्) = उस विराट् को (आङ्गिरस:) = अङ्ग-प्रत्यङ्ग में रसवाले (बृहस्पति:) = ज्ञानी पुरुष ने (अधोक्) = दुहा। (ताम्) = उससे (ब्रह्म च तपः च अधोक) = ज्ञान और तप का ही दोहन किया। (सप्तऋषय:) = ये शरीरस्थ सप्तर्षि (तत्) = उस (ब्रह्म च तप: च) = ब्रह्म और तप को ही (उपजीवन्ति) = जीवन का आधार बनाते हैं। (यः एवं वेद) = जो इसप्रकार ब्रह्म और तप के महत्व को समझ लेता है, वह ब्रह्मवर्चसी ब्रह्मवर्चस्वाला व (उपजीवनीयः भवति) = जीवन-यात्रा में औरों को सहायता देनेवाला होता है।

    भावार्थ

    राष्ट्र में शासन-व्यवस्था के ठीक होने पर शरीरस्थ सप्तर्षि वेदवाणी के द्वारा ज्ञान व तप का जीवन बनानेवाले होते हैं। यह ज्ञानी व तपस्वी व्यक्ति ब्रह्मवर्चस् प्राप्त करके औरों की जीवनयात्रा में सहायक होते हैं।

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    भाषार्थ

    (तस्याः) उस विराट्-गौ का (वत्सः) बछड़ा (आसीत्) था (सोमः राजा) सौम्य स्वभाव का राजा और (छन्दः) वैदिक छन्द-समूह अर्थात् वेदमन्त्र समूह था (पात्रम्) रक्षा और पालन का साधन।

    टिप्पणी

    [यद्यपि वैदिक साहित्यानुसार राजा क्षत्रिय होना चाहिये। परन्तु प्रजा के शासन में उसे सौम्य स्वभाववाला होकर, शासक होना चाहिये, और युद्धावस्था में उसे क्षात्रस्वभाववाला होकर युद्ध करना चाहिये। शासन, वैदिकमन्त्रप्रतिपादित विधि द्वारा होना चाहिये (देखो यजु० २०।५-९)।]

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    विषय

    विराट् गौ से माया, स्वधा, कृषि, सस्य, ब्रह्म और तपका दोहन।

    भावार्थ

    (सा उद् अक्रामत्) वह उपर उठी। (सा सप्तऋषीन् आगच्छत्) वह सात ऋषियों के पास आई। (तां सप्त ऋषयः उपाह्वयन्त ब्रह्मण्वति एहि इति) उन सात ऋषियों ने हे ब्रह्मण्वति ! आओ इस प्रकार आदरपूर्वक बुलाया। (तस्याः सोमः राजा वत्सः आसीत्) उसका सोम राजा वत्स था। (छन्दः पानम्) छन्दस् पात्र था। (तां बृहस्पतिः आंगिरसः अधोक्) उसको आंगिरस बृहस्पति ने दोहन किया। (तां ब्रह्म च तपः च अधोक्) उसने ब्रह्मज्ञान, वेद और तपश्चर्या का दोहन किया। (तत्) उस (ब्रह्म च तपः च) ब्रह्मज्ञान और तप के आधार पर (सप्त ऋषयः उपजीवन्ति) सात ऋषिगण प्राण धारण करते हैं। (य एवं वेद) जो इस रहस्य को जानता है वह (ब्रह्मवर्चसी उपजीवनीयः भवति) ब्रह्मवर्चस्वी और अन्यों को जीविका देने में समर्थ होता है। विराट्=ब्रह्मण्वती अर्थात् ब्रह्मज्ञानमयी होकर ऋषियों को प्राप्त हुई उस का सोम राजा ज्ञानपिपासु वत्स के समान है। वेदवक्ता ब्रह्मणस्पति या बृहस्पति उसका दोहन करता है। ब्रह्मज्ञान, वेद और तप उसका दोहन का सार है। ऋषि उसी पर जीते हैं, दोहन का पात्र ‘छन्द’ वेद है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वाचार्य ऋषिः। विराड् देवता। १, ५ साम्नां जगत्यौ। २,६,१० साम्नां बृहत्यौ। ३, ४, ८ आर्च्यनुष्टुभः। ९, १३ चतुष्पाद् उष्णिहौ। ७ आसुरी गायत्री। ११ प्राजापत्यानुष्टुप्। १२, १६ आर्ची त्रिष्टुभौ। १४, १५ विराङ्गायत्र्यौ। षोडशर्चं पर्यायसूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Virat

    Meaning

    Of her, Soma Raja, the man self-ruler at perfect peace of mind and clairvoyance of soul, became the calf, recipient child of the mother divine. His vessel to receive the vision was the chhanda, the Vedic verse.

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    Translation

    Radiant Soma (bliss) was her calf; the metered verse was the milking-pot. (Somaraja vatsa)

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    Translation

    The individual soul which has its control on body and limbs was the calf of this virat. The vedic metre was the pan of milking.

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    Translation

    The beautiful soul was her preacher, and Independent God, the Guardian.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १४−(सोमः) सोमः सूर्यः प्रसवनात्, सोम आत्माप्येतस्मादेव-निरु० १४।१२। सुखोत्पादको जीवात्मा (राजा) ऐश्वर्यवान् (छन्दः) स्वातन्त्र्यम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥

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