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यजुर्वेद अध्याय - 12

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  • यजुर्वेद - अध्याय 12/ मन्त्र 3
    ऋषिः - श्यावाश्व ऋषिः देवता - सविता देवता छन्दः - विराड् जगती स्वरः - निषादः
    97

    विश्वा॑ रू॒पाणि॒ प्रति॑मुञ्चते क॒विः प्रासा॑वीद् भ॒द्रं द्वि॒पदे॒ चतु॑ष्पदे। वि नाक॑मख्यत् सवि॒ता वरे॒ण्योऽनु॑ प्र॒याण॑मु॒षसो॒ विरा॑जति॥३॥

    स्वर सहित पद पाठ

    विश्वा॑। रू॒पाणि॑। प्रति॑। मु॒ञ्च॒ते॒। क॒विः। प्र। अ॒सा॒वी॒त्। भ॒द्रम्। द्वि॒पद॒ इति॑ द्वि॒ऽपदे॑। चतु॑ष्पदे। चतुः॑पद॒ इति॑ चतुः॑पदे। वि। नाक॑म्। अ॒ख्य॒त्। स॒वि॒ता। वरे॑ण्यः। अनु॑। प्र॒याण॑म्। प्र॒यान॒मिति॑ प्र॒ऽयान॑म्। उ॒षसः॑। वि। रा॒ज॒ति॒ ॥३ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    विश्वा रूपाणि प्रतिमुञ्चते कविः प्रासावीद्भद्रन्द्विपदे चतुष्पदे । वि नाकमख्यत्सविता वरेण्योनु प्रयाणमुषसो वि राजति ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    विश्वा। रूपाणि। प्रति। मुञ्चते। कविः। प्र। असावीत्। भद्रम्। द्विपद इति द्विऽपदे। चतुष्पदे। चतुःपद इति चतुःपदे। वि। नाकम्। अख्यत्। सविता। वरेण्यः। अनु। प्रयाणम्। प्रयानमिति प्रऽयानम्। उषसः। वि। राजति॥३॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 12; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथाग्रे परमात्मनः कृत्यमुपदिश्यते॥

    अन्वयः

    हे मनुष्याः! यो वरेण्यः कविः सवितोषसः प्रयाणमनुविराजति विश्वा रूपाणि प्रतिमुञ्चते। द्विपदे चतुष्पदे नाकं व्यख्यत् भद्रं प्रासावीत् तमीदृशमुत्पादकं सूर्यं परमेश्वरं विजानीत॥३॥

    पदार्थः

    (विश्वा) सर्वाणि (रूपाणि) (प्रति) (मुञ्चते) (कविः) क्रान्तदर्शनः क्रान्तप्रज्ञः सर्वज्ञो वा (प्र) (असावीत्) उत्पादयति (भद्रम्) जननीयं सुखम् (द्विपदे) मनुष्याद्याय (चतुष्पदे) गवाद्याय (वि) (नाकम्) सर्वदुःखरहितम् (अख्यत्) प्रकाशयति (सविता) सकलजगत् प्रसविता जगदीश्वरः सूर्य्यो वा (वरेण्यः) स्वीकर्त्तुमर्हः (अनु) (प्रयाणम्) प्रकृष्टं प्रापणम् (उषसः) प्रभातस्य (वि) (राजति) प्रकाशते॥३॥

    भावार्थः

    अत्र श्लेषालङ्कारः। येन जगदीश्वरेण सकलरूपप्रकाशकः प्राणिनां सुखहेतुः प्रकाशमानः सूर्य्यो रचितस्तस्यैव भक्तिं सर्वे मनुष्याः कुर्वन्त्विति॥३॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    अब अगले मन्त्र में परमेश्वर के कृत्य का उपदेश किया है॥

    पदार्थ

    हे मनुष्यो! जो (वरेण्यः) ग्रहण करने योग्य (कविः) जिसकी दृष्टि और बुद्धि सर्वत्र है वा सर्वज्ञ (सविता) सब संसार का उत्पादक जगदीश्वर वा सूर्य्य (उषसः) प्रातःकाल का समय (प्रयाणम्) प्राप्त करने को (अनुविराजति) प्रकाशित होता है (विश्वा) सब (रूपाणि) पदार्थों के स्वरूप (प्रतिमुञ्चते) प्रसिद्ध करता है और (द्विपदे) मनुष्यादि दो पग वाले (चतुष्पदे) तथा गौ आदि चार पग वाले प्राणियों के लिये (नाकम्) सब दुःखों से पृथक् (भद्रम्) सेवने योग्य सुख को (व्यख्यत्) प्रकाशित करता और (प्रासावीत्) उत्पन्न करता है, ऐसे उस सूर्य्यलोक को उत्पन्न करने वाले ईश्वर को तुम लोग जानो॥३॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जिस परमेश्वर ने सम्पूर्ण रूपवान् द्रव्यों का प्रकाशक, प्राणियों के सुख का हेतु, प्रकाशमान सूर्यलोक रचा है, उसी की भक्ति सब मनुष्य करें॥३॥

