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यजुर्वेद अध्याय - 12

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  • यजुर्वेद - अध्याय 12/ मन्त्र 83
    ऋषिः - भिषगृषिः देवता - वैद्या देवताः छन्दः - निचृदनुष्टुप् स्वरः - गान्धारः
    87

    इष्कृ॑ति॒र्नाम॑ वो मा॒ताथो॑ यू॒यꣳ स्थ॒ निष्कृ॑तीः। सी॒राः प॑त॒त्रिणी॑ स्थन॒ यदा॒मय॑ति॒ निष्कृ॑थ॥८३॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इष्कृ॑तिः। नाम॑। वः॒। मा॒ता। अथो॒ऽइत्यथो॑। यू॒यम्। स्थ॒। निष्कृ॑तीः। निष्कृ॑ती॒रिति॒ निःऽकृ॑तीः। सी॒राः। प॒त॒त्रिणीः॑। स्थ॒न॒। यत्। आ॒मय॑ति। निः। कृ॒थ॒ ॥८३ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इष्कृतिर्नाम वो माताथो यूयँ स्थ निष्कृतीः । सीराः पतत्रिणी स्थन यदामयति निष्कृथ ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    इष्कृतिः। नाम। वः। माता। अथोऽइत्यथो। यूयम्। स्थ। निष्कृतीः। निष्कृतीरिति निःऽकृतीः। सीराः। पतत्रिणीः। स्थन। यत्। आमयति। निः। कृथ॥८३॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 12; मन्त्र » 83
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    संस्कृत (1)

    विषयः

    सुसेविता ओषधयः किं कुर्वन्तीत्याह॥

    अन्वयः

    हे मनुष्याः! यूयं या व इष्कृतिर्मातेवौषधिर्नाम वर्त्तते, तस्याः सेवका इवौषधीः सेवितारः स्थ। पतत्रिणीः सीराः नद्य इव निष्कृतीः सम्पादयन्तः स्थनाथो यदाऽऽमयति तान्निष्कृथ॥८३॥

    पदार्थः

    (इष्कृतिः) निष्कर्त्री (नाम) प्रसिद्धम् (वः) युष्माकम् (माता) जननीव (अथो) (यूयम्) (स्थ) भवत (निष्कृतीः) प्रत्युपकारान् (सीराः) नदीः। सीरा इति नदीनामसु पठितम्॥ (निघं॰१.१३) (पतत्रिणीः) पतितुं गन्तुं शीलाः (स्थन) भवत (यत्) या क्रिया (आमयति) रोगयति (निः) नितराम् (कृथ) कुरुत, अत्र विकरणस्य लुक्॥८३॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे मनुष्याः! यथा मातापितरौ युष्मान् सेवन्ते, तथा यूयमप्येतान् सेवध्वम्। यद्यत्कर्म रोगाविष्करं भवति तत्तत् त्यजत। एवं सुसेविता ओषधयः प्राणिनो मातृवत् पोषयन्ति॥८३॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    अच्छे प्रकार सेवन की हुई ओषधी क्या करती हैं। यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

    पदार्थ

    हे मनुष्यो! (यूयम्) तुम लोग जो (वः) तुम्हारी (इष्कृतिः) कार्य्यसिद्धि करने हारी (माता) माता के समान ओषधी (नाम) प्रसिद्ध है, उसकी सेवा के तुल्य सेवन की हुई ओषधियों को जानने वाले (स्थ) होओ (पतत्रिणीः) चलने वाली (सीराः) नदियों के समान (निष्कृतीः) प्रत्युपकारों को सिद्ध करने वाले (स्थन) होओ। (अथो) इसके अनन्तर (यत्) जो क्रिया वा ओषधी अथवा वैद्य (आमयति) रोग बढ़ावे, उसको (निष्कृथ) छोड़ो॥८३॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे माता-पिता तुम्हारी सेवा करते हैं, वैसे तुम भी उनकी सेवा करो। जो-जो काम रोगकारी हो, उस-उस को छोड़ो। इस प्रकार सेवन की हुई ओषधी माता के समान प्राणियों को पुष्ट करती है॥८३॥

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    भावार्थ

    हे ओषधियो ! ( वः माता ) तुम्हारी माता ( इष्कृतिः ) 'इष्कृति' नाम से प्रसिद्ध है । अर्थात् तुम्हारी 'माता' निर्माणकारिणी शक्ति 'इष्कृति' अर्थात् 'इष् अन्न के समान पुष्ट करने वाली हैं, अथवा तुम्हारी ( माता ) निर्माण कर्त्री या शरीर रचना शक्ति भी ( इष्कृतिः= निष्कृतिः ) रोगों को शरीर से बाहर निकाल देने वाली है (अथो) इसी कारण (यूयम् ) तुम सब निष्कृती: ) शरीर में से रोगों को बाहर निकाल देने से ही निष्कृति' भी कहाती (स्थ ) हो। तुम ( सीरा: स्थन ) अन्न के समान पुष्टिकारक होने से 'सीरा' कहाती हो । अथवा नही जिस प्रकार भूमि के मल मार्गों को बहाकर दूर लेजाती है उसी प्रकार तुम भी शरीर में से रोग को बहा देने से 'सीरा' कहाती हो । और ( पतत्रिणीः स्थन ) शरीर में व्याप्त होकर रोग को बाहर कर देने और शरीर की रक्षा करने में समर्थ होने से तुम 'पतत्रिणी' हो । ( यत् ) जो पदार्थ भी शरीर में ( आमयति ) रोग उत्पन्न करता है उसकी (निष्कृथ ) बाहर कर देते हो । बलवती वीर प्रजाओं के पक्ष में- हे वीर सेनाओ ! ( वः माता इष्कृति:) इष्कृति' शत्रु को राष्ट्र से बाहर निकालने वाली शक्ति ही बनाने वाली 'माता' के समान है। इसी से यूयं निष्कृती: स्थ ) तुम सब 'निष्कृति' नाम से कहाती हो । तुम सदा ( सीराः ) अन्न आदि पदार्थों सहित होकर ( पतत्रिणीः स्थन ) शत्रु के प्रति गमन करती हो । भोजन का प्रबन्ध करके चढ़ाई करो और ( यद् आमयति ) राष्ट्र में रोग के समान पीड़ाकारी हो उसको ( निष्कृथ ) निकाल बाहर कर दिया करो ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    भिषगृधिः । ओषधयो देवताः । अनुष्टुप् । गांधारः ॥

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    विषय

    इष्कृति व निष्कृति

    पदार्थ

    १. गत मन्त्र के अनुसार जब ओषधियों के शोषक बल उद्गत होते हैं तब रोग नष्ट हो जाते हैं। इसी बात को प्रस्तुत मन्त्र में कहते हैं कि ये ओषधियाँ (इष्कृतिः) = [उपसर्गैकदेशलोप है, मूलशब्द निष्कृति है] व्याधि का विनाश करती हैं (नाम वः माता) = यह 'निष्कृति' तुम्हारी माता का नाम है। यह भूमि तुम्हारी माता है जो सचमुच आरोग्य का कारण है। २. (अथ उ) = और इसी कारण (यूयम्) = तुम भी (निष्कृतिः) = व्याधियों का निष्क्रमण करनेवाली (स्थ) = हो। तुम भी भूमिरूप माता से उत्पन्न होकर व्याधियों को दूर करनेवाली होती हो। २. (सीरा:) = [ सह इरया = अन्नेन वर्तन्ते] पथ्यान्न के साथ होनेवाली तुम (पतत्रिणीः स्थन) = [प्रसरणशीलाः] शरीर में व्याप्त होनेवाली हो। ३. (यत्) = जब ऐसा होता है तब (आमयति) = [रुजति आमयाविनि] रोगी में स्थित रोग को (निष्कृथ) = [निर्नाशयत] खूब नष्ट करती हो। ओषधियों का जब पथ्य के साथ प्रयोग होता है तब निश्चय से वे रोग को नष्ट करनेवाली होती हैं।

    भावार्थ

    भावार्थ - उत्तम भूमि में उत्पन्न ओषधियाँ रोग को नष्ट करनेवाली होती हैं। इसी से इन्हें 'निष्कृति' नाम दिया गया है। ओषधि की गुणवत्ता के लिए उसके साथ पथ्य का प्रयोग भी आवश्यक है।

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. हे माणसांनो ! माता - पिता जशी तुमची सेवा करतात तशी तुम्हीही त्यांची सेवा करा. जे जे काम रोग निर्माण करणारे असेल त्याचा त्याग करा. याप्रमाणे औषधांचे (सोमलता वगैरे) सेवन करण्याने मातेप्रमाणे ती प्राण्यांना पुष्ट करते.

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    विषय

    योग्यप्रकारे घेतल्यास औषधी काय परिणाम करतात, याविषयी पुढील मंत्रात कथन केले आहे-

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - हे मनुष्यांनो, (व:) तुमचे (इष्कृति:) कार्य सिद्ध करणारी जशी (माती) आता असते, मातेप्रमाणे तशा कार्य सिद्ध करणाऱ्या औषधी (नाम) प्रसिद्ध आहेत. (यूयम्‌) तुम्ही लोक त्या औषधींचे ज्ञान मिळविणारे आणि त्या औषधींचे सेवन करणारे (स्थ) व्हा. तसेच (पतत्रिणी:) वाहणाऱ्या (सीरा:) नद्यांप्रमाणे तुम्ही (निष्कृती:) उपकारांची परतफेड करणारे (स्थन) व्हा. (औषधी तुम्हाला लाभ देतात, तुम्ही त्या औषधींची वृद्धी, लागवड आदी करा) (अथो) यानंतर (लक्षात असू द्या की) (यत्‌) जी क्रिया, जी औषधयोजना अथवा जो वैद्य (आमयति) तुमचा रोग अधिक वाढवत असेल, त्याचा (निष्कृथ) त्याग करा ॥83॥

    भावार्थ

    भावार्थ - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमा अलंकार आहे. हे मनुष्यांनो, ज्याप्रमाणे तुमचे माता-पिता तुमची सेवा (लालन-पालन) करतात, त्याप्रमाणे तुम्हीही त्यांची सेवा करीत जा. ज्या ज्या कामामुळे वा आचरणामुळे रोग होत असेल, ते काम सोडा. सेवन केल्यास औषधीदेखील आई प्रमाणे प्राण्यांना पोषण देते (रोगरहित करून बलवान बनविते) ॥83॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    O men, know the medicine that brings ye relief like the mother. Like flowing streams pay back the debt of gratitude. Keep afar whatever brings disease.

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    Meaning

    Know the medicine which, as mother, serves your life with healing and, like the flowing streams, repay the debt by completing the development of the science of healing by herbs. Whatever causes disease and loss of health, remove from the paths of life.

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    Translation

    O herbs, reliever is your mother's name, and you also are relievers, You grow up along with the foodgrains, and spread all around. May you keep away all that which causes diease. (1)

    Notes

    Iskrtih, निष्कृति:, n' of the prefix ‘az’ is dropped; निष्करोति नाशयति व्याधिं इति निष्कृति:, that destroys disease. Sirah, सह इरया अन्नेन वर्तंते इति सीरा:, that grow with food grains. Or, सीरा: क्षुधादीनां अपसारयित्र्य:, dispellers of hunger etc. Patatrini, प्रसरणशीला:, that spread all around.

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    बंगाली (1)

    विषय

    সুসেবিতা ওষধয়ঃ কিং কুর্বন্তীত্যাহ ॥
    সুসেবিত ওষধী কী করে এই বিষয় পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ- হে মনুষ্যগণ ! (য়ূয়ম্) তোমরা যাহারা (বঃ) তোমাদিগের (ইষ্কৃতিঃ) কার্য্য সিদ্ধিকারী (মাতা) মাতৃসদৃশ ওষধী (নাম) বিখ্যাত উহার সেবার তুল্য সেবনীকৃত ওষধীগুলির জ্ঞাতা (স্থ) হও । (পতত্রিণীঃ) চলন্ত (সীরাঃ) নদীসদৃশ (নিষ্কৃতীঃ) প্রত্যুপকারী সিদ্ধকারী (স্থন) হও । (অথো) অতঃপর (য়ৎ) যে ক্রিয়া বা ওষধী অথবা বৈদ্য (আময়তি) রোগবৃদ্ধি করিবে উহাকে (নিষ্কৃথ) ত্যাগ কর ॥ ৮৩ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ- এই মন্ত্রে বাচকলুপ্তোপমালঙ্কার আছে । হে মনুষ্যগণ ! যেমন মাতা-পিতা তোমাদের সেবা করে সেইরূপ তোমরাও তাহাদিগের সেবা কর । যে যে কর্ম্ম রোগকারী হয় উহা ত্যাগ কর । এই প্রকার সেবিত ওষধী মাতার ন্যায় প্রাণিদিগকে পুষ্ট করে ॥ ৮ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    ইষ্কৃ॑তি॒র্নাম॑ বো মা॒তাথো॑ য়ূ॒য়ꣳ স্থ॒ নিষ্কৃ॑তীঃ ।
    সী॒রাঃ প॑ত॒ত্রিণী॑ স্থন॒ য়দা॒ময়॑তি॒ নিষ্কৃ॑থ ॥ ৮৩ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ইষ্কৃতিরিত্যস্য ভিষগৃষিঃ । বৈদ্যা দেবতাঃ । নিচৃদনুষ্টুপ্ ছন্দঃ ।
    গান্ধারঃ স্বরঃ ॥

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