ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 97/ मन्त्र 19
ऋषिः - शक्तिर्वासिष्ठः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
जुष्टो॒ मदा॑य दे॒वता॑त इन्दो॒ परि॒ ष्णुना॑ धन्व॒ सानो॒ अव्ये॑ । स॒हस्र॑धारः सुर॒भिरद॑ब्ध॒: परि॑ स्रव॒ वाज॑सातौ नृ॒षह्ये॑ ॥
स्वर सहित पद पाठजुष्टः॑ । मदा॑य । दे॒वऽता॑ते । इ॒न्दो॒ इति॑ । परि॑ । स्नुना॑ । ध॒न्व॒ । सानौ॑ । अव्ये॑ । स॒हस्र॑ऽधारः । सु॒ऽर॒भिः । अद॑ब्धः । परि॑ । स्र॒व॒ । वाज॑ऽसातौ । नृ॒ऽसह्ये॑ ॥
स्वर रहित मन्त्र
जुष्टो मदाय देवतात इन्दो परि ष्णुना धन्व सानो अव्ये । सहस्रधारः सुरभिरदब्ध: परि स्रव वाजसातौ नृषह्ये ॥
स्वर रहित पद पाठजुष्टः । मदाय । देवऽताते । इन्दो इति । परि । स्नुना । धन्व । सानौ । अव्ये । सहस्रऽधारः । सुऽरभिः । अदब्धः । परि । स्रव । वाजऽसातौ । नृऽसह्ये ॥ ९.९७.१९
ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 97; मन्त्र » 19
अष्टक » 7; अध्याय » 4; वर्ग » 14; मन्त्र » 4
Acknowledgment
अष्टक » 7; अध्याय » 4; वर्ग » 14; मन्त्र » 4
Acknowledgment
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
पदार्थः
(सहस्रधारः) अनन्तशक्तिरीश्वरः (सुरभिः, अदब्धः) केनापि अनभिभाव्यः (वाजसातौ) यज्ञे (नृषह्ये) मनुष्याणां तपोबलस्योन्नेतास्ति (अव्ये, सानौ) रक्षारूपस्य स्वरूपोच्चशिखरे (ष्णुना) स्वप्रवाहैः (इन्दो) हे परमात्मन् ! (परि धन्व, परि स्रव) अभितो भवान् आगत्य वर्धयतु, अन्यच्च सर्वतो रक्षतु, यतः (देवताते) विदुषां विस्तृतयज्ञे (मदाय) आनन्दस्य (जुष्टः) प्रीत्यानुभवितास्ति भवान् ॥१९॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
(सहस्रधारः) अनन्त शक्तियुक्त परमात्मा (सुरभिरदब्धः) किसी से न दबाये जानेवाला (वाजसातौ) यज्ञ में (नृषह्ये) जो मनुष्यों के तपोबल का वर्धक है और (अव्ये) सबका रक्षक है (सानौ) रक्षारूप उच्च शिखर पर (ष्णुना) अपने प्रवाह से (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! तुम (परि धन्व, परि स्रव) हमको चारों ओर से बढ़ाओ तथा सब ओर से रक्षा करो, क्योंकि आप (देवताते) विद्वानों के विस्तृत यज्ञ में (मदाय) आनन्द को (जुष्टः) प्रीति से सेवन करनेवाले हैं ॥१९॥
भावार्थ
जो लोग परमात्मपरायण होते हैं, परमात्मा उनकी सदैव रक्षा करता है ॥१९॥
विषय
उसके कर्त्तव्य।
भावार्थ
हे (इन्दो) सबके उपास्य, हे तेजस्विन्! ऐश्वर्यवन् ! तू (देव-ताते) विद्वानों द्वारा विस्तारित इस यज्ञ में (मदाय जुष्टः) अति हर्ष और आनन्द के लिये प्रेम द्वारा परिसेवित, उपासित होकर (अव्ये सानौ) प्रीतियोग्य, सर्वरक्षक, परमोच्च पद पर (स्नुना) मेघवत् आनन्द रस के प्रदान करने वाले रस से (परि धन्व) प्राप्त हो। तू (सहस्र-धारः) सहस्रों धाराओं से बरसने वाले मेघ के समान सहस्रों धारक शक्तियों वा धारा, वाणियों, व्यवस्था-नियमों से सम्पन्न होकर (सुरभिः) सुख से वा उत्तम रीति से कार्यों का आरम्भ करने वाला और (अदब्धः) अहिंसित होकर (नृ-सह्ये वाज-सातौ) मनुष्यों, नेताओं वा प्राणों द्वारा विजय करने योग्य इस जीवन-संग्राम वा ऐश्वर्य-प्राप्ति के कार्य में (परि स्रव) आगे बढ़।