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यजुर्वेद अध्याय - 12

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  • यजुर्वेद - अध्याय 12/ मन्त्र 108
    ऋषिः - पावकाग्निर्ऋषिः देवता - अग्निर्देवता छन्दः - निचृत् पङ्क्तिः स्वरः - पञ्चमः
    58

    ऊर्जो॑ नपाज्जातवेदः सुश॒स्तिभि॒र्मन्द॑स्व धी॒तिभि॑र्हि॒तः। त्वेऽइषः॒ संद॑धु॒र्भूरि॑वर्पसश्चि॒त्रोत॑यो वा॒मजा॑ताः॥१०८॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ऊर्जः॑। न॒पा॒त्। जा॒त॒वे॒द॒ इति॑ जातऽवेदः। सु॒श॒स्तिभि॒रिति॑ सुश॒स्तिऽभिः॑। मन्द॑स्व। धी॒तिभि॒रिति॑ धी॒तिऽभिः॑। हि॒तः। त्वेऽइति॒ त्वे। इषः॑। सम्। द॒धुः॒। भूरि॑वर्पस॒ इति भूरि॑ऽवर्पसः। चि॒त्रोत॑य॒ इति॑ चि॒त्रऽऊ॑तयः। वा॒मजा॑ता॒ इति॑ वा॒मऽजा॑ताः ॥१०८ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    ऊर्जा नपाज्जातवेदः सुशस्तिभिर्मन्दस्व धीतिभिर्हितः । त्वेऽइषः सन्दधुर्भूरिवर्पसश्चित्रोतयो वामजाताः ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    ऊर्जः। नपात्। जातवेद इति जातऽवेदः। सुशस्तिभिरिति सुशस्तिऽभिः। मन्दस्व। धीतिभिरिति धीतिऽभिः। हितः। त्वेऽइति त्वे। इषः। सम्। दधुः। भूरिवर्पस इति भूरिऽवर्पसः। चित्रोतय इति चित्रऽऊतयः। वामजाता इति वामऽजाताः॥१०८॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 12; मन्त्र » 108
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    मातापितृसन्तानाः कीदृशा भवेयुरित्याह॥

    अन्वयः

    हे जातवेदस्तनय! यस्मिँस्त्वे त्वयि भूरिवर्पसश्चित्रोतयो वामजाता मात्रादयोऽध्यापिका इषः संदधुः, स सुशस्तिभिर्धीतिभिराहूतस्त्वम् ऊर्ज्जो नपाद्धितः सदा मन्दस्व॥१०८॥

    पदार्थः

    (ऊर्जः) पराक्रमस्य (नपात्) न विद्यते पातो धर्मात् पतनं यस्य सः (जातवेदः) जातप्रज्ञान जातवित्त (सुशस्तिभिः) शोभनाभिः प्रशंसाभिः क्रियाभिः सह (मन्दस्व) आनन्द (धीतिभिः) स्वाङ्गुलीभिः, धीतय इत्यङ्गुलिनामसु पठितम्॥ (निघं॰२.५) (हितः) सर्वस्य हितं दधन् (त्वे) त्वयि (इषः) अन्नादीनि (सम्) (दधुः) दधतु (भूरिवर्पसः) बहूनि प्रशंसनीयानि वर्पांसि रूपाणि यासु ताः। वर्प इति रूपनामसु पठितम्॥ (निघं॰३.७) (चित्रोतयः) चित्रा आश्चर्य्यवद् रक्षणाद्याः क्रिया यासु ताः (वामजाताः) वामेषु प्रशस्येषु कर्मसु वा जाताः प्रसिद्धाः, वाम इति प्रशस्यनामसु पठितम्॥ (निघं॰३.८)। [अयं मन्त्रः शत॰७.३.१.३१ व्याख्यातः]॥१०८॥

    भावार्थः

    येषां कुमाराणां कुमारीणां मातरो विद्याप्रिया विदुष्यः सन्ति, त एव सततं सुखमाप्नुवन्ति। यासां मातॄणां येषां पितॄणां चापत्यानि विद्यासुशिक्षाब्रह्मचर्य्यैः शरीरात्मबलयुक्तानि धर्माचारीणि सन्ति, त एव सदा सुखिनः स्युः॥१०८॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    माता-पिता और पुत्र कैसे हों, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