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    विषय

    श्यावाश्व का विश्वरूप प्रतिमोचन

    पदार्थ

    १. गत मन्त्रों के अनुसार माता-पिता व आचार्य से स्वास्थ्य, सदाचार व ज्ञानरूप धनों को प्राप्त करनेवाला यह व्यक्ति ‘श्यावाश्व’ बनता है [ श्यैङ् गतौ, अश्व = इन्द्रियाँ ]। गतिशील इन्द्रियोंवाला। यह सदा क्रियाशील बनता है। यह ( विश्वा रूपाणि ) = ज्ञान के सब शब्दों को अथवा छन्दों को [ रूप, word or verse ] ( प्रतिमुञ्चते ) = [ put on, arm oneself with ] धारण करता है अथवा उन छन्दों से अपने को सन्नद्ध करता है। इनसे सुसज्जित होकर वह अपने को पापों के आक्रमण से बचाता है। २. ( कविः ) = यह क्रान्तदर्शी होता है—सब वस्तुओं को ठीक स्वरूप में देखता है। ठीक रूप में देखने के कारण ही उनमें फँसता नहीं। ३. यह संसार में ( द्विपदे चतुष्पदे ) = मनुष्यों व अन्य प्राणियों के लिए ( भद्रम् ) = कल्याण ( प्रासावीत् ) = उत्पन्न करता है। यह सबका भला करने का ध्यान करता है। ४. परिणामतः यह ( नाकम् ) = स्वर्ग को ( वि अख्यत् ) = विशेषरूप से देखता है। ‘अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम्’ के अनुसार इसे सब रत्न प्राप्त होते हैं। किसी हितरमणीय वस्तु की इसे कमी नहीं रहती। ५. ( सविता ) = यह सदा सबको हित की प्रेरणा देता है और उत्पादक होता है, अर्थात् निर्माण के ही कर्मों में लगा रहता है। ६. ( वरेण्यः ) = वरण करनेवालों में उत्तम होता है। धीर बनकर यह विवेकपूर्वक ‘श्रेय’ का ही वरण करता है। मन्दमतियों की भाँति ‘प्रेय’ का वरण करनेवाला नहीं होता। ७. ( उषसः प्रयाणम् अनु ) = उषः के आने के साथ ही ( विराजति ) = विशेषरूप से दीप्त होता है अथवा विशेषरूप से अपने नियमित कार्यक्रम में चल पड़ता है [ regulated ]। ८. इस प्रकार यह ‘श्यावाश्व’ नियमित गति करता हुआ ऊपर उठता है। इसके जीवन की विशेषता का प्रतिपादन अगले मन्त्र में है।

    भावार्थ

    भावार्थ — श्यावाश्व १. छन्दों को अपना कवच बनाता है। २. क्रान्तदर्शी बनता है। ३. सबका भला करता है। ४. स्वर्ग में स्थित होता है। ५. सबको उत्तम प्रेरणा देता हुआ निर्माणात्मक कार्यों को करता है। ६. श्रेय का ही वरण करता है। ६. जीवन की क्रियाओं में बड़ा व्यवस्थित होता है।

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    विषय

    सूर्य के समान तेजस्वी राजा ।

    भावार्थ

    ( कविः ) क्रान्तदर्शी, विद्वान् पुरुष ( विश्वा रूपाणि ) समस्त प्रकार के पदार्थों को ( प्रति मुञ्चते ) प्रसिद्ध करता, प्रकट करता है। और ( द्विपदे चतुष्पदे) दो पाये, मनुष्यों और ( चतुष्पदे) चौपाये, पशुओं के लिये ( भद्रं ) सुख, कल्याण को ( प्रासावीत् ) उत्पन्न करता है । और वह सब का ( सविता) प्रेरक, ( वरेण्यः ) सब के वरण करने योग्य, सर्वश्रेष्ठ पुरुष, ( नाकम् ) अत्यन्त सुखस्वरूप, स्वर्ग और मोक्ष को भी ( वि अख्यत् ) विशेषरूप से प्रकाशित करता, उसका उपदेश करता है । और (उपसः प्रयाणम् ) प्रातः प्रभात के प्राप्त होने के ( अनु ) समय में, जिस प्रकार सूर्य चमकता है उसी प्रकार वह भी (उषसः) अपने दाहक, शत्रुनाशक तेज के ( प्रयाणम् अनु ) अच्छी प्रकार उदित हो जाने पर ( विराजति ) तेजस्वी होकर विराजता है ॥शत० ६।७।२।४॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    श्यावाश्र्व ऋषिः । सविता देवता । विराड् जगती । निषादः ॥

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    या मंत्रात श्लेषालंकार आहे. संपूर्ण पदार्थांचे स्वरूप प्रकाशित करणारा व प्राण्यांना सुखकारक होणारा सूर्य ज्या परमेश्वराने निर्माण केला आहे त्या परमेश्वराची सर्व माणसांनी भक्ती करावी.

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    विषय

    पुढील मंत्रात परमेश्‍वराच्या कर्तव्यांविषयी सांगितले आहे -

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - हे मनुष्यांनो, जो (वरेण्य:) वरणीय म्हणजे जो ग्रहण करण्यास योग्य आहे (कवि:) ज्याची दृष्टी सर्वकाही पाहते व जो सर्वांना संपूर्णपणे जाणतो, तो सर्वज्ञ (सविता) जगदीश्‍वर, सर्व जगाचा उत्पादक अथवा सूर्य (उषस:) प्रात:काळी (प्रयाणम्‌) देतांना (अनुविराजति) प्रकाशित होतो, (विश्‍वा) सर्व (रुपाणि) पदार्थांच्या रुपांना (प्रतिमुञ्चते) प्रकाशित करतो, (त्या परमेश्‍वरामुळे व सूर्यामुळे सर्वजण सर्व पदार्थांना पाहू शकतात.)

    भावार्थ

    missing

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    God is adorable, Omniscient, Maker of the universe, worthy of worship at dawn, Shaper of all material objects, Bringer of good for the quadrupeds and bipeds, and Remover of their troubles.

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    Meaning

    Savita, lord of light and life, the sun, choice of all, watches all and inspires all. It lights up the dawn and illuminates and reveals all the forms of existence. It creates the means of life and support for the humans and the animals, and lights up the heavens above.

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    Translation

    The wise creator, the Supreme Enlightement, arrays himself in all forms. He brings forth what is good for bipeds and quadrupeds. The adorable creator illumines the heaven's high vault and continues to shine even after the departure of the Dawn (the first flashes of the inner conscience). (1)

    Notes

    Rupàni pratimuiicate, exposes the forms (of all the things). With the light of the sun, things become visible. Kavih, क्रांतदर्शन:, one who can see beyond normal limits of time and space; omnivisioned.

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    बंगाली (1)

    विषय

    অথাগ্রে পরমাত্মনঃ কৃত্যমুপদিশ্যতে ॥
    এখন পরবর্ত্তী মন্ত্রে পরমেশ্বরের কৃত্যের উপদেশ করা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ- হে মনুষ্যগণ ! যিনি (বরেণ্য) বরণীয় (কবিঃ) যাঁহার দৃষ্টি ও বুদ্ধি সর্বত্র অথবা সর্বজ্ঞ (সবিতা) সকল জগতের উৎপাদক জগদীশ্বর বা সূর্য্য (উষসঃ) প্রাতঃকালীন সময় (প্রয়াণম্) প্রাপ্ত করিবার জন্য অনুবিরাজিত প্রকাশিত হন । (বিশ্বা) সকল (রূপাণি) পদার্থের স্বরূপ (প্রতিমুঞ্চতে) প্রসিদ্ধ করেন এবং (দ্বিপদে) মনুষ্যাদি দ্বিপদযুক্ত (চতুষ্পদে) তথা গাভি ইত্যাদি চতুষ্পদযুক্ত প্রাণীদের জন্য (নাকম্) সর্বপ্রকার দুঃখ হইতে পৃথক (ভদ্রম্) সেবনীয় সুখকে (ব্যখ্যৎ) প্রকাশিত করেন এবং (প্রাসাবীৎ) উন্নতি প্রদান করেন । এইরকম সেই সূর্য্যলোক উৎপন্নকারী ঈশ্বরকে তোমরা সকলে জানিবে ॥ ৩ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ- এই মন্ত্রে শ্লেষালঙ্কার আছে । যে পরমেশ্বর সম্পূর্ণ রূপবান দ্রব্যের প্রকাশক প্রাণীদিগের সুখের হেতু প্রকাশমান সূর্য্যলোক রচনা করিয়াছেন তাঁহারই ভক্তি সকল মনুষ্য করিবে ॥ ৩ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    বিশ্বা॑ রূ॒পাণি॒ প্রতি॑মুঞ্চতে ক॒বিঃ প্রাসা॑বীদ্ ভ॒দ্রং দ্বি॒পদে॒ চতু॑ষ্পদে ।
    বি নাক॑মখ্যৎ সবি॒তা বরে॒ণ্যোऽনু॑ প্র॒য়াণ॑মু॒ষসো॒ বি রা॑জতি ॥ ৩ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    বিশ্বারূপাণীত্যস্য শ্যাবাশ্ব ঋষিঃ । সবিতা দেবতা । বিরাড্ জগতী ছন্দঃ ।
    নিষাদঃ স্বরঃ ॥

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