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः-१—३ वसिष्ठः। ४-६ इन्द्रप्रमतिर्वासिष्ठः। ७–९ वृषगणो वासिष्ठः। १०–१२ मन्युर्वासिष्ठः। १३-१५ उपमन्युर्वासिष्ठः। १६-१८ व्याघ्रपाद्वासिष्ठः। १९-२१ शक्तिर्वासिष्ठः। २२–२४ कर्णश्रुद्वासिष्ठः। २५—२७ मृळीको वासिष्ठः। २८–३० वसुक्रो वासिष्ठः। ३१–४४ पराशरः। ४५–५८ कुत्सः। पवमानः सोमो देवता ॥ छन्द:– १, ६, १०, १२, १४, १५, १९, २१, २५, २६, ३२, ३६, ३८, ३९, ४१, ४६, ५२, ५४, ५६ निचृत् त्रिष्टुप्। २-४, ७, ८, ११, १६, १७, २०, २३, २४, ३३, ४८, ५३ विराट् त्रिष्टुप्। ५, ९, १३, २२, २७–३०, ३४, ३५, ३७, ४२–४४, ४७, ५७, ५८ त्रिष्टुप्। १८, ४१, ५०, ५१, ५५ आर्ची स्वराट् त्रिष्टुप्। ३१, ४९ पादनिचृत् त्रिष्टुप्। ४० भुरिक् त्रिष्टुप्। अष्टापञ्चाशदृचं सूक्तम्॥
विषय
सुरभिः अदब्धः
पदार्थ
हे (इन्दो) = सोम ! (मदाय) = उल्लास की प्राप्ति के लिये सेवित हुआ हुआ तू (देवताते) = दिव्यगुणों का विस्तार करनेवाले (अव्ये) = रक्षकों में उत्तम पुरुष में (स्नुना:) = अपने प्रवाह से (सानो) = शिखर प्रदेश में, मस्तिष्क रूप द्युलोक में (परिधन्वः) = गतिवाला हो । वहाँ मस्तिष्क में ज्ञानाग्नि का तू ईंधन बन । (सहस्त्रधारः) = हजारों प्रकार से धारण करनेवाला, (सुरभिः) = जीवन को सुगन्धित व यशस्वी बनानेवाला, (अदब्धः) = रोगों व वासनाओं से हिंसित न हुआ हुआ तू नृषह्ये नरों द्वारा शत्रुओं का मर्षण करने योग्य (वाजसातौ) = शक्ति प्राप्ति के साधनभूत संग्राम में (परिस्त्रव) = हमारे शरीरों में चारों ओर गतिवाला हो । सुरक्षित सोम ही तो रोगों व वासनाओं का संहार करता है ।
भावार्थ
भावार्थ - शरीर में सुरक्षित सोम हमें अध्यात्म संग्राम में विजयी बनाये। ज्ञानाग्नि को दीप्त करे। हमारे जीवन को यशस्वी करे और उल्लासमय बनाये ।
इंग्लिश (1)
Meaning
O Soma, refulgent spirit of divinity, lover of joy and loved for the sake of joy, in yajna, pray flow, inspire and energise us on top of safety, security and prosperity with incessant stream of joy. Undaunted and invincible, let a thousand streams of ecstasy flow, let the breeze of fragrance blow, in the battle for victory worthy of brave humanity.
मराठी (1)
भावार्थ
जे लोक परमात्मपरायण असतात, परमात्मा त्यांचे सदैव रक्षण करतो. ॥१९॥
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
N/A
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
N/A
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
N/A
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
Shri Virendra Agarwal
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal