अथर्ववेद - काण्ड 11/ सूक्त 3/ मन्त्र 51
सूक्त - अथर्वा
देवता - मन्त्रोक्ताः
छन्दः - आर्च्युष्णिक्
सूक्तम् - ओदन सूक्त
ब्र॒ध्नलो॑को भवति ब्र॒ध्नस्य॑ वि॒ष्टपि॑ श्रयते॒ य ए॒वं वेद॑ ॥
स्वर सहित पद पाठब्र॒ध्नऽलो॑क: । भ॒व॒ति॒ । ब्र॒ध्नस्य॑ । वि॒ष्टपि॑ । श्र॒य॒ते॒ । य: । ए॒वम् । वेद॑ ॥५.२॥
स्वर रहित मन्त्र
ब्रध्नलोको भवति ब्रध्नस्य विष्टपि श्रयते य एवं वेद ॥
स्वर रहित पद पाठब्रध्नऽलोक: । भवति । ब्रध्नस्य । विष्टपि । श्रयते । य: । एवम् । वेद ॥५.२॥
अथर्ववेद - काण्ड » 11; सूक्त » 3; मन्त्र » 51
भाषार्थ -
(यः) जो उपासक (एवम्) इस प्रकार ब्रह्मौदन के स्वरूप को (वेद) जान लेता है उसे (ब्रध्नलोकः) महान् सूर्यलोक (भवति) प्राप्त हो जाता है, ओर (ब्रध्नस्य) महान् सूर्यलोक के (विष्टपि) प्रवेशस्थान परमेश्वर में (श्रयते) वह आश्रय पाता है।
टिप्पणी -
[ब्रध्नः = महान् सूर्यः (उणा० ३।५, महर्षि दयानन्द); तथा sun (आप्टे)। विष्टपि= विशन्ति यत्रेति (उणा० ३।१४५; महर्षि दयानन्द)। ब्रध्नलोकः = "अथ यत्रैतदस्माच्छरीरादुत्क्रामत्यथैतैरेव रश्मिभिरूर्ध्वमाक्रमते स ओमिति वा होद्वा मीयते स यावत्क्षिप्येन्मनस्तावदादित्यं गच्छत्येतद्वै खलु लोकद्वारं विदुषां प्रपदनं निरोधोऽविदुषाम्॥" (छान्दोग्य उप० अध्या० ८। खण्ड ६। सन्दर्भ ५), अर्थात् जब इस शरीर से उत्क्रमण करता है, तब इन ही रश्मियों द्वारा ऊर्ध्वे की ओर आक्रमण करता है, वह "ओ३म्" ऐसा कहता है, ऊर्ध्व गति करता है, जितनी देर मन को सूर्य तक उत्क्षेपण में लगती उतने काल में वह आत्मा आदित्य को पहुंच जाता है। यह आदित्य ब्रह्मलोक का द्वार है, जिसे कि ब्रह्मवेत्ता लोग पाते हैं। यजुर्वेद में ब्रह्म को आदित्यनिष्ठ कहा है। यथा- "योऽसावादित्ये पुरुषः सोऽसावहम्। ओ३म् खं ब्रह्म (४०।१७) ब्रह्म है तो सर्वव्यापक, परन्तु वह सौरमण्डल के नियन्त्रण में केन्द्रिय शक्तिरूप आदित्य में स्थित हो कर सौरमण्डल का नियन्त्रण करता है। मन्त्र ५१ में सूर्य की स्थिति ब्रह्म में कही है। ब्रह्म, सूर्य में प्रविष्ट भी है, और सूर्य का आश्रय भी]।