    पदार्थ

    हे (जातवेदः) बुद्धि और धन से युक्त पुत्र! जिस (त्वे) तुझ में (भूरिवर्पसः) बहुत प्रशंसा के योग्य रूपों से युक्त (चित्रोतयः) आश्चर्य के तुल्य रक्षा आदि कर्म्म करने वाली (वामजाताः) प्रशंसा के योग्य कुलों वा कर्मों में प्रसिद्ध विद्याप्रिय अध्यापिका माता आदि विदुषी स्त्रियां (इषः) अन्नों को (संदधुः) धरें, भोजन करावें, सो तू (सुशस्तिभिः) उत्तम प्रशंसायुक्त क्रियाओं के साथ (धीतिभिः) अङ्गुलियों से बुलाया हुआ (ऊर्जः) (नपात्) धर्म के अनुकूल पराक्रमयुक्त सब के (हितः) हित को धारण सदा किये हुए (मन्दस्व) आनन्द में रह॥१०८॥

    भावार्थ

    जिन कुमार और कुमारियों की माता विद्याप्रिय विदुषी हों, वे ही निरन्तर सुख को प्राप्त होते हैं, और जिन माता-पिताओं के सन्तान विद्या, अच्छी शिक्षा और ब्रह्मचर्य्य सेवन से शरीर और आत्मा के बल से युक्त धर्म का आचरण करने वाले हैं, वे ही सदा सुखी हों॥१०८॥

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    विषय

    राजा प्रजा का परस्पर पोषण।

    भावार्थ

    ( ऊर्जः नपात् ) अपने बल और पराक्रम को कभी धर्म- मार्ग से न गिरने देनेवाले ! हे ( जातवेदः ) विद्वन्, ऐश्वर्यवान् ! राजन् ! तू ( सुशस्तिभिः) उत्तम शासन क्रियाओं से और मुख्यातियों से ( धीतिभिः ) अंगुलियों के समान अग्रगामी धारण शक्तियों से ( हितः ) प्रजा का हितकारी एवं सुस्थापित होकर ( मन्दस्व ) सुप्रसन्न हो । ( ये ) तुझ में ( भूरि वर्पसः ) नाना धन, गौ आदि पशु, नाना रूप के ऐश्वर्यों से युक्त ( चित्रोतयः ) वित्त और विविध रक्षा साधनों से सुरक्षित ( वाम जाताः उत्तम वंशों में उत्पन्न हुई प्रजाएं ( इषः संदधुः ) अन्न आदि भोग्य पदार्थ प्रदान करें । शत० ७ । ३ । १ । ३१ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋष्यादि पूर्ववत्।

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    विषय

    पावकाग्नि का प्रभु-स्तवन

    पदार्थ

    १. पावकाग्नि प्रभु का स्तवन करता हुआ कहता है कि (ऊर्जः नपात्) = हे प्रभो! आप मेरे बल व प्राणशक्ति को न गिरने देनेवाले हैं। आपकी कृपा से ही मेरी शक्ति स्थिर रहती है। आपका विस्मरण मुझे विषय-प्रवण व क्षीणशक्ति कर देता है। २. (जातवेद:) = हे प्रभो! सम्पूर्ण ज्ञान आपसे ही उत्पन्न होता है। मुझमें भी जो ज्ञान का लवलेश है, वह आपकी ही कृपा से है । ३. (सुशस्तिभिः) = उत्तम शंसनों के द्वारा-उत्तम स्तुति के द्वारा तथा (धीतिभिः) = ध्यान के द्वारा 'चित्तवृत्तिनिरोध' के द्वारा हितः = हृदय में स्थापित हुए हुए आप (मन्दस्व) = [मन्दयस्व] हमारे जीवनों को उल्लासमय कीजिए। आपकी कृपा ही मेरे सब कष्टों को दूर करके मेरे = अपनी जीवन में हर्ष को अंकुरित करनेवाली होगी। ४. हे प्रभो! जो भी व्यक्ति (त्वे) = आपमें (इषः) = इच्छाओं को (सन्दधुः) = धारण करते हैं, अर्थात् आपकी प्राप्ति ही जिनकी प्रबल कामना हो जाती है, वे [क] (भूरिवर्पसः) = [वर्पन् = form] बहुत आकृतियोंवाले होते हैं, अर्थात् वे अपने में बहुतों का समावेश करनेवाले- औरों से अपृथक् [अयुतोऽहम् ] होते हैं। यजुर्वेद के प्रथम मन्त्र के उपदेश के अनुसार 'बह्वीः' बहुत बनते हैं, एक नहीं रह जाते। स्वार्थ से ऊपर उठ परार्थ में स्थित होते हैं, इसीलिए [वर्पन् praise] बड़े यशवाले होते हैं- इनका जीवन उत्तम कर्मोंवाला होकर परार्थ व यज्ञ का साधक होकर यशस्वी बनता है। [ख] (चित्रोतयः) = ये अद्भुत रक्षणवाले होते हैं-वासनाओं से आश्चर्यजनकरूप में अपनी रक्षा करते हैं। अथवा चित्र [चिती संज्ञाने ] ज्ञान के द्वारा अपनी रक्षा करनेवाले बनते हैं तथा [ग] वामजातः = [ वामेषु प्रशस्तकर्मसु जाताः प्रसिद्धाः] उत्तम कर्मों में प्रसिद्ध होते हैं। इनके जीवन से सदा उत्तम ही कर्म होते हैं। इनके जीवन में सब वस्तुएँ सुन्दर-ही- सुन्दर होती हैं।

    भावार्थ

    भावार्थ- हम प्रभु-स्तुति व ध्यान से अपने हृदयों में प्रभु की प्रतिष्ठा करें, तब १. हम अक्षीणशक्ति बनेंगे । २. हमारा ज्ञान बढ़ेगा। ३. हम एक-से बहुत हो जाएँगे अथवा प्रशंसात्मक कर्मों को ही करेंगे। ४. ज्ञान के द्वारा अपने को वासनाओं के आक्रमण से सुरक्षित कर पाएँगे तथा ५. हमारे जीवनों में सब वस्तुएँ सुन्दर-ही-सुन्दर होंगी।

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    ज्या मुला-मुलींची माता विद्याप्रिय व विदुषी असेल ते नेहमी सुखी असतात. ज्या माता-पित्याची संताने विद्या, उत्तम शिक्षण व ब्रह्मचर्य यांनी शरीर, आत्मा यांचे बल वाढवून धर्माचरण करतात तीच नेहमी सुखी होतात.

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    विषय

    माता-पिता आणि पुत्र कसे असावेत, याविषयी पुढील मंत्रात सांगितले आहे -

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - हे (जातवेद:) बुद्धिमान आणि धनवान पुत्र, (भूरिवर्पस:) अतिप्रशंसनीय रुपवती (चित्रोतय:) आणि अति अद्भुत श्रेष्ठकर्म व आचरण करणाऱ्या (वामजाता:) कीर्तीमान वंशात उत्पन्न, विद्याप्रिय, अध्यापिका, माता आदी स्त्रिया (त्वे) तुझ्यासाठी (इष:) उत्तम अन्न (संदधु:) तयार करतात आणि तुला खाऊ घालतात. त्यामुळे तू देखील (सुशस्तीभि:) आपल्या प्रशंसनीय आचरणाद्वारा (त्यांना आनंदित कर) (धीतिभि:) अंगुली-संकेताद्वारे बोलावल्यानंतर तू जा (त्यांच्या आज्ञेचे पालन कर) (ऊर्ज:) (नपात्‌) धर्मानुकूल आचरण करीत सर्वांचे हित करीत तू सदा (भन्दस्व) आनंदात रहा ॥108॥

    भावार्थ

    भावार्थ - ज्या बालक-बालिकांचे माता-पिता विद्याप्रिय विद्वान असातात, ते सदा सुखी राहतात तसेच ज्या आई-वडिलांची मुलें विद्या प्राप्त करून ब्रह्मचर्य पालनाद्वारे शारीरिक व आत्मिक शक्तीची वृद्धीकरून धर्माप्रमाणे आचरण करतात, ते आईवडील सदा सुखी राहतात ॥108॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    O son, imbued with wisdom and wealth, to thee, the learned teachress and the mother nobly born, doing wondrous deeds for thy protection, and master of admirable qualities, give food to eat. Rejoice thyself, always occupied with thy own praiseworthy hands in serving others, and never swerving from the path of rectitude.

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    Meaning

    Agni, child and protector of energy, lord of wealth and intelligence, lover and well-wisher of all, invoked, lighted and raised with devotion and hymns of praise, receive the libations, rejoice and grow. People of various hue, wonderfully favoured and secure in life, children of love and beauty, and sweet and dear by nature, offer food to you for growth and development. (As fire is invoked with love and devotion and fed with libations, so should the child be fed, nourished and helped to grow by parents and teachers with all the love and faith at their command so that the child not only lives and learns but also rejoices while he/she lives and learns. )

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    Translation

    O omniscient, maintainer of strength, established with good actions, rejoice with our praises. In you are treasured foods of various kinds, protective in wonderful ways and of the finest strain. (1)

    Notes

    Urjo napat,ऊर्जं बलं न पातयतीति ऊर्जो नपात् maintainer of strength. Or, ऊर्क् शब्देन आप उच्यंते नपात् शब्देन च पौत्र:, urk is water and napát is grandson; fire is considered to ы the grandson of waters, because waters produce vegetation (wood) and vegetation produces fire. (Uvata). Jatavedah, जातं जातं वेत्ति इति जातवेद:опе that knows everything born or created; जात: वेद: अस्य वा जात-प्रज्ञान:, one who has got knowledge (of reality); omniscient. Dhitibhih, कर्मभि: with (good) actions. Bhürivarpasah, वर्प इति रूपनाम, of various forms or kinds. Citrotayah, that protect in wonderful ways. Vamajatah, वामं संभजनीयं जन्म येषां, those which have been produced in a praiseworthy way, i. e. of fine strain.

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    बंगाली (1)

    विषय

    মাতাপিতৃসন্তানাঃ কীদৃশা ভবেয়ুরিত্যাহ ॥
    মাতা-পিতা ও পুত্র কেমন হইবে এই বিষয়ের উপদেশ পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ- হে (জাতবেদাঃ) বুদ্ধি ও ধনযুক্ত পুত্র ! যে (ত্বা) তোমাতে (ভূরিবর্পসঃ) বহু প্রসংসাযোগ্য রূপ যুক্ত (চিত্রোতয়ঃ) আশ্চর্য্যতুল্য রক্ষাদি কর্ম্মকারিণী (বামজাতাঃ) প্রশংসার যোগ্য কুল বা কর্মে প্রসিদ্ধ বিদ্যাপ্রিয় অধ্যাপিকা মাতা-পিতা বিদুষী স্ত্রীগণ (ইষঃ) অন্নকে (সংদধু) ধরিবে ভোজন করাইবে সুতরাং তুমি (সুশস্তিভিঃ) উত্তম প্রশংসাযুক্ত ক্রিয়া সহ (ধীতিভিঃ) অঙ্গুলি দ্বারা আহ্বায়িত (ঊর্জঃ) (নপাৎ) ধর্মানুকূল পরাক্রমযুক্ত (হিতঃ) সকলের হিতকে ধারণ করিয়া সর্বদা (মন্দস্ব) আনন্দে থাকিবে ॥ ১০৮ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ- যে কুমার ও কুমারীদিগের মাতা বিদ্যাপ্রিয় হইবে তাহারা নিরন্তর সুখ প্রাপ্ত হয় এবং যে সব মাতা-পিতাদের সন্তান বিদ্যা, সুশিক্ষা ও ব্রহ্মচর্য্য সেবন দ্বারা শরীর ও আত্মার বলযুক্ত আচরণকারী, তাহারাই সর্বদা সুখী হয় ॥ ১০৮ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    ঊর্জো॑ নপাজ্জাতবেদঃ সুশ॒স্তিভি॒র্মন্দ॑স্ব ধী॒তিভি॑র্হি॒তঃ ।
    ত্বেऽইষঃ॒ সং দ॑ধু॒র্ভূরি॑বর্পসশ্চি॒ত্রোত॑য়ো বা॒মজা॑তাঃ ॥ ১০৮ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ঊর্জো নপাদিত্যস্য পাবকাগ্নির্ঋষিঃ । অগ্নির্দেবতা । নিচৃৎ পংক্তিশ্ছন্দঃ ।
    পঞ্চমঃ স্বরঃ ॥

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