यजुर्वेद - अध्याय 17/ मन्त्र 50
ऋषिः - अप्रतिरथ ऋषिः
देवता - अग्निर्देवता
छन्दः - विराडार्ष्यनुष्टुप्
स्वरः - गान्धारः
138
उदे॑नमुत्त॒रां न॒याग्ने॑ घृतेनाहुत। रा॒यस्पोषे॑ण॒ सꣳसृ॑ज प्र॒जया॑ च ब॒हुं कृ॑धि॥५०॥
स्वर सहित पद पाठउत्। ए॒न॒म्। उ॒त्त॒रामित्यु॑त्ऽत॒राम्। न॒य॒। अग्ने॑। घृ॒ते॒न॒। आ॒हु॒तेत्या॑ऽहुत। रा॒यः। पोषे॑ण। सम्। सृ॒ज॒। प्र॒जयेति॑ प्र॒ऽजया॑। च॒। ब॒हुम्। कृ॒धि॒ ॥५० ॥
स्वर रहित मन्त्र
उदेनमुत्तरान्नयाग्ने घृतेनाहुत रायस्पोषेण सँ सृज प्रजया च बहुङ्कृधि ॥
स्वर रहित पद पाठ
उत्। एनम्। उत्तरामित्युत्ऽतराम्। नय। अग्ने। घृतेन। आहुतेत्याऽहुत। रायः। पोषेण। सम्। सृज। प्रजयेति प्रऽजया। च। बहुम्। कृधि॥५०॥
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह॥
अन्वयः
हे घृतेनाहुताग्ने सेनापते! त्वमेनमुत्तरामुन्नय रायस्पोषेण संसृज प्रजया च बहुं कृधि॥५०॥
पदार्थः
(उत्) (एनम्) विजेतारम् (उत्तराम्) उत्कृष्टतया तरन्ति यया सेनया तां प्राप्तिविजयाम् (नय) (अग्ने) प्रकाशमय (घृतेन) आज्येन (आहुत) तृप्तिं प्राप्त (रायः) राज्यश्रियः (पोषेण) पोषेणेन (सम्) सम्यक् (सृज) योजय (प्रजया) बहुसन्तानैः (च) (बहुम्) अधिकं कर्म (कृधि) कुरु॥५०॥
भावार्थः
यः सेनाधिकारी भृत्यो वा धर्म्येण युद्धेन दुष्टान् विजयेत, तं सभासेनापतयो धनादिना बहुधा सत्कुर्युः॥५०॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर भी उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥
पदार्थ
हे (घृतेन) घृत से (आहुत) तृप्ति को प्राप्त हुए (अग्ने) प्रकाशयुक्त सेनापति तू (एनम्) इस जीतने वाले वीर को (उत्तराम्) जिससे उत्तमता से संग्राम को तरें, विजय को प्राप्त हुई उस सेना को (उत्, नय) उत्तम अधिकार में पहुंचा (रायः, पोषेण) राजलक्ष्मी की पुष्टि से (सम्, सृज) अच्छे प्रकार युक्त कर (च) और (प्रजया) बहुत सन्तानों से (बहुम्) अधिकता को प्राप्त (कृधि) कर॥५०॥
भावार्थ
जो सेना का अधिकारी वा भृत्य धर्मयुक्त युद्ध से दुष्टों को जीते, उसका सभा, सेना के पति धनादिकों से बहुत प्रकार सत्कार करें॥५०॥
विषय
सेनापति का राजा के प्रति कर्तव्य ।
भावार्थ
हे ( घृतेन ) तेज से या शस्त्रों के सञ्चालन रूप पराक्रम से ( आहुत ) प्रदीप्त ! ( अग्ने ) अग्रणी ! सेना नायक ! ( एनम् ) इस राष्ट्र और राष्ट्रपति को तू ( उत्नय ) ऊंचे पत्रपर बैठा और ( उत् तराम् नय ) और अन्यों से भी अधिक उच्चपद या प्रतिष्ठा पर प्राप्त करा । इसको ( रायः पोषेण ) ऐश्वर्य की वृद्धि से ( संसृज ) युक्त कर। ( प्रजया च ) और प्रजा से ( बहु कृधि ) बहुत, बहुतसे वीर पुरुषों से युक्त, बड़े समुदाय का स्वामी बना दे ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अग्निर्देवता । विराडार्षी आर्ष्यनुष्टुप् । गान्धारः ॥
विषय
उत्कर्ष की प्राप्ति
पदार्थ
१. (एनम्) = गत मन्त्र के अनुसार ब्रह्मरूप कवच के धारण करनेवाले और सोम-रक्षा से अपने को अमर बनानेवाले को (उत्) = इन प्राकृतिक भोगों से ऊपर उठाकर [उत्=out] (उत्तराम्) = [अतिशयेन उत्= उत्तराम्] उत्कृष्टत्व को, उत्कृष्ट ऐश्वर्य को (नय) = प्राप्त कराइए । २. (अग्ने) = सब उत्कर्षो के प्रापक हे प्रभो। (घृतेन) = मलों के क्षरण [घृ-क्षरण] व ज्ञान की दीप्ति से (आहुत) [हूयमान] = जिसके प्रति अपना अर्पण किया गया है, ऐसे प्रभो! आप इस 'ब्रह्म कवची, सोम-रक्षक' को उत्कर्ष की ओर ले चलिए । प्रभु के प्रति अपना अर्पण करने का अभिप्राय है—' अपने जीवन में से मलों को दूर करना और ज्ञान को खूब दीप्त करना'। निर्मल व ज्ञानी बनकर हम प्रभु के सच्चे उपासक बनते हैं। प्रभु का सच्चा उपासक बनने पर वे प्रभु हमारा उद्धार करते हैं। हम प्रकृति के हीन भोगों से ऊपर उठकर उत्कृष्ट ऐश्वर्य को प्राप्त करनेवाले बनते हैं । ३. हे प्रभो! आप इस उपासक को (रायस्पोषेण संसृज) = संसार - यात्रा को चलाने के लिए आवश्यक धन के पोषण से संसृष्ट कीजिए। यह इतना धन अवश्य प्राप्त करे कि परिवार को, अपने को तथा आये गये को उत्तमता से पाल सके और सामाजिक कार्यों में भी उचित सहयोग दे पाये ४. (च) = और हे प्रभो! आप इस आपकी शरण में आये हुए को (प्रजया) = उत्तम सन्तान से (बहुम्) = [बृंहते वर्धते] खूब वृद्धि को प्राप्त हुआ हुआ, समाज में बढ़े हुए नामवाला, अर्थात् यशस्वी (कृधि) = कीजिए। इसकी सन्तान ऐसी उत्तम हो कि इसका यश चारों ओर फैले। यह यशस्वी सन्तानवाला हो ।
भावार्थ
भावार्थ - १. प्रभु को अपना कवच बनानेवाला व्यक्ति वासनाओं को जीतकर उत्कर्ष प्राप्त करता है। २. उत्तम धन का संचय करनेवाला होता है । ३. और अपनी सन्तान से यशस्वी बनता है।
मराठी (2)
भावार्थ
जो सेनेचा अधिकारी किंवा सैनिक धर्मयुद्धाने दुष्टांना जिंकतो त्याचा सभा व सेनापती यांनी धन इत्यादीद्वारे चांगल्या प्रकारे सन्मान करावा.
विषय
पुनश्च, तोच विषय -
शब्दार्थ
शब्दार्थ - (घृतेन, आहुत) घृत आदी पौष्टिक पदार्थांच्या सेवनामुळे तृप्त व बलवान, अशा हे (अग्ने) कीर्तिमंत सेनापती, आपण (एनम्) या विजयी वीराला तसेच (उत्तराम्) युद्धात उत्तमरीत्या विजय संपादन केलेल्या सेनेला (उत्, नय) अधिक उत्कर्षाप्रत न्या (त्यांना पदोन्नती, पुरस्कार आदीद्वारे उत्साहित करा) तसेच (राय: पोषण) राज्याच्या कोषामधून यांना धन आदी देऊन (सम्, सृज) तृप्त व पुष्ट करा (च) आणि अशाप्रकारे प्रजया यांच्या संतानांद्वारे (पुष्ट करा) (च) आणि अशाप्रकारे (प्रजया) यांच्या संतानांद्वारे (बहुम्) अधिक वीररत्व (कृधि) गाजविण्यासाठी त्यांनादेखील (कृधि) प्रोत्साहित करा. (सैनिकांच्या मुला-बाळांमधे देखील वीरत्वभाव जागृत करा) ॥50॥
भावार्थ
भावार्थ - सैन्यातील जो सेनाधिकारी, सैनिक वा सेवक धर्म वा नीतीप्रमाणे युद्ध करून शत्रू विजय संपादित करील, सेनापतीने धन आदी देऊन त्यांचा गौरव केला पाहिजे ॥50॥
इंग्लिश (3)
Meaning
O Commander of the army, well satisfied with ghee, lead this conquering hero to a high position ; vouchsafe him growth of riches and multiply his progeny.
Meaning
Agni, lord of life and progress, invoked and worshipped with libations of ghee and fragrant materials, take this yajamana, ruler, victor, to higher and higher states of honour and glory. Bless him with the wealth of life and good health. Let him rise and grow with a good family and noble children.
Translation
O fire-divine, to whom butter has been offered, may you promote this sacrificer to a higher position. Grant him riches and nourishment. Bless him with numerous offsprings. ( 1)
बंगाली (1)
विषय
পুনস্তমেব বিষয়মাহ ॥
পুনঃ সেই বিষয়কে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ।
पदार्थ
পদার্থঃ–হে (ঘৃতেন, আহুত) ঘৃত হইতে তৃপ্তি প্রাপ্ত (অগ্নে) প্রকাশযুক্ত সেনাপতি তুমি (এনম্) এই জয়লাভকারী বীরকে (উত্তরাম্) যাহার দ্বারা উত্তমতা পূর্বক সংগ্রামে উত্তীর্ণ হও, বিজয় প্রাপ্ত সেই সেনাকে (ঊৎ, নয়) উত্তম অধিকারে পৌঁছাইয়া (রায়ঃ, পোষেণ) রাজলক্ষ্মীর পুষ্টি দ্বারা (সম্, সৃজ) উত্তম প্রকার যুক্ত কর (চ) এবং (প্রজয়া) বহু সন্তান দ্বারা (বহুম্) আধিক্য প্রাপ্ত (কৃধি) কর ॥ ৫০ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ–যে সেনার অধিকারী বা ভৃত্য ধর্মযুক্ত যুদ্ধ দ্বারা দুষ্টদিগকে বিজয় করিবে তাহাকে সভা সেনাপতি ধনাদি দ্বারা বহু প্রকার সৎকার করিবে ॥ ৫০ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
উদে॑নমুত্ত॒রাং ন॒য়াগ্নে॑ ঘৃতেনাহুত ।
রা॒য়স্পোষে॑ণ॒ সꣳ সৃ॑জ প্র॒জয়া॑ চ ব॒হুং কৃ॑ধি ॥ ৫০ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
উদেনমিত্যস্যাপ্রতিরথ ঋষিঃ । অগ্নির্দেবতা । বিরাডার্ষ্যনুষ্টুপ্ ছন্দঃ ।
গান্ধারঃ স্বরঃ ॥
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
N/A
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
N/A
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
N/A
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
N/A
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal