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यजुर्वेद अध्याय - 17

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  • यजुर्वेद - अध्याय 17/ मन्त्र 43
    ऋषिः - अप्रतिरथ ऋषिः देवता - इन्द्रो देवता छन्दः - निचृदार्षी त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः
    125

    अ॒स्माक॒मिन्द्रः॒ समृ॑तेषु ध्व॒जेष्व॒स्माकं॒ याऽइष॑व॒स्ता ज॑यन्तु। अ॒स्माकं॑ वी॒राऽउत्त॑रे भवन्त्व॒स्माँ२ऽउ॑ देवाऽअवता॒ हवे॑षु॥४३॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒स्माक॑म्। इन्द्रः॑। समृ॑ते॒ष्विति॒ सम्ऽऋ॑तेषु। ध्व॒जेषु॑। अ॒स्माक॑म्। याः। इष॑वः। ताः। ज॒य॒न्तु॒। अ॒स्माक॑म्। वी॒राः। उत्त॑र॒ इत्युत्ऽत॑रे। भ॒व॒न्तु॒। अ॒स्मान्। ऊँ॒ऽइत्यूँ॑। दे॒वाः॒। अ॒व॒त॒। हवे॑षु ॥४३ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अस्माकमिन्द्रः समृतेषु ध्वजेष्वस्माकँयाऽइषवस्ता जयन्तु । अस्माकँवीराऽउत्तरे भवन्त्वस्माँ उ देवाऽअवता हवेषु ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    अस्माकम्। इन्द्रः। समृतेष्विति सम्ऽऋतेषु। ध्वजेषु। अस्माकम्। याः। इषवः। ताः। जयन्तु। अस्माकम्। वीराः। उत्तर इत्युत्ऽतरे। भवन्तु। अस्मान्। ऊँऽइत्यूँ। देवाः। अवत। हवेषु॥४३॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 17; मन्त्र » 43
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह॥

    अन्वयः

    हे देवाः! विद्वांसो यूयमस्माकं समृतेषु ध्वजेष्वधोदेशे य इन्द्रोऽस्माकं या इषवः स ताश्च हवेषु जयन्त्वस्माकं वीरा उत्तरे भवन्तु, अस्मानु सर्वत्रावत॥४३॥

    पदार्थः

    (अस्माकम्) (इन्द्रः) ऐश्वर्यकारकः सेनेशः (समृतेषु) सम्यक् सत्यन्यायप्रकाशकचिह्नेषु (ध्वजेषु) स्ववीरप्रतीतये रथाद्युपरि स्थापितेषु विजातीयचिह्नेषु (अस्माकम्) (याः) (इषवः) प्राप्ताः सेनाः (ताः) (जयन्तु) विजयिन्यो भवन्तु (अस्माकम्) (वीराः) (उत्तरे) विजयानन्तरसमये कुशला विद्यमानजीवनाः (भवन्तु) (अस्मान्) (उ) वितर्के (देवाः) विजिगीषवः (अवत) रक्षत (हवेषु) ह्वयन्ति स्पर्द्धन्ते परस्परं येषु संग्रामेषु तेषु॥४३॥

    भावार्थः

    सेनाजनैः सेनापत्यादिभिः स्वस्वरथादिषु भिन्नं भिन्नं चिह्नं संस्थापनीयम्। यतोऽस्यायं रथादिरिति सर्वे जानीयुः, यथा वीराणामश्वानां चाधिकः क्षयो न स्यात्, तथानुष्ठातव्यम्। कुतः? परस्परस्य पराक्रमक्षयेण ध्रुवो विजयो न भवतीति विज्ञेयम्॥४३॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर भी वही विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

    पदार्थ

    हे (देवाः) विजय चाहने वाले विद्वानो! तुम (अस्माकम्) हम लोगों के (समृतेषु) अच्छे प्रकार सत्य-न्याय प्रकाश करानेहारे चिह्न जिनमें हों, उन (ध्वजेषु) अपने वीर जनों के निश्चय के लिये रथ आदि यानों के ऊपर एक-दूसरे से भिन्न स्थापित किये हुए ध्वजा आदि चिह्नों में नीचे अर्थात् उनकी छाया में वर्त्तमान जो (इन्द्रः) ऐश्वर्य्य करने वाला सेना का ईश और (अस्माकम्) हम लोगों की (याः) जो (इषवः) प्राप्त सेना हैं, वह इन्द्र और (ताः) वे सेना (हवेषु) जिनमें ईर्ष्या से शत्रुओं को बुलावें, उन संग्रामों में (जयन्तु) जीतें (अस्माकम्) हमारे (वीराः) वीर जन (उत्तरे) विजय के पीछे जीवनयुक्त (भवन्तु) हों (अस्मान्) हम लोगों की (उ) सब जगह युद्धसमय में (अवत) रक्षा करो॥४३॥

    भावार्थ

    सेनाजन और सेनापति आदि को चाहिये कि अपने अपने रथ आदि में भिन्न-भिन्न चिह्न को स्थापन करें, जिससे यह इसका रथ आदि है, ऐसा सब जानें और जैसे अश्व तथा वीरों का अधिक विनाश न हो, वैसा ढंग करें, क्योंकि परस्पर के पराक्रम के क्षय होने से निश्चल विजय नहीं होता, यह जानें॥४३॥

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    विषय

    वीरों को उत्तेजना ।

    भावार्थ

    ( ध्वजेषु ) रथों पर लगे झण्डों के ( समृतेषु ) उत्तम रीति से प्राप्त हो जाने पर ( अस्माकम् इन्द्रः ) हमारा शत्रुहन्ता नायक और ( याः अस्माकं इषवः ) जो हमारे बाण अर्थात् बाण आदि शस्त्रधारी योद्धा है ( ताः ) वे ( जयन्तु ) जीतें । ( अस्माकं वीराः ) हमारे वीर पुरुष युद्ध में ( उत्तरे भवन्तु ) ऊंचे होकर रहें। और ( देवाः ) विजयी पुरुष ( हवेषु ) संग्रामों में ( अस्मान् उ अवत ) हमारी ही रक्षा करें।

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    विषय

    आस्तिक मनोवृत्ति

    पदार्थ

    १. (ध्वजेषु समृतेषु) = ध्वजाओं व पताकाओं के ठीकरूप से प्राप्त कर लेने पर (अस्माकम्) = हम आस्तिक बुद्धिवालों का नियामक (इन्द्रः) = परमात्मा हो, अर्थात् हम प्रभु को अपना आश्रय मानकर चलें। 'ध्वजा' एक लक्ष्य का प्रतीक है जब हम एक लक्ष्य बनालें तब प्रभु को अपना आश्रय बनाकर अपने लक्ष्य की प्राप्ति में जुट जाएँ। संसार में प्रभु का आश्रय मनुष्य को कभी निरुत्साहित नहीं होने देता। आस्तिक मनुष्य सदा प्रभु को अपनाता है और किसी प्रकार से निरुत्साहित न होकर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता चलता है। २. (अस्माकम्) = हम आस्तिक्य वृत्तिवालों की (याः) = जो (इषवः) = प्रेरणाएँ हैं, अन्तःस्थित प्रभु से दिये जा रहे निर्देश हैं (ताः) = वे निर्देश और प्रेरणाएँ ही (जयन्तु) = जीतें । प्रभु की प्रेरणा होती है कि 'उष:काल हो गया, उठ बैठ क्या सो रहा है?' उसी समय एक इच्छा पैदा होती है कि 'कितनी मधुर वायु चल रही है, रात को नींद भी तो पूरी नहीं आई। दिन में अलसाते रहोगे, ज़रा सो ही लो।' सामान्यतः यह इच्छा उस प्रेरणा को दबा देती है और मनुष्य सोया रह जाता है। हम प्रभु से प्रार्थना करते हैं कि आपकी प्रेरणाए ही विजयी हों, हमारी इच्छाएँ नहीं । ३. (अस्माकम्) = हम आस्तिक वृत्तिवालों में (वीराः) = वीरत्व की भावनाएँ, न कि कायरता की वृत्ति (उत्तरे भवन्तु) = उत्कृष्ट हों, प्रबल हों। दबकर कोई कार्य करना मनुष्यत्व से गिरना है । हमारे कार्य वीरता का परिचय दें। ४. (देवाः) = हे देवो! (अस्मान्) = हम आस्तिकों को (हवेषु) = [आहवेषु] संग्रामों में [उ] = निश्चय से (अवत) = रक्षित करो। देव हमारे रक्षक हों। वस्तुतः [क] जब हम प्रभु में पूर्ण आस्था से चलेंगे, [ख] सदा अन्तःस्थ प्रभु की प्रेरणा को सुनेंगे, [ग] सदा वीरता के ही कार्य करेंगे तब देवताओं की रक्षा के पात्र क्यों न होंगे?

    भावार्थ

    भावार्थ - १. जीवन-लक्ष्य को ओझल न होने देते हुए हम प्रभु को अपना आश्रय समझें । २. हमारे जीवन में हृदयस्थ प्रभु की प्रेरणा की विजय हो, न कि हमारी इच्छा की। ३. हम सदा वीरतापूर्ण कार्य ही करें और ४. हम सदा अध्यात्म-संग्रामों में देवों की रक्षा के पात्र हों।

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    सेना व सेनापती इत्यादींनी आपापल्या रथ (वाहन) इत्यादींवर वेगवेगळे चिन्ह लावावे. त्यावरून प्रत्येकाच्या रथाचे वेगवेगळे चिन्ह कळू शकते, तसेच घोडे व वीर पुरुष यांचा अधिक नाश होता कामा नये, अशी रचना करावी. कारण परस्परांच्या पराक्रमाचा नाश झाल्यास स्थिर विजय प्राप्त होत नसतो हे जाणावे.

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    विषय

    पुन्हा तोच विषय –

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - हे (देवा:) विजयाची इच्छा करणाऱ्या (राष्ट्रातील) विद्वज्जनहो, तुम्ही (अस्माकम्‌) आम्हा (आम्हा सैनिकांना) (समृतोषु) सत्य आणि न्यायाचे प्रतीक असलेल्या चिन्हांनी अंकित असे (ध्वजेषु) ध्वज रथ आदी वाहनांवर लावा की ज्यायोगे आपल्या सैन्यातील वीर सैनिक आपल्या पक्षातील लोकांना शकतील (या चिन्हांनी अंकित ध्वज आणि यान आपल्या सरदाराचा आहे, हे सैनिक ओळखतील) आणि अशा ध्वजाखाली रथात वसलेला जो (इन्द्र:) आमचा ऐश्‍वर्यशाली सेनापती आहे (तो ही सरदारांना ओळखील) (अशा दृढ स्थितीत असतांना) (या:) जस (इषव:) आमच्या विविध सेना आहेत (स्थलसेना, वायुसेना, जलसेना) आणि सेनापती इन्द्र आहे, (ता:) ते सर्व (म्हणजे आम्ही व सेनापती) (हवेषु) शत्रूला युद्धाकरिता विश्‍वासाने आव्हान करू आणि शत्रूला (जयन्तु) जिंकू (अस्माकम्‌) आमच्यातील (वीरा:) सर्व वीरजन, (उत्तरे) विजयानंतर सुखी जीवन (भवन्तु) प्राप्त करो. हे विद्वज्जन हो, तुम्ही (उ) (युद्धणेत्रामधे) सर्वत्र (अस्मान्‌) आम्हां सैनिकांच्या (अरव) रक्षण करा (आपल्या बुद्धी, युक्ती, योजना आदीद्वारे आमच्या पाठीशी रहा ॥43॥

    भावार्थ

    भावार्थ - सैन्यातील अधिकारी (ब्रिगेडियर, कर्नल अथवा बटालियन व कंपनी) तसेच सेनापती या सर्वांसाठी आवश्‍यक आहे की त्यांनी आपल्या रथांवर भिन्न चिन्ह असलेले ध्वज लावावेत की ज्यायोगे हा रथ कोणाचा आहे, हे सैनिक ओळखू शकतील. या व्यतिरिक्त सर्वांनी अशी योजना वा व्यवस्था करावी की ज्यामुळे युद्धात आपल्या सैनिकांची, सैनिकदलाची अधिक प्राणहानी होऊ नये. कारण की आपल्या पक्षातील अधिक सैनिक युद्धात कामी आले, तर विजय मिळणे कठीण आहे. हे सर्वांनी जाणून असावे. ॥43॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    O learned persons desirous of victory, may the commander and our forces, under different flags, the emblems of justice and truth, win in the battle. May our brave men enjoy after war. May ye protect us everywhere at the time of war.

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    Meaning

    When the flags fly high and the battle rages, may our leader and commander, Indra, and our arms and arrows be victorious. May our valiant warriors win and live happy ever after. May the noble scholars and sages and the warriors and tacticians protect us through the challenges and battles of life and life’s values.

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    Translation

    When the flags assemble in the battlefield, may our armychief win; may those shafts win that are ours. May our warriors have an edge over the enemy; may the bounties of Nature protect us in battles, (1)

    Notes

    Samṛteşu, संगतेषु, having been assembled. Dhvajesu, flags, banners and ensigns of units ofthe armies. missiles. Işavaḥ, weapons that are thrown, generally arrows; spears; Uttare, having an upper hand (over the enemy). Havesu, आहवेषु संग्रामेषु, in the battles. ह्वयन्ति स्पर्धन्ते परस्परं येषु संग्रामेषु तेषु, in the battles where fighters challenge each other. Avatā,अवत, may you protect us.

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    बंगाली (1)

    विषय

    পুনস্তমেব বিষয়মাহ ॥
    পুনঃ সেই বিষয়কে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ।

    पदार्थ

    পদার্থঃ–হে (দেবাঃ) বিজয়কামী বিদ্বান্গণ! তোমরা (অস্মাকম্) আমাদিগের (সমৃতেষু) উত্তম প্রকার সত্য ন্যায় প্রকাশকারী চিহ্ন যন্মধ্যে হয় সেই সব (ধবজেষু) স্বীয় বীরগণের নিশ্চয় হেতু রথাদি যানসমূহের উপর একে অপরের হইতে ভিন্ন স্থাপিত ধ্বজাদি চিহ্নে নিম্নে অর্থাৎ তাহাদের ছায়ায় বর্ত্তমান যে (ইন্দ্রঃ) ঐশ্বর্য্যকারী সেনার ঈশ এবং (অস্মাকম্) আমাদিগের (য়াঃ) যে (ইষবঃ) প্রাপ্ত সেনা সেই ইন্দ্র এবং (তাঃ) সেই সেনাগুলি (হবেষু) যন্মধ্যে ঈর্ষাপূর্বক শত্রুদিগকে আহ্বান করে সেই সব সংগ্রামে (জয়ন্ত) জয়লাভ করুক (অস্মাকম্) আমাদের (বীরাঃ) বীরগণ (উত্তরে) বিজয়ের পশ্চাতে জীবনযুক্ত (ভবন্তু) হউক, (অস্মান্) আমাদিগের (উ) সর্বত্র যুদ্ধ সময়ে (অবত) রক্ষা কর ॥ ৪৩ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ–সেনাগণ এবং সেনাপতি আদির উচিত যে, নিজ নিজ রথাদিতে ভিন্ন ভিন্ন চিহ্ন স্থাপন করুক যাহাতে ইহা ইহার রথ এইরূপ সকলে জানিবে এবং যেমন অশ্ব তথা বীরদের অধিক বিনাশ না হয় সেইরূপ কৌশল করিবে কেননা পরস্পরের পরাক্রম ক্ষয় হওয়ায় নিশ্চল বিজয় হয় না–ইহা জানিবে ॥ ৪৩ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    অ॒স্মাক॒মিন্দ্রঃ॒ সমৃ॑তেষু ধ্ব॒জেষ্ব॒স্মাকং॒ য়াऽইষ॑ব॒স্তা জ॑য়ন্তু ।
    অ॒স্মাকং॑ বী॒রাऽউত্ত॑রে ভবন্ত্ব॒স্মাঁ২ऽউ॑ দেবাऽঅবতা॒ হবে॑ষু ॥ ৪৩ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    অস্মাকমিত্যস্যাপ্রতিরথ ঋষিঃ । ইন্দ্রো দেবতা । নিচৃদার্ষী ত্রিষ্টুপ্ ছন্দঃ ।
    ধৈবতঃ স্বরঃ ॥